नई दिल्ली: जुलाई के पहले सप्ताह में हुई अच्छी मानसूनी बारिश ने खरीफ सीजन में कपास (Cotton) की बुवाई को रफ्तार दी है। हालांकि शुरुआती देरी की वजह से कुल बुवाई क्षेत्र अब भी पिछले साल के मुकाबले काफी पीछे है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में मौसम सामान्य रहता है तो बुवाई के आंकड़ों में और सुधार हो सकता है, लेकिन उत्पादन में संभावित गिरावट का असर देश के टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
जुलाई की बारिश से सुधरी बुवाई की रफ्तार
इस साल मानसून की धीमी शुरुआत और अल नीनो (El Niño) की आशंकाओं के कारण खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई थी। लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश होने से किसानों ने तेजी से कपास की बुवाई शुरू की।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 5 जुलाई तक देश में 63.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हो चुकी थी। हालांकि यह पिछले वर्ष इसी अवधि के करीब 82 लाख हेक्टेयर के मुकाबले लगभग 23% कम है।
बुवाई की अंतिम तारीख बढ़ाई गई
कृषि आयुक्त पी.के. सिंह के अनुसार, हालिया बारिश के कारण बुवाई के अंतर में कमी आने लगी है। सामान्य परिस्थितियों में कपास की बुवाई 15 जुलाई तक पूरी हो जाती है, लेकिन इस बार मानसून में देरी को देखते हुए किसानों को राहत देते हुए बुवाई की समय-सीमा 30 जुलाई तक बढ़ा दी गई है।
इस फैसले से उन राज्यों के किसानों को फायदा मिलेगा जहां बारिश देर से पहुंची और अब खेतों में पर्याप्त नमी उपलब्ध है।
उत्पादन में गिरावट का अनुमान
मानसून को लेकर शुरुआती अनिश्चितता के चलते कृषि मंत्रालय ने कपास उत्पादन का अनुमान भी कम किया है।
मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक 2025-26 में कपास उत्पादन 170 किलोग्राम की 290.91 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जबकि 2024-25 में यह 297.24 लाख गांठ था। यानी इस बार उत्पादन में गिरावट की संभावना जताई गई है।
टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादकों और कपड़ा निर्माताओं में शामिल है। ऐसे में यदि उत्पादन घटता है तो इसका सीधा असर टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार संभावित प्रभाव इस प्रकार हो सकते हैं—
- कपड़ा उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
- घरेलू मांग पूरी करने के लिए कपास का आयात बढ़ाना पड़ सकता है।
- कच्चे माल की लागत बढ़ने से यार्न और फैब्रिक की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
- अंततः तैयार कपड़ों की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
आगे क्या रहेगी नजर?
अब किसानों और बाजार दोनों की निगाहें जुलाई के बाकी दिनों के मानसून पर टिकी हैं। यदि बारिश सामान्य बनी रहती है तो बुवाई का रकबा और बढ़ सकता है, जिससे उत्पादन में अनुमानित गिरावट कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि यदि मौसम फिर से कमजोर पड़ता है तो कपास उत्पादन और टेक्सटाइल उद्योग दोनों के सामने चुनौतियां बढ़ सकती हैं।


