Anil Agarwal Vedanta: वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने नेशनल हैंडलूम डे के मौके पर अपने बचपन की यादें साझा करते हुए अपने दादा रामेश्वर अग्रवाल को याद किया। उन्होंने खादी और हैंडलूम से जुड़ी पारिवारिक विरासत का जिक्र किया और युवाओं से भारतीय हस्तकरघा परंपरा को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि हाथ से बुने हर कपड़े के पीछे कई पीढ़ियों का हुनर और कारीगरों की मेहनत छिपी होती है।
नई दिल्ली: वेदांता ग्रुप के चेयरमैन Anil Agarwal सोशल मीडिया पर अपनी निजी यादों और कारोबारी विचारों को साझा करते रहते हैं। नेशनल हैंडलूम डे के अवसर पर उन्होंने अपने परिवार से जुड़ी ऐसी ही एक पुरानी याद साझा की, जिसमें खादी और हैंडलूम उनके बचपन का अहम हिस्सा रहा है।
अनिल अग्रवाल ने बताया कि उनके दादा रामेश्वर अग्रवाल ने 1960 के दशक में जयपुर के पास ‘खादी बाग’ की शुरुआत की थी। बचपन में वह अक्सर वहां जाया करते थे। उनके मुताबिक, उस जगह की कई तस्वीरें आज भी उनकी यादों में बसी हुई हैं।
बचपन में ‘खादी बाग’ से जुड़ी थीं खास यादें
Today, on #NationalHandloomDay, I remember my grandfather, Shri Rameshwar Agarwal, who was a true champion of khadi and handloom.
In the 1960s, he started Khadi Bagh near Jaipur. As a child, I loved visiting him there. I still remember the energy of that place: the sound of… https://t.co/KSpQffrR7A pic.twitter.com/pIX4vYQLN3
— Anil Agarwal (@AnilAgarwal_Ved) August 7, 2026 अनिल अग्रवाल ने बताया कि बचपन में खादी बाग जाना उनके लिए एक खास अनुभव हुआ करता था। वहां मौजूद करघों की आवाज, हाथ से तैयार किए जा रहे कपड़े और कारीगरों की मेहनत को वह आज भी याद करते हैं।
उनके लिए हैंडलूम सिर्फ कपड़े का एक माध्यम नहीं था, बल्कि यह परिवार और भारतीय परंपरा से जुड़ी हुई विरासत थी। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में खादी और हैंडलूम के कपड़े पहने जाते थे। परिवार की महिलाएं भी खूबसूरत हैंडलूम साड़ियां पहनती थीं।
अनिल अग्रवाल के मुताबिक, इन अनुभवों ने उनके मन में भारतीय हस्तकरघा और कारीगरों के प्रति एक खास जुड़ाव पैदा किया। यही वजह है कि कई दशक बाद भी वह इन यादों को अपनी पहचान और विरासत का हिस्सा मानते हैं।
युवाओं के बीच फिर फैशन बने हैंडलूम
Tomorrow, 7th August is National Handloom Day. Let’s make India’s handloom diversity popular.
Share your videos with your favourite handloom products, including GRWM videos on social media.
Don’t forget to use #NationalHandloomDay. pic.twitter.com/zoFdTXphRL
— Narendra Modi (@narendramodi) August 6, 2026 अनिल अग्रवाल ने अपने संदेश में हैंडलूम को लेकर युवाओं से खास अपील भी की। उन्होंने उम्मीद जताई कि हैंडलूम और खादी एक बार फिर युवाओं के बीच फैशन का हिस्सा बनें।
उनका कहना है कि हाथ से बुना हुआ हर कपड़ा सिर्फ एक उत्पाद नहीं है। उसके पीछे कारीगरों की मेहनत, पारंपरिक तकनीक और कई पीढ़ियों से चली आ रही कला होती है। ऐसे में हैंडलूम को अपनाना सिर्फ फैशन का हिस्सा बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे देश की पारंपरिक कला और कारीगर समुदायों को भी समर्थन मिलता है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत की हस्तकरघा परंपरा में रोजगार पैदा करने की बड़ी क्षमता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।
कई राज्यों में कारीगर समुदायों को सहयोग
अनिल अग्रवाल ने अपने संदेश में यह भी बताया कि वेदांता की ओर से ओडिशा, राजस्थान और असम सहित कई राज्यों में टेक्सटाइल कारीगरों और उनके समुदायों को सहयोग दिया जा रहा है।
भारत में हैंडलूम उद्योग की खासियत यह है कि अलग-अलग राज्यों में इसकी अपनी विशिष्ट पहचान है। कहीं पारंपरिक साड़ियां लोकप्रिय हैं तो कहीं स्थानीय बुनाई और प्राकृतिक रंगों से तैयार कपड़े अपनी अलग पहचान रखते हैं। इन परंपराओं को आगे बढ़ाने में स्थानीय कारीगरों की अहम भूमिका है।
ऐसे में हैंडलूम को बढ़ावा देने से ग्रामीण और पारंपरिक कारीगर समुदायों के लिए आर्थिक अवसर भी बढ़ सकते हैं।
‘यही हमारी असली पहचान है’
अनिल अग्रवाल ने अपने संदेश के अंत में भारतीय हस्तकरघा और खादी की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की बात कही। उन्होंने लोगों से अपील की कि इन पुरानी और खास परंपराओं को सिर्फ यादों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपनाएं और आगे बढ़ाएं।
उन्होंने अपनी पोस्ट के अंत में लिखा, ‘यही हमारी असली पहचान है।’
उनका यह संदेश उस समय खास महत्व रखता है जब पारंपरिक भारतीय कपड़ों को आधुनिक फैशन के साथ जोड़ने की कोशिशें बढ़ रही हैं। हैंडलूम को नए डिजाइन, आधुनिक स्टाइल और युवाओं की पसंद के साथ जोड़कर इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।


