EPF-NPS Merger Proposal: एक्सिस पेंशन फंड के CEO सुमित शुक्ला ने EPF और NPS को एक यूनिवर्सल रिटायरमेंट अकाउंट में मिलाने की वकालत की है। जानिए इस प्रस्ताव से कर्मचारियों को क्या फायदा होगा और रिटायरमेंट सेविंग्स का सिस्टम कैसे बदल सकता है।
भारत में रिटायरमेंट सेविंग्स को लेकर एक बड़े बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। एक्सिस पेंशन फंड के मैनेजिंग डायरेक्टर और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सुमित शुक्ला ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के तहत आने वाले EPF और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के बीच बेहतर तालमेल और संभावित विलय की वकालत की है।
मनीकंट्रोल को दिए एक इंटरव्यू में सुमित शुक्ला ने कहा कि EPF और NPS का विलय ऐसा सुधार है, जिसका होना तय माना जा सकता है और यह केवल समय की बात है। उनका विचार है कि नौकरीपेशा लोगों को अलग-अलग रिटायरमेंट योजनाओं में कई खाते रखने के बजाय एक यूनिवर्सल रिटायरमेंट अकाउंट की सुविधा मिलनी चाहिए।
इस व्यवस्था में कर्मचारी को यह आजादी होनी चाहिए कि वह अपने रिटायरमेंट फंड को किस व्यवस्था में रखना चाहता है। साथ ही, नौकरी या रोजगार की स्थिति बदलने पर फंड को एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम में आसानी से ट्रांसफर किया जा सके।
‘एक देश, एक रिटायरमेंट अकाउंट’ का क्या मतलब है?
फिलहाल भारत में अलग-अलग श्रेणी के कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट सेविंग्स की कई व्यवस्थाएं मौजूद हैं। संगठित क्षेत्र के बड़ी संख्या में कर्मचारियों के लिए EPF एक महत्वपूर्ण बचत माध्यम है, जबकि NPS सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र और आम निवेशकों के लिए भी रिटायरमेंट कॉर्पस बनाने का विकल्प देता है।
समस्या तब सामने आती है जब किसी व्यक्ति का रोजगार, कंपनी या रोजगार की श्रेणी बदलती है। ऐसे में अलग-अलग नियम, खाते और ट्रांसफर की प्रक्रियाएं रिटायरमेंट प्लानिंग को जटिल बना सकती हैं।
सुमित शुक्ला का सुझाव है कि एक व्यक्ति के लिए एक मुख्य रिटायरमेंट अकाउंट होना चाहिए। इस खाते में उसके पूरे रिटायरमेंट कॉर्पस को ट्रैक किया जा सके और जरूरत के मुताबिक अलग-अलग पेंशन सिस्टम के बीच पैसा ट्रांसफर करने की सुविधा हो।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कर्मचारी को हर बार नौकरी या रोजगार का ढांचा बदलने पर अपने रिटायरमेंट निवेश को लेकर अलग प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा।
EPF और NPS के बीच टू-वे पोर्टेबिलिटी क्यों जरूरी?
इस प्रस्ताव का एक अहम हिस्सा टू-वे पोर्टेबिलिटी है। इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति EPF से NPS में जाना चाहता है तो उसे आसानी से ऐसा करने की सुविधा मिले। इसी तरह NPS से EPF में जाने का विकल्प भी उपलब्ध होना चाहिए।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए कोई व्यक्ति ऐसी कंपनी में काम कर रहा है जहां EPF के माध्यम से रिटायरमेंट सेविंग्स हो रही है। कुछ साल बाद वह ऐसी नौकरी में चला जाता है जहां NPS उसके लिए अधिक उपयुक्त विकल्प हो सकता है। मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग नियम और प्रक्रियाएं लागू हो सकती हैं।
एक यूनिवर्सल अकाउंट की स्थिति में कर्मचारी के लिए प्रक्रिया ज्यादा सरल हो सकती है। उसका रिटायरमेंट कॉर्पस एक ही जगह दिखाई देगा और रोजगार बदलने के बावजूद उसकी लंबी अवधि की बचत का रिकॉर्ड बना रहेगा।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि EPF और NPS का विलय अभी लागू व्यवस्था नहीं है। यह एक नीतिगत सुझाव और सुधार की मांग है। इसे लागू करने के लिए सरकार और संबंधित नियामकों को नियमों, टैक्स व्यवस्था और दोनों योजनाओं की अलग-अलग संरचना पर व्यापक फैसला लेना होगा।
EPF और NPS की प्रकृति में क्या अंतर है?
EPF और NPS दोनों का उद्देश्य रिटायरमेंट के लिए पैसा तैयार करना है, लेकिन दोनों की संरचना अलग है।
EPF मुख्य रूप से कर्मचारी और नियोक्ता के योगदान पर आधारित बचत व्यवस्था है। इसमें कर्मचारी के वेतन से निर्धारित योगदान जाता है और नियोक्ता भी योगदान करता है। EPF को आमतौर पर नौकरीपेशा कर्मचारियों की सुरक्षित और अनुशासित लंबी अवधि की बचत के रूप में देखा जाता है।
दूसरी ओर NPS एक मार्केट-लिंक्ड रिटायरमेंट सेविंग्स सिस्टम है। इसमें निवेश की रकम अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश की जा सकती है और रिटर्न बाजार के प्रदर्शन से प्रभावित होता है। इसलिए NPS में लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न की संभावना के साथ बाजार जोखिम भी जुड़ा रहता है।
यही अंतर किसी भी संभावित विलय को जटिल बनाता है। अगर दोनों को एक खाते में लाया जाता है तो निवेश विकल्प, जोखिम, रिटर्न, निकासी और टैक्स से जुड़े नियमों को किस तरह एक साथ लागू किया जाएगा, यह बड़ा नीतिगत सवाल होगा।
भारत में रिटायरमेंट सेविंग्स बढ़ाने की जरूरत
सुमित शुक्ला ने भारत में रिटायरमेंट सेविंग्स की कम हिस्सेदारी को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक देश में पेंशन सेविंग्स का स्तर विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है।
भारत की बड़ी आबादी अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती है। बड़ी संख्या में लोग स्वरोजगार से जुड़े हैं और उनके पास नौकरीपेशा कर्मचारियों की तरह अनिवार्य रिटायरमेंट सेविंग्स की सुविधा नहीं होती।
यही वजह है कि रिटायरमेंट सेविंग्स को केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित रखने के बजाय असंगठित क्षेत्र और स्वरोजगार से जुड़े लोगों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अगर कामकाजी उम्र में पर्याप्त पैसा रिटायरमेंट के लिए नहीं बचाया जाता है तो बुजुर्गावस्था में लोगों की आय का स्रोत कमजोर हो सकता है। इससे भविष्य में परिवारों और सरकार दोनों पर आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
PAN बनते ही NPS अकाउंट अनिवार्य करने का सुझाव
सुमित शुक्ला ने रिटायरमेंट सेविंग्स की आदत को शुरुआती स्तर पर विकसित करने के लिए एक और बड़ा सुझाव दिया है। उनका विचार है कि जब किसी नागरिक के पास PAN कार्ड बनता है, उसी समय उसके लिए NPS अकाउंट की शुरुआत अनिवार्य की जा सकती है।
इसका उद्देश्य लोगों को कम उम्र से ही रिटायरमेंट के लिए निवेश शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
लंबी अवधि के निवेश में समय एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर कोई व्यक्ति कम उम्र में निवेश शुरू करता है तो उसे लंबे समय तक निवेश और कंपाउंडिंग का फायदा मिल सकता है। इसके विपरीत, रिटायरमेंट के करीब पहुंचने के बाद बचत शुरू करने पर बड़े कॉर्पस के लिए ज्यादा रकम निवेश करनी पड़ सकती है।
हालांकि, NPS को सभी PAN धारकों के लिए अनिवार्य बनाना भी एक बड़ा नीतिगत फैसला होगा। इसके लिए सरकार को नागरिकों की अलग-अलग आय, रोजगार और वित्तीय क्षमता को ध्यान में रखना होगा।
बच्चों के लिए NPS Vatsalya पर जोर
रिटायरमेंट सेविंग्स के साथ-साथ बच्चों के लिए लंबी अवधि की वित्तीय योजना बनाने की बात भी सामने आई है। इसके लिए NPS Vatsalya जैसी व्यवस्था को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया है।
NPS Vatsalya के जरिए नाबालिगों के नाम पर रिटायरमेंट-केंद्रित निवेश की शुरुआत की जा सकती है। विचार यह है कि अगर बचपन से ही लंबी अवधि के निवेश की आदत विकसित होती है तो भविष्य में वित्तीय सुरक्षा मजबूत हो सकती है।
हालांकि, बच्चों के लिए ऐसे खाते को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव भी व्यापक नीति और सामाजिक चर्चा की मांग करेगा। परिवारों की आय और आर्थिक क्षमता अलग-अलग होती है, इसलिए किसी भी अनिवार्यता के साथ पर्याप्त लचीलापन जरूरी होगा।
न्यू टैक्स रिजीम में ₹50,000 की अतिरिक्त छूट की मांग
सुमित शुक्ला ने टैक्स व्यवस्था में भी बदलाव की मांग की है। उन्होंने न्यू टैक्स रिजीम के तहत रिटेल NPS निवेशकों के लिए अतिरिक्त टैक्स इंसेंटिव बहाल करने की वकालत की।
पुरानी टैक्स व्यवस्था में आयकर अधिनियम की धारा 80CCD(1B) के तहत NPS में निवेश पर ₹50,000 तक की अतिरिक्त कटौती का प्रावधान रहा है। यह लाभ सामान्य 80C सीमा से अलग था।
न्यू टैक्स रिजीम में व्यक्तिगत NPS निवेशकों के लिए इस अतिरिक्त ₹50,000 की कटौती का लाभ उसी तरह उपलब्ध नहीं है। वहीं, कुछ परिस्थितियों में नियोक्ता के NPS योगदान पर अलग टैक्स लाभ उपलब्ध हैं।
सुमित शुक्ला का कहना है कि अगर सरकार लोगों को खुद से रिटायरमेंट के लिए निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है तो न्यू टैक्स रिजीम में भी रिटेल NPS सब्सक्राइबर्स को अतिरिक्त टैक्स इंसेंटिव मिलना चाहिए।
क्या EPF बंद होकर सिर्फ एक अकाउंट रह जाएगा?
यह सवाल इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिलहाल ऐसा कोई फैसला लागू नहीं हुआ है जिसके तहत EPF को बंद करके केवल NPS को लागू कर दिया गया हो।
‘एक देश, एक रिटायरमेंट अकाउंट’ का विचार मूल रूप से रिटायरमेंट सेविंग्स को सरल और पोर्टेबल बनाने पर केंद्रित है। इसका मतलब यह जरूरी नहीं है कि EPF तुरंत खत्म हो जाएगा या सभी कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से NPS में भेज दिया जाएगा।
अगर भविष्य में सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाती है तो EPF, NPS, EPFO, पेंशन नियमन, टैक्स नियम और कर्मचारियों के मौजूदा अधिकारों से जुड़े कई पहलुओं पर विस्तृत चर्चा जरूरी होगी।
इसलिए फिलहाल इसे एक संभावित पॉलिसी सुधार के सुझाव के रूप में देखना चाहिए, न कि EPF बंद होने की घोषणा के तौर पर।
कर्मचारियों को संभावित फायदे क्या होंगे?
अगर भविष्य में एक यूनिवर्सल रिटायरमेंट अकाउंट की व्यवस्था लागू होती है तो कर्मचारियों को कई संभावित फायदे मिल सकते हैं।
सबसे बड़ा फायदा होगा पोर्टेबिलिटी। नौकरी बदलने पर रिटायरमेंट सेविंग्स को मैनेज करना आसान हो सकता है। इसके अलावा एक ही अकाउंट में पूरे रिटायरमेंट कॉर्पस की जानकारी मिलने से व्यक्ति को अपनी कुल बचत का बेहतर अंदाजा हो सकता है।
दूसरा फायदा निवेश के विकल्पों से जुड़ा हो सकता है। अगर सिस्टम में पर्याप्त लचीलापन रखा जाता है तो कर्मचारी अपनी उम्र, जोखिम क्षमता और रिटायरमेंट लक्ष्य के अनुसार अलग-अलग निवेश विकल्प चुन सकता है।
तीसरा फायदा रिटायरमेंट प्लानिंग को सरल बनाने का होगा। कई अलग-अलग खातों और नियमों के बजाय एक केंद्रीय रिटायरमेंट अकाउंट लोगों के लिए समझना आसान हो सकता है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं
EPF और NPS को एक सिस्टम में लाना आसान काम नहीं होगा। दोनों योजनाओं की फंडिंग, निवेश व्यवस्था, जोखिम और निकासी नियम अलग हैं।
इसके अलावा लाखों-करोड़ों मौजूदा खातों को एक नई व्यवस्था में माइग्रेट करना तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती हो सकती है। कर्मचारियों के मौजूदा अधिकारों की सुरक्षा भी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक होगी।
इसके साथ यह भी तय करना होगा कि यूनिवर्सल अकाउंट में निवेश का जोखिम कौन उठाएगा, योगदान की संरचना क्या होगी और रिटायरमेंट के समय पैसा निकालने के नियम किस तरह बनाए जाएंगे।
इसलिए अगर कभी इस प्रस्ताव पर सरकार गंभीरता से विचार करती है तो इसका अंतिम मॉडल कर्मचारियों की सुरक्षा, निवेश की स्वतंत्रता और रिटायरमेंट आय की स्थिरता के बीच संतुलन पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष: बड़ा सुधार, लेकिन अभी सिर्फ प्रस्ताव
EPF और NPS को एक यूनिवर्सल रिटायरमेंट अकाउंट में लाने का विचार भारत की रिटायरमेंट सेविंग्स व्यवस्था को सरल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। एक्सिस पेंशन फंड के CEO सुमित शुक्ला ने इसी दिशा में एक देश, एक रिटायरमेंट अकाउंट और EPF-NPS के बीच टू-वे पोर्टेबिलिटी की वकालत की है।
हालांकि, EPF और NPS का विलय अभी लागू नहीं हुआ है और EPF को बंद करने का कोई मौजूदा सरकारी फैसला नहीं है। इसलिए कर्मचारियों और निवेशकों को इस खबर को प्रस्ताव के तौर पर ही देखना चाहिए।
अगर भविष्य में ऐसा सुधार लागू होता है तो इसका असर करोड़ों कर्मचारियों की रिटायरमेंट प्लानिंग, निवेश विकल्प और टैक्स व्यवस्था पर पड़ सकता है। लेकिन किसी भी बदलाव से पहले सरकार को मौजूदा निवेशकों और कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
Disclaimer: यह लेख केवल सूचना और जागरूकता के उद्देश्य से है। EPF, NPS या किसी अन्य निवेश विकल्प से जुड़ा फैसला लेने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति, जोखिम क्षमता और मौजूदा नियमों को समझें तथा जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लें। NewsJagran किसी व्यक्ति को किसी विशेष निवेश में पैसा लगाने की सलाह नहीं देता।


