Gold Price Update: दुनिया के कई देश अब अमेरिका में रखे अपने सोने के भंडार को वापस मंगा रहे हैं या उसे दूसरे सुरक्षित ठिकानों पर ट्रांसफर कर रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और किसी बड़े वैश्विक संकट की स्थिति में सोने तक जल्द पहुंच सुनिश्चित करना है। नीदरलैंड, फ्रांस और भारत जैसे देशों ने हाल के वर्षों में अपने गोल्ड रिजर्व की लोकेशन में बड़े बदलाव किए हैं। इसका असर आने वाले समय में ग्लोबल गोल्ड मार्केट और कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
Highlights
- कई देशों ने अमेरिका में रखे अपने सोने को दूसरे ठिकानों पर शिफ्ट किया है।
- भू-राजनीतिक तनाव और संकट के समय गोल्ड तक आसान पहुंच बड़ी वजह है।
- लंदन दुनिया के सबसे बड़े होलसेल गोल्ड मार्केट के रूप में अहम बना हुआ है।
- भारत ने भी विदेशों में रखे अपने गोल्ड रिजर्व का बड़ा हिस्सा घरेलू वॉल्ट में ट्रांसफर किया है।
- सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीदारी से सोने की कीमतों को सपोर्ट मिलने की उम्मीद है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। Gold Price Today में इन दिनों काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। कभी सोने की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई की ओर बढ़ती है तो कभी मुनाफावसूली के कारण इसमें तेज गिरावट आ जाती है। लेकिन ग्लोबल गोल्ड मार्केट में सिर्फ कीमतों का बदलाव ही चर्चा में नहीं है।
दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व की लोकेशन बदलने में जुटे हैं। खासतौर पर अमेरिका में रखे सोने को लेकर कुछ देशों ने अपनी रणनीति बदली है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह अमेरिका पर भरोसा कम होने का संकेत है या फिर केंद्रीय बैंक भविष्य के किसी बड़े संकट के लिए पहले से तैयारी कर रहे हैं?
नीदरलैंड ने अमेरिका से सोना क्यों शिफ्ट किया?
इस मामले में नीदरलैंड का कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। De Nederlandsche Bank (DNB) ने उत्तरी अमेरिका में रखे अपने सोने के एक बड़े हिस्से को लंदन ट्रांसफर किया है।
डच केंद्रीय बैंक ने इस बदलाव के पीछे भू-राजनीतिक तनाव और संकट के समय अपने गोल्ड रिजर्व तक तेजी से पहुंच बनाने की जरूरत को प्रमुख वजह बताया है।
DNB के पास कुल करीब 612.4 टन सोना है। 2025 के अंत तक इसकी कीमत लगभग 72.2 अरब यूरो आंकी गई थी।
पहले DNB के कुल सोने का करीब 31.3% न्यूयॉर्क और 19.7% ओटावा में रखा था। हालांकि, मार्च से अगस्त के बीच करीब 86 टन सोना लंदन ट्रांसफर किया गया।
इस बदलाव के बाद न्यूयॉर्क और ओटावा में DNB के पास लगभग 18.5%-18.5% सोना रह गया, जबकि लंदन में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर करीब 32% हो गई।
पूरा ऑपरेशन कैसे हुआ?
यह पूरी प्रक्रिया ऐसी नहीं थी कि सारा सोना एक जगह से दूसरी जगह फिजिकल तौर पर ट्रकों या विमानों से ले जाया गया हो।
रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 27 टन सोना उत्तरी अमेरिका से नीदरलैंड के Zeist स्थित वॉल्ट में लाया गया और लगभग इतनी ही मात्रा को बाद में लंदन भेजा गया।
वहीं करीब 59 टन सोने को न्यूयॉर्क में बेच दिया गया और उसके बदले लंदन में नया सोना खरीदा गया।
यानी बड़े हिस्से के मामले में वास्तविक बार को एक देश से दूसरे देश ले जाने के बजाय गोल्ड की लोकेशन और ओनरशिप को वित्तीय लेनदेन के जरिए बदला गया।
लंदन ही क्यों बना नया ठिकाना?
इसके पीछे एक बड़ा कारण लंदन का ग्लोबल गोल्ड मार्केट में दबदबा है।
लंदन दुनिया के सबसे बड़े होलसेल गोल्ड ट्रेडिंग सेंटर में शामिल है। Bank of England के पास भी बड़ी मात्रा में गोल्ड बार सुरक्षित रखे जाते हैं।
लंदन में रखे गोल्ड को कई परिस्थितियों में फिजिकल तौर पर दूसरी जगह ले जाने की जरूरत नहीं होती। उसकी ओनरशिप ट्रांसफर करके ही ट्रेडिंग की जा सकती है।
केंद्रीय बैंकों के लिए यह व्यवस्था खास तौर पर संकट के समय महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर किसी देश को अचानक विदेशी मुद्रा या नकदी की जरूरत पड़े, तो लंदन के गोल्ड मार्केट के जरिए रिजर्व को अपेक्षाकृत आसानी से लिक्विड एसेट में बदला जा सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदली सोच?
केंद्रीय बैंकों की गोल्ड रिजर्व रणनीति में बड़ा बदलाव 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद देखने को मिला।
पश्चिमी देशों ने रूस के केंद्रीय बैंक के बड़े हिस्से के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया था। इस घटना ने दुनिया भर के रिजर्व मैनेजर्स को यह सोचने पर मजबूर किया कि किसी दूसरे देश में रखा विदेशी एसेट हमेशा संकट के समय उसी तरह उपलब्ध रहेगा, यह जरूरी नहीं है।
यही वजह है कि कई केंद्रीय बैंक अब अपने रिजर्व में भौतिक सोने की मात्रा बढ़ाने के साथ-साथ उसकी लोकेशन पर भी दोबारा विचार कर रहे हैं।
फ्रांस ने भी अमेरिका से निकाला अपना गोल्ड
फ्रांस ने भी अपने गोल्ड रिजर्व को लेकर महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
Banque de France ने जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच न्यूयॉर्क फेड में रखा करीब 129 टन सोना यूरोप वापस मंगा लिया।
इससे यह संकेत मिलता है कि कुछ यूरोपीय देश अपने गोल्ड रिजर्व को अपने क्षेत्र के भीतर रखने को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
हालांकि, सभी देश अमेरिका से सोना निकालने की रणनीति नहीं अपना रहे हैं।
जर्मनी की रणनीति अलग
जर्मनी के Bundesbank का करीब एक-तिहाई गोल्ड रिजर्व अभी भी न्यूयॉर्क में रखा हुआ है।
जर्मनी का मानना है कि न्यूयॉर्क में गोल्ड रखने के पीछे पर्याप्त कानूनी और सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है। इसलिए उसने नीदरलैंड या फ्रांस जैसी पूरी तरह अलग रणनीति नहीं अपनाई है।
इससे साफ है कि केंद्रीय बैंकों के बीच गोल्ड रिजर्व की लोकेशन को लेकर एक जैसी नीति नहीं है।
भारत ने भी विदेश से वापस मंगाया सोना
भारत भी पिछले कुछ वर्षों से अपने गोल्ड रिजर्व की लोकेशन बदल रहा है।
Reserve Bank of India (RBI) ने विदेशों में, खासकर Bank of England और Bank for International Settlements (BIS) से जुड़े कस्टोडियल इंतजामों में रखे गोल्ड का एक बड़ा हिस्सा भारत के घरेलू वॉल्ट में ट्रांसफर किया है।
मार्च 2023 में भारत के कुल गोल्ड रिजर्व का करीब 55% विदेश में रखा था। मार्च 2026 तक यह हिस्सा घटकर करीब 22% रह गया।
इसका मतलब यह है कि भारत के गोल्ड रिजर्व का बड़ा हिस्सा अब देश के भीतर सुरक्षित रखा जा रहा है।
क्या इससे सोने की कीमत बढ़ेगी?
गोल्ड की कीमतों के लिए केंद्रीय बैंकों की खरीदारी पहले से ही एक बड़ा सपोर्ट फैक्टर बनी हुई है।
Goldman Sachs के अनुमान के मुताबिक, केंद्रीय बैंक औसतन हर महीने करीब 50 टन सोना खरीद रहे हैं, जिसमें चीन की खरीदारी भी अहम भूमिका निभा रही है।
अगर केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीदते रहे और भू-राजनीतिक तनाव बना रहा, तो ग्लोबल मार्केट में सोने की मांग मजबूत रह सकती है।
इसी आधार पर Goldman Sachs ने 2026 के अंत तक सोने की कीमत करीब 4,900 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचने का अनुमान जताया है।
अमेरिका के लिए इसका क्या मतलब?
यह कहना सही नहीं होगा कि दूसरे देशों द्वारा गोल्ड की लोकेशन बदलने से अमेरिका का खजाना अचानक खाली हो रहा है। दरअसल, यहां मामला अमेरिकी गोल्ड रिजर्व को निकालने का नहीं, बल्कि दूसरे देशों के अपने सोने को अमेरिका से दूसरी जगह रखने का है।
फिर भी यह बदलाव वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है।
केंद्रीय बैंक अब सिर्फ इस बात पर ध्यान नहीं दे रहे कि उनके पास कितना सोना है, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर वह सोना कितनी जल्दी और कितनी आसानी से उनके नियंत्रण में उपलब्ध हो सकता है।
यही वजह है कि लंदन, यूरोप और घरेलू वॉल्ट जैसे विकल्पों की अहमियत बढ़ रही है। अगर दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता आगे भी बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंकों की यह रणनीति ग्लोबल गोल्ड मार्केट को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।


