Cycle Pure Agarbatti Success Story: कभी घर से शुरू हुआ एक छोटा-सा कारोबार आज हजारों करोड़ रुपये के कारोबार वाले बिजनेस ग्रुप में बदल चुका है। यह कहानी है एन. रंगा राव की, जिन्होंने आजादी के दौर में अपने लिए नौकरी नहीं, बल्कि अपना कारोबार खड़ा करने का सपना देखा। उन्होंने 1948 में मैसूर से अगरबत्ती का कारोबार शुरू किया और धीरे-धीरे साइकिल प्योर अगरबत्ती को एक बड़े ब्रांड के रूप में स्थापित कर दिया।
आज साइकिल प्योर अगरबत्ती भारत के प्रमुख अगरबत्ती ब्रांड्स में गिनी जाती है। कंपनी का कारोबार अगरबत्ती से आगे बढ़कर फ्रेगरेंस, वेलनेस और दूसरे उत्पादों तक पहुंच चुका है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, समूह का सालाना कारोबार ₹1,700 करोड़ से अधिक है और इसके उत्पाद भारत के साथ-साथ कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी पहुंचते हैं।
1948 में मैसूर से शुरू हुआ सफर
एन. रंगा राव ने 1948 में मैसूर में अपने अगरबत्ती कारोबार की नींव रखी थी। हालांकि, उनकी कारोबारी यात्रा की शुरुआत इससे कुछ पहले ही हो चुकी थी। उन्होंने एक छोटे स्तर के कारोबार से शुरुआत की और धीरे-धीरे इसे एक व्यवस्थित ब्रांड में बदलने पर ध्यान दिया।
उस समय अगरबत्ती का कारोबार काफी हद तक असंगठित क्षेत्र में था। ऐसे दौर में किसी उत्पाद को एक पहचान देने और उसे ब्रांड के रूप में स्थापित करने का विचार अपने आप में काफी आगे की सोच माना जा सकता है।
रंगा राव ने इसी सोच के साथ अपने कारोबार को सिर्फ एक स्थानीय उत्पाद तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पैकेजिंग, खुशबू, उत्पाद की गुणवत्ता और मार्केटिंग पर ध्यान देना शुरू किया। यही रणनीति आगे चलकर साइकिल ब्रांड की पहचान बनी।
छोटे गांव में बीता बचपन
एन. रंगा राव का बचपन तमिलनाडु के मदुरै के पास स्थित वथिराईरुप्पु नाम के एक छोटे गांव में बीता। कम उम्र में ही उन्हें परिवार की जिम्मेदारियां समझनी पड़ीं।
1935 में शादी के बाद उन्होंने अरवनागाड की कॉर्डाइट फैक्टरी में बुककीपर के तौर पर नौकरी शुरू की। यह नौकरी भले ही उनके अंतिम लक्ष्य नहीं थी, लेकिन इस दौरान उन्हें कामकाज, हिसाब-किताब और व्यवसाय से जुड़ी व्यावहारिक समझ हासिल हुई।
फिर 1947 में देश आजाद हुआ। आजादी के माहौल और बदलते भारत ने उनके भीतर अपना कारोबार शुरू करने की इच्छा को और मजबूत किया। उन्होंने नौकरी के बजाय उद्यमिता का रास्ता चुनने का फैसला किया।
घर से शुरू किया कारोबार
1947 में ही उन्होंने मैसूर प्रोडक्ट्स एंड जनरल ट्रेडिंग की शुरुआत की। शुरुआती दौर में घर ही उनका ऑफिस और काम की जगह था। संसाधन सीमित थे, लेकिन अपने कारोबार को लेकर उनकी सोच स्पष्ट थी।
उनका लक्ष्य केवल अगरबत्ती बनाकर बेच देना नहीं था। वह ऐसा ब्रांड तैयार करना चाहते थे जिसे ग्राहक नाम से पहचानें और जिसकी गुणवत्ता पर भरोसा करें।
यहीं से कारोबार को ब्रांड में बदलने की उनकी रणनीति शुरू हुई।
ऐसे हुआ ‘साइकिल’ ब्रांड का जन्म
उस दौर में अगरबत्ती बाजार में ज्यादातर कारोबार असंगठित तरीके से चलता था। रंगा राव ने इस स्थिति को एक अवसर के रूप में देखा। उन्होंने अपने उत्पाद को एक अलग पहचान देने के लिए ‘साइकिल’ नाम को ब्रांड के तौर पर विकसित किया।
उन्होंने ब्रांड की पहचान को मजबूत करने के लिए डिजाइन कॉपीराइट भी हासिल किए। धीरे-धीरे ‘साइकिल’ नाम अगरबत्ती बाजार में पहचाना जाने लगा।
इसके बाद उनके बेटे आर. गुरु भी कारोबार में शामिल हुए। इससे कंपनी में दूसरी पीढ़ी की एंट्री हुई और कारोबार को आगे बढ़ाने में परिवार की भूमिका मजबूत हुई।
1960 के दशक में बदली कंपनी की रणनीति
1960 से 1969 के बीच कंपनी ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। इस दौरान साइकिल रत्न जैसे उत्पादों को बाजार में पेश किया गया। कंपनी ने अलग-अलग कीमत और ग्राहक वर्गों को ध्यान में रखते हुए उत्पाद तैयार किए।
उस समय अगरबत्ती का एक पैक करीब 25 पैसे में बिकता था। ऐसे बाजार में कंपनी ने प्रीमियम सेगमेंट में भी जगह बनाने की कोशिश की।
साइकिल सुगंध मल्लिका इसका एक उदाहरण था। इसे 10 स्टिक्स के एक पैक के रूप में एक रुपये की कीमत पर पेश किया गया। यह उस समय सामान्य अगरबत्ती की तुलना में महंगा उत्पाद था।
लेकिन ग्राहक अच्छी खुशबू और बेहतर गुणवत्ता के लिए अधिक कीमत देने को तैयार थे। उत्पाद की सफलता ने कंपनी को यह भरोसा दिया कि अगर गुणवत्ता और अनुभव बेहतर हो, तो भारतीय ग्राहक प्रीमियम उत्पाद खरीदने से पीछे नहीं हटेंगे।
मार्केटिंग में भी अपनाया अलग तरीका
साइकिल प्योर की सफलता में सिर्फ उत्पादों की भूमिका नहीं रही। कंपनी ने वितरण और मार्केटिंग के क्षेत्र में भी अलग रणनीतियां अपनाईं।
दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर वैन ऑपरेशन शुरू किए गए। इससे कंपनी को अपने उत्पादों को अलग-अलग इलाकों तक पहुंचाने में मदद मिली।
यह रणनीति उस दौर में खास थी, क्योंकि कंपनियां आज की तरह डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं। ऐसे समय में जमीनी स्तर पर उत्पाद पहुंचाना और ग्राहक तक सीधे जाना ही ब्रांड विस्तार का बड़ा माध्यम था।
अगरबत्ती से आगे बढ़ा कारोबार
समय के साथ कंपनी ने सिर्फ अगरबत्ती तक खुद को सीमित नहीं रखा। अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई ब्रांड और उत्पाद लॉन्च किए गए।
आज NR Group के कारोबार में अगरबत्ती के अलावा फ्रेगरेंस और अन्य संबंधित उत्पाद भी शामिल हैं। कंपनी ने पारंपरिक कारोबार को आधुनिक उत्पादों और नई तकनीक के साथ जोड़ने की कोशिश की है।
इस तरह एक छोटे कारोबारी प्रयोग से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे एक बड़े बिजनेस ग्रुप में बदल गया।
पर्यावरण पर भी दिया जोर
साइकिल प्योर की कहानी में पर्यावरण से जुड़ा पहलू भी महत्वपूर्ण है। कंपनी ने अपने कारोबार में पर्यावरण के अनुकूल प्रक्रियाओं और पैकेजिंग पर जोर दिया है।
कंपनी की ओर से इसे दुनिया की पहली जीरो कार्बन/कार्बन न्यूट्रल अगरबत्ती निर्माता कंपनियों में शामिल बताया गया है। हालांकि, ऐसे पर्यावरणीय दावों को समझते समय कंपनी द्वारा इस्तेमाल की गई विशिष्ट प्रमाणन और मानकों की जानकारी को अलग से देखना जरूरी है।
फिर भी यह दिखाता है कि पारंपरिक अगरबत्ती उद्योग में भी कंपनियां अब पर्यावरण और टिकाऊ उत्पादन को अपनी कारोबारी रणनीति का हिस्सा बना रही हैं।
छोटे कारोबार से हजारों करोड़ के समूह तक
एन. रंगा राव की कहानी सिर्फ एक अगरबत्ती कंपनी की सफलता की कहानी नहीं है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर किसी कारोबार में ब्रांडिंग, गुणवत्ता, मार्केटिंग और ग्राहक की जरूरतों को समझने पर लगातार काम किया जाए, तो वह स्थानीय बाजार से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकता है।
1940 के दशक में घर से शुरू हुआ कारोबार आज एक बड़े बिजनेस ग्रुप का रूप ले चुका है। साइकिल प्योर की पहचान भी इसी लंबे सफर का परिणाम है।
सबसे खास बात यह है कि इस कहानी की शुरुआत किसी बड़े कारोबारी परिवार या विशाल पूंजी से नहीं हुई थी। एक छोटे गांव में पले-बढ़े व्यक्ति ने पहले परिवार की जिम्मेदारी संभाली, नौकरी की, फिर आजादी के बाद अपना कारोबार शुरू किया और वर्षों की मेहनत से उसे एक पहचान दी।
यही वजह है कि एन. रंगा राव की कहानी भारतीय उद्यमिता की उन कहानियों में शामिल होती है, जहां छोटा-सा विचार समय के साथ एक बड़े ब्रांड में बदल जाता है।


