देशभर में पड़ रही भीषण गर्मी अब बिजली व्यवस्था पर भी भारी पड़ने लगी है। तापमान बढ़ने के साथ एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य शीतलन उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिसकी वजह से भारत में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सोमवार को देश में बिजली की अधिकतम मांग 257.37 गीगावाट दर्ज की गई, जबकि मंगलवार दोपहर तक यह आंकड़ा 260.5 गीगावाट को पार कर गया।
ऊर्जा मंत्रालय का अनुमान है कि इस गर्मी में बिजली की अधिकतम मांग 270 गीगावाट तक पहुंच सकती है। वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सरकारी अधिकारियों के हवाले से यह संभावना जताई गई है कि मांग 280 गीगावाट तक भी जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह भारत के बिजली क्षेत्र के इतिहास का सबसे बड़ा पीक डिमांड स्तर होगा।
लगातार बढ़ रही बिजली की खपत
देश में मई और जून के दौरान हर साल बिजली की खपत बढ़ती है, लेकिन इस बार गर्मी ने कई राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिमी राज्यों में तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है। इससे घरों, दफ्तरों, मॉल, फैक्ट्री और कमर्शियल सेंटरों में बिजली की खपत तेजी से बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में एयर कंडीशनर की बिक्री में तेजी आई है। शहरी इलाकों के साथ अब छोटे शहरों और कस्बों में भी बड़ी संख्या में लोग एसी और हाई-पावर कूलिंग उपकरण इस्तेमाल कर रहे हैं। यही वजह है कि बिजली की मांग हर साल नया रिकॉर्ड बना रही है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा असर?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में लू चलने की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के अनुसार 24 मई तक उत्तर-पश्चिम भारत के बड़े हिस्से भीषण गर्मी की चपेट में रह सकते हैं।
पंजाब के भटिंडा में सोमवार को तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वहीं राजस्थान और हरियाणा के कई इलाकों में पारा 46 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। दिल्ली-एनसीआर में भी तेज गर्म हवाओं और बढ़ते तापमान के कारण बिजली की खपत तेजी से बढ़ी है।
बिजली ग्रिड पर बढ़ रहा दबाव
बिजली की रिकॉर्ड मांग का सीधा असर पावर ग्रिड और वितरण कंपनियों पर पड़ रहा है। कई राज्यों में स्थानीय स्तर पर ओवरलोडिंग की समस्या भी सामने आ रही है। हालांकि केंद्र सरकार और पावर मंत्रालय का कहना है कि इस बार पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने के लिए पहले से तैयारी की गई है।
सरकार ने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को पर्याप्त ईंधन उपलब्ध कराने, गैस आधारित संयंत्रों को चालू रखने और राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया है। इसके अलावा ट्रांसमिशन नेटवर्क को भी हाई डिमांड के हिसाब से तैयार किया गया है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बिजली मांग में यह तेजी देश की आर्थिक गतिविधियों और बढ़ते शहरीकरण का भी संकेत है। हालांकि चुनौती यह है कि पीक आवर में बिना कटौती के लगातार बिजली सप्लाई बनाए रखी जाए।
पिछले साल कितना था रिकॉर्ड?
भारत में पिछले साल अधिकतम बिजली मांग करीब 250 गीगावाट के आसपास पहुंची थी। इस बार शुरुआती गर्मी में ही 260 गीगावाट का स्तर पार हो चुका है। ऐसे में आने वाले हफ्तों में नया रिकॉर्ड बनना लगभग तय माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर जून तक लू की स्थिति बनी रही तो बिजली की मांग 270 से 280 गीगावाट के बीच जा सकती है। खासकर शाम के समय, जब घरेलू उपयोग सबसे ज्यादा होता है, तब ग्रिड पर भारी दबाव देखने को मिल सकता है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर बिजली की मांग लगातार बढ़ती रही तो कुछ राज्यों में लोकल फॉल्ट, ट्रिपिंग और छोटे स्तर की बिजली कटौती की समस्या बढ़ सकती है। इसके अलावा डिस्कॉम कंपनियों की लागत भी बढ़ेगी क्योंकि पीक डिमांड के समय महंगी बिजली खरीदनी पड़ती है।
विशेषज्ञ लोगों को सलाह दे रहे हैं कि गैरजरूरी बिजली उपकरण बंद रखें और बिजली की बचत करें ताकि ग्रिड पर दबाव कम हो सके। ऊर्जा दक्ष उपकरणों का इस्तेमाल भी इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह स्थिति?
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। इंडस्ट्री, इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहन, डेटा सेंटर और एयर कंडीशनिंग की बढ़ती जरूरत के कारण बिजली की खपत और तेज होने की संभावना है।
ऐसे में सरकार के लिए सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ाना ही नहीं बल्कि ट्रांसमिशन, स्टोरेज और रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को मजबूत करना भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
(पीटीआई इनपुट के साथ)
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