Mountain Life Cost: शहरों की भागदौड़ और महंगे लाइफस्टाइल से दूर पहाड़ों में बसने का सपना आजकल बहुत से लोगों को आकर्षित करता है। लेकिन क्या पहाड़ों में कम खर्च में आरामदायक जिंदगी जी जा सकती है? हिमाचल प्रदेश के मनाली के पास रहने वाले दिव्या भट्ट और सौरभ यादव की लाइफस्टाइल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। दोनों ने गजान गांव में अपना ठिकाना बनाया है और साथ ही होमस्टे भी चलाते हैं। दिव्या ने अपने वीडियो में पहाड़ों में रहने के दौरान होने वाले मासिक खर्च का ब्रेकडाउन साझा किया है। उनके मुताबिक, ग्रॉसरी, बाहर का खाना, ईंधन, बिजली और घूमने-फिरने समेत उनका खर्च करीब ₹50 हजार प्रति माह आता है।
मनाली के पास गांव में बसाया अपना ठिकाना
शहर की नौकरी और लगातार भागदौड़ वाली जिंदगी छोड़कर पहाड़ों के बीच रहना बाहर से बेहद खूबसूरत और शांत नजर आता है। हालांकि, पहाड़ों में लंबे समय तक रहने के लिए सिर्फ खूबसूरत नजारे ही काफी नहीं होते। रोजमर्रा के खर्च, घर का इंतजाम, बिजली, खाना, आने-जाने और दूसरे जरूरी खर्च भी देखने पड़ते हैं।
दिव्या भट्ट और सौरभ यादव ने हिमाचल प्रदेश के मनाली के पास गजान गांव को अपना ठिकाना बनाया है। दोनों यहां रहते हैं और होमस्टे भी चलाते हैं। दिव्या ने सोशल मीडिया पर ‘Living in the Mountains, Episode 1’ नाम से एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने अपनी पहाड़ी जिंदगी के बारे में बताया।
वीडियो में उन्होंने यह भी समझाया कि पहाड़ों में उनका महीना किन-किन खर्चों में गुजरता है। खास बात यह है कि यहां रहने के बावजूद उनका पूरा बजट किसी बेहद महंगे शहरी लाइफस्टाइल जैसा नहीं है।
4BHK प्रॉपर्टी में रहते हैं, लेकिन किराए का हिसाब अलग
दिव्या और सौरभ जिस 4BHK प्रॉपर्टी में रहते हैं, उसका इस्तेमाल उनके होमस्टे से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए उनके रहने की वास्तविक लागत को किसी सामान्य किरायेदार के किराए से सीधे जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
दिव्या के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति मनाली के आसपास सिर्फ अपने रहने के लिए घर तलाशता है, तो इलाके और प्रॉपर्टी के हिसाब से किराया अलग-अलग हो सकता है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि 1BHK का किराया करीब ₹15,000 प्रति माह और 2BHK का किराया करीब ₹25,000 प्रति माह तक हो सकता है।
इसका मतलब यह है कि पहाड़ों में कम खर्च में रहना संभव हो सकता है, लेकिन घर का किराया चुनते समय लोकेशन, घर का आकार, सुविधाएं और रहने की अवधि जैसे कई फैक्टर महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
घर का खाना खाते हैं, फिर भी फूड बजट ₹15 हजार
कपल की लाइफस्टाइल का बड़ा हिस्सा घर के खाने पर निर्भर है। दोनों ज्यादातर खाना घर पर ही बनाते हैं। इसके बावजूद राशन और बाहर खाने-पीने को मिलाकर उनका मासिक फूड बजट करीब ₹15,000 बताया गया है।
इसमें लगभग ₹10,000 ग्रॉसरी पर खर्च होते हैं, जबकि करीब ₹5,000 बाहर खाने-पीने में चले जाते हैं।
पहाड़ी इलाकों में रोजमर्रा की जरूरत का सामान खरीदने की लागत शहर से अलग हो सकती है। कुछ सामान स्थानीय स्तर पर आसानी से मिल जाता है, जबकि कई चीजों के लिए नजदीकी बड़े बाजार तक जाना पड़ सकता है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति का फूड बजट इस कपल के आंकड़े से कम या ज्यादा हो सकता है।
छोटी दूरी के लिए पैदल चलना पसंद
पहाड़ों में रहने का एक फायदा यह भी है कि रोजमर्रा की कई छोटी दूरी पैदल तय की जा सकती है। दिव्या के अनुसार, कपल स्थानीय स्तर पर कई जगहों पर पैदल ही जाता है।
हालांकि, पूरी तरह बिना वाहन के काम नहीं चलता। गाड़ी के ईंधन पर उनका खर्च करीब ₹3,000 प्रति माह बताया गया है।
शहरों में जहां रोज ऑफिस आने-जाने, ट्रैफिक और लंबी दूरी की यात्रा के कारण फ्यूल खर्च तेजी से बढ़ सकता है, वहीं गांव में रहने पर छोटी दूरी पैदल तय करने से यह खर्च नियंत्रित किया जा सकता है।
पानी का बिल जीरो, बिजली का खर्च करीब ₹1,000
कपल के मासिक बजट में सबसे दिलचस्प आंकड़ों में से एक पानी का खर्च है। दिव्या के मुताबिक, उन्हें पानी के लिए कोई मासिक बिल नहीं देना पड़ता और इस मद में उनका खर्च ₹0 है।
हालांकि, पानी की यह स्थिति हर गांव या हर घर में एक जैसी नहीं होगी। स्थानीय जलस्रोत और पानी की उपलब्धता के कारण खर्च में काफी अंतर हो सकता है।
दूसरी तरफ बिजली का बिल करीब ₹1,000 प्रति माह आता है। यानी उनकी बताई गई लाइफस्टाइल में बिजली का खर्च भी शहर के कई घरों की तुलना में सीमित दिखाई देता है।
पहाड़ों में घूमना भी ज्यादा महंगा नहीं
कपल के लिए पहाड़ों में रहना सिर्फ घर तक सीमित नहीं है। आसपास के प्राकृतिक नजारे ही उनके लिए मनोरंजन का बड़ा साधन हैं। यही वजह है कि हर आउटिंग के लिए किसी महंगे रेस्टोरेंट, मॉल या टिकट वाले मनोरंजन स्थल पर पैसा खर्च करना जरूरी नहीं पड़ता।
फिर भी घूमने-फिरने और छोटे-मोटे माउंटेन एडवेंचर के लिए वे करीब ₹3,000 प्रति माह खर्च करते हैं।
पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए आसपास की प्रकृति एक तरह से रोज मिलने वाला मनोरंजन है। ट्रैकिंग, आसपास घूमना, व्यू प्वाइंट देखना या गांव के आसपास समय बिताना कई बार बड़े शहरों के मनोरंजन विकल्पों की तुलना में कम खर्चीला हो सकता है।
₹50 हजार का पूरा बजट कैसे बनता है?
दिव्या द्वारा बताए गए खर्चों को देखें तो उनके बजट में कई अलग-अलग मद शामिल हैं। ग्रॉसरी पर करीब ₹10,000, बाहर खाने-पीने पर ₹5,000, फ्यूल पर ₹3,000, बिजली पर ₹1,000 और घूमने-फिरने पर करीब ₹3,000 खर्च बताया गया है।
इन मदों का कुल योग ₹22,000 बैठता है। बाकी रकम अन्य रोजमर्रा के खर्चों और जरूरतों में जा सकती है। इसलिए करीब ₹50,000 का आंकड़ा सिर्फ ऊपर बताए गए खर्चों को जोड़ने से नहीं बनता, बल्कि कपल द्वारा बताए गए अन्य खर्च भी इसमें शामिल माने जाने चाहिए।
यही वजह है कि उनके ₹50 हजार के बजट को एक सामान्य परिवार या किसी दूसरे शहर से पहाड़ों में शिफ्ट होने वाले व्यक्ति के लिए फिक्स खर्च नहीं माना जा सकता।
क्या पहाड़ों में ₹50 हजार में आराम से रहा जा सकता है?
यह सवाल इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। इसका जवाब व्यक्ति की जरूरतों और रहने की व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
अगर किसी व्यक्ति के पास पहले से घर है, वह ज्यादातर खाना घर पर बनाता है, छोटी दूरी पैदल तय करता है और महंगे मनोरंजन पर ज्यादा खर्च नहीं करता, तो उसका मासिक बजट कम रह सकता है। लेकिन अगर घर का किराया देना हो, वाहन का ज्यादा इस्तेमाल हो, बार-बार शहर जाना पड़े या बाहर खाना ज्यादा हो, तो खर्च तेजी से बढ़ सकता है।
दिव्या और सौरभ के मामले में एक खास बात यह भी है कि उनकी रहने की व्यवस्था होमस्टे बिजनेस से जुड़ी है। इसलिए उनके खर्च की तुलना सीधे ऐसे व्यक्ति से नहीं की जा सकती जो मनाली के पास सामान्य तौर पर किराए का घर लेकर सिर्फ रहने के लिए शिफ्ट हो रहा हो।
शहर छोड़ने के फैसले में सिर्फ खर्च नहीं, लाइफस्टाइल भी मायने रखती है
पहाड़ों में शिफ्ट होने की वजह सिर्फ कम खर्च नहीं है। कई लोगों के लिए इसका सबसे बड़ा आकर्षण शांत माहौल, कम ट्रैफिक, प्राकृतिक वातावरण और धीमी रफ्तार वाली जिंदगी है।
शहरों में नौकरी, लंबी यात्रा, ट्रैफिक, महंगा किराया और लगातार बढ़ती जीवनशैली की लागत लोगों को परेशान करती है। इसके मुकाबले पहाड़ों की जिंदगी सोशल मीडिया पर बेहद शांत और आकर्षक दिखाई देती है।
हालांकि, पहाड़ों में रहने की अपनी चुनौतियां भी हैं। मौसम, परिवहन, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच, इंटरनेट कनेक्टिविटी, बाजार से दूरी और रोजगार के विकल्प जैसे मुद्दे किसी भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए सिर्फ एक वीडियो देखकर शहर छोड़कर पहाड़ों में बसने का फैसला करना व्यावहारिक नहीं होगा।
सोशल मीडिया पर लोगों को पसंद आई कपल की लाइफस्टाइल
दिव्या के वीडियो में लोगों की दिलचस्पी सिर्फ ₹50 हजार के मासिक खर्च की वजह से नहीं है। पहाड़ों के बीच उनका शांत और अपेक्षाकृत सादा जीवन भी लोगों का ध्यान खींच रहा है।
सोशल मीडिया यूजर्स ने पहाड़ों की खूबसूरती और इस तरह की जिंदगी को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ लोगों ने इसे शहर की भागदौड़ से बेहतर बताया, जबकि कई लोगों के लिए प्राकृतिक माहौल और मानसिक सुकून ही इस लाइफस्टाइल की सबसे बड़ी खासियत नजर आई।
एक यूजर ने पहाड़ों के नजारों को जिंदगी का ‘प्रीमियम सब्सक्रिप्शन’ तक बताया। वहीं, कुछ प्रतिक्रियाओं में यह भावना भी देखने को मिली कि असली लग्जरी हमेशा महंगे घर, कार या शहर की सुविधाओं में नहीं होती, बल्कि समय, शांति और प्रकृति के करीब रहने में भी हो सकती है।
₹50 हजार का आंकड़ा क्यों हो सकता है खास?
दिव्या और सौरभ की कहानी उन लोगों के लिए दिलचस्प है जो कभी न कभी शहर की नौकरी छोड़कर किसी शांत जगह पर बसने का सपना देखते हैं। उनका खर्च यह दिखाता है कि पहाड़ों में रहने का बजट केवल किराए और खाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि रहने की व्यवस्था और कमाई के तरीके का भी बड़ा असर पड़ता है।
इस कपल की स्थिति में होमस्टे बिजनेस एक महत्वपूर्ण फैक्टर है। यानी वे सिर्फ पहाड़ों में रह नहीं रहे हैं, बल्कि वहीं से अपनी गतिविधि भी चला रहे हैं। ऐसे में उनके खर्च और आम नौकरीपेशा व्यक्ति के खर्च में अंतर होना स्वाभाविक है।
इसलिए उनकी कहानी को ‘हर कोई ₹50 हजार में मनाली के पास 4BHK में रह सकता है’ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि इसे एक ऐसे कपल की व्यक्तिगत लाइफस्टाइल के उदाहरण के रूप में देखना बेहतर है, जिसने शहर की भागदौड़ से अलग पहाड़ों को अपना घर बनाया और अपनी जरूरतों के हिसाब से खर्च का संतुलन तैयार किया।
पहाड़ों की जिंदगी का असली आकर्षण क्या है?
दिव्या और सौरभ की कहानी में सबसे बड़ा आकर्षण शायद ₹50 हजार का बजट नहीं, बल्कि वह जीवनशैली है जिसमें घर के बाहर निकलते ही पहाड़, हरियाली और प्राकृतिक नजारे दिखाई देते हैं।
शहरों में मनोरंजन के लिए अक्सर अलग से बजट बनाना पड़ता है, जबकि पहाड़ों में प्रकृति ही रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। यही वजह है कि कम खर्च और सुकून भरी जिंदगी की तलाश करने वाले लोगों के लिए ऐसे उदाहरण तेजी से आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।
हालांकि, हर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, काम, परिवार और जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए पहाड़ों में बसने का फैसला करने से पहले किराया, कमाई का स्थायी जरिया, इंटरनेट, परिवहन, मेडिकल सुविधाएं, मौसम और रोजमर्रा की जरूरतों का पूरा हिसाब लगाना जरूरी है।
फिलहाल दिव्या और सौरभ की कहानी यही बताती है कि अगर रहने और कमाई की व्यवस्था सही तरीके से बनाई जाए, तो शहर की तेज जिंदगी से दूर प्रकृति के बीच एक अलग तरह की लाइफस्टाइल बनाई जा सकती है।


