Highlights
- AI और डेटा सेंटर बूम से दुनिया में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची
- सोलर पैनल, बैटरी और एनर्जी स्टोरेज सप्लाई चेन पर चीन की मजबूत पकड़
- भारत तेजी से क्षमता बढ़ा रहा है, लेकिन कई अहम कंपोनेंट्स के लिए अब भी आयात पर निर्भर
नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने दुनिया भर में बिजली की मांग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए देश बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और अन्य क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहे हैं। लेकिन इस पूरी दौड़ में एक देश सबसे आगे निकल चुका है और वह है चीन।
आज सोलर पैनल, लिथियम-आयन बैटरी, बैटरी सेल, एनर्जी स्टोरेज सिस्टम और कई जरूरी क्लीन एनर्जी उपकरणों की वैश्विक सप्लाई चेन पर चीन का मजबूत प्रभाव है। यही वजह है कि एशिया, यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका तक अधिकांश देशों की ऊर्जा परियोजनाएं किसी न किसी स्तर पर चीनी उत्पादों पर निर्भर हैं।
भारत भी 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता हासिल करने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रहा है। हालांकि, इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए जरूरी कई उपकरणों के मामले में चीन पर निर्भरता अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
क्लीन एनर्जी की दौड़ में क्यों आगे है चीन?
पिछले एक दशक में चीन ने केवल सोलर पैनल बनाने पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि उसने पूरी वैल्यू चेन पर निवेश किया। सिलिकॉन रिफाइनिंग, वेफर, सेल, मॉड्यूल, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग और रीसाइक्लिंग तक लगभग हर चरण में उसने विशाल उत्पादन क्षमता विकसित कर ली।
इसका फायदा अब उसे वैश्विक बाजार में मिल रहा है। कम लागत, बड़े पैमाने पर उत्पादन और मजबूत सप्लाई नेटवर्क के कारण चीन दुनिया के अधिकांश देशों को प्रतिस्पर्धी कीमत पर क्लीन एनर्जी उपकरण उपलब्ध करा रहा है।
अमेरिका तक बढ़ा चीनी निर्यात
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों और चीन पर लगाए गए कई प्रतिबंधों के बावजूद हालिया व्यापार आंकड़े बताते हैं कि चीन का क्लीन एनर्जी निर्यात मजबूत बना हुआ है।
हाल के आंकड़ों के अनुसार—
- अमेरिका को सोलर सेल्स का निर्यात 346% तक बढ़ा।
- लिथियम-आयन बैटरियों का निर्यात 20% से अधिक बढ़ा।
- लेड-एसिड बैटरियों के निर्यात में भी 150% से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई।
यह संकेत देता है कि वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और चीन इसका सबसे बड़ा लाभ उठा रहा है।
AI और डेटा सेंटर बना रहे नई चुनौती
दुनिया भर में AI आधारित सेवाओं का विस्तार हो रहा है। बड़े भाषा मॉडल (LLM), क्लाउड कंप्यूटिंग और हाई-परफॉर्मेंस डेटा सेंटर पहले की तुलना में कई गुना अधिक बिजली की खपत कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में केवल डेटा सेंटर ही वैश्विक बिजली मांग का बड़ा हिस्सा बन सकते हैं। ऐसे में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बड़े बैटरी स्टोरेज सिस्टम की जरूरत तेजी से बढ़ेगी।
यहीं पर चीन की औद्योगिक क्षमता उसे सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ देती है।
ईरान संकट ने भी बढ़ाई क्लीन एनर्जी की मांग
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल-गैस सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता ने कई देशों को ऊर्जा सुरक्षा पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है।
जब तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ता है तो सरकारें आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए सौर ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीकों की ओर तेजी से बढ़ती हैं।
इसका सीधा फायदा उन देशों को मिलता है जिनके पास क्लीन एनर्जी उपकरणों का मजबूत उत्पादन आधार है और फिलहाल चीन इस सूची में सबसे ऊपर है।
भारत के लिए क्यों चिंता की बात?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता बन चुका है। AI, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के साथ बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है।
देश में बड़े पैमाने पर—
- सोलर पार्क
- रूफटॉप सोलर
- बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम
- इलेक्ट्रिक वाहन
- ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएं
शुरू की जा रही हैं।
लेकिन इन परियोजनाओं के लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण उपकरण अभी भी आयात पर निर्भर हैं। यदि वैश्विक सप्लाई चेन में किसी कारण से बाधा आती है या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो भारत की परियोजनाओं की लागत और समय-सीमा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
सरकार क्या कर रही है?
इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने कई बड़े कदम उठाए हैं।
- PLI (Production Linked Incentive) योजना के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा।
- सोलर उपकरणों पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी (BCD) लागू।
- घरेलू सोलर मॉड्यूल और सेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर।
- एडवांस केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी निर्माण को प्रोत्साहन।
- ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं में निवेश।
इन योजनाओं का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को क्लीन एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है।
क्या भारत चीन को चुनौती दे सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, बढ़ती ऊर्जा मांग और मजबूत नीति समर्थन जैसी कई बड़ी ताकतें हैं।
हालांकि चीन जैसी उत्पादन क्षमता विकसित करने में अभी समय लगेगा। इसके लिए केवल फैक्ट्री लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कच्चे माल, तकनीक, रिसर्च, सप्लाई चेन और कुशल मानव संसाधन पर भी बड़े निवेश की जरूरत होगी।
यदि भारत अगले कुछ वर्षों में घरेलू बैटरी, सोलर सेल और एनर्जी स्टोरेज मैन्युफैक्चरिंग को तेजी से बढ़ा लेता है तो वह न केवल अपनी निर्भरता कम कर सकता है, बल्कि वैश्विक निर्यात बाजार में भी मजबूत खिलाड़ी बन सकता है।
निष्कर्ष
दुनिया में चल रही क्लीन एनर्जी की दौड़ केवल पर्यावरण बचाने की नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक बढ़त हासिल करने की भी लड़ाई बन चुकी है। चीन फिलहाल इस क्षेत्र में सबसे मजबूत स्थिति में दिखाई देता है। भारत तेजी से निवेश और नीतिगत सुधारों के जरिए इस अंतर को कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन आत्मनिर्भर बनने के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता, तकनीकी नवाचार और सप्लाई चेन को और मजबूत करना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा.


