नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस की आय पर चोट पहुंचाने के लिए उसके कच्चे तेल और ऊर्जा उत्पादों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए। उद्देश्य साफ था कि रूस को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से अलग करके उसकी आर्थिक ताकत कमजोर की जाए। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट ने दिखाया है कि प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल वैश्विक बाजार में अपना रास्ता खोजने में सफल रहा है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार रूस का कच्चा तेल सीधे पश्चिमी देशों में भले ही नहीं पहुंच रहा हो, लेकिन उसे भारत, तुर्की, ब्रुनेई और जॉर्जिया जैसे देशों में रिफाइन कर पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में उन्हीं देशों को बेचा जा रहा है जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं।
कैसे काम कर रहा है यह लूपहोल?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुसार जब किसी देश का कच्चा तेल किसी दूसरे देश की रिफाइनरी में प्रोसेस होकर नया उत्पाद बन जाता है तो उसका मूल देश (Country of Origin) बदल सकता है। यही वह कानूनी खामी या लूपहोल है जिसका फायदा रूस को मिल रहा है।
उदाहरण के तौर पर रूस से खरीदा गया कच्चा तेल भारत की रिफाइनरियों में पहुंचता है। यहां इसे पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और अन्य उत्पादों में बदला जाता है। इसके बाद ये उत्पाद यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों को निर्यात किए जाते हैं। तकनीकी रूप से इन्हें भारतीय या अन्य देशों के उत्पाद माना जाता है, इसलिए इन पर रूसी तेल वाला प्रतिबंध लागू नहीं होता।
मई 2026 में हुई ₹7052 करोड़ की बिक्री
CREA की रिपोर्ट के मुताबिक मई 2026 में भारत, तुर्की, ब्रुनेई और जॉर्जिया की रिफाइनरियों ने कुल 641 मिलियन यूरो (करीब 7052 करोड़ रुपये) मूल्य के पेट्रोलियम उत्पाद उन देशों को निर्यात किए जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं।
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि इस कुल व्यापार में लगभग 214 मिलियन यूरो मूल्य के उत्पाद सीधे रूसी कच्चे तेल से तैयार किए गए थे। यानी प्रतिबंध लगाने वाले देशों ने अप्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल से बने उत्पादों की खरीद जारी रखी।
किन देशों ने खरीदे ये उत्पाद?
रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 के दौरान प्रतिबंध लगाने वाले देशों ने निम्नलिखित मात्रा में रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद खरीदे:
- ऑस्ट्रेलिया – 275 मिलियन यूरो
- यूरोपीय संघ – 174 मिलियन यूरो
- अमेरिका – 147 मिलियन यूरो
- न्यूजीलैंड – 45 मिलियन यूरो
ये आंकड़े दिखाते हैं कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंध पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हो पाए हैं और वैश्विक ऊर्जा बाजार में वैकल्पिक रास्ते लगातार इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
भारत की भूमिका क्यों अहम है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और उसके पास विशाल रिफाइनिंग क्षमता मौजूद है। रूस द्वारा रियायती दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने बड़ी मात्रा में रूसी तेल की खरीद बढ़ाई।
भारतीय कंपनियों ने सस्ता कच्चा तेल खरीदकर उसे प्रोसेस किया और वैश्विक बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई और निर्यात आय में भी बढ़ोतरी देखने को मिली।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन किए बिना अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी है। चूंकि भारत ने रूस पर पश्चिमी देशों की तरह कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, इसलिए रूसी तेल खरीदना पूरी तरह वैध माना जाता है।
जामनगर रिफाइनरी का नाम भी आया सामने
CREA की रिपोर्ट में उन प्रमुख रिफाइनरियों का भी उल्लेख किया गया है जहां रूसी कच्चे तेल को प्रोसेस किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका को निर्यात किए गए कई पेट्रोलियम उत्पादों का स्रोत भारत की गुजरात स्थित जामनगर रिफाइनरी रही है। यह रिफाइनरी दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग परिसंपत्तियों में गिनी जाती है और इसकी संचालन क्षमता बेहद विशाल है।
इसके अलावा तुर्की की स्टार रिफाइनरी और तुप्रास इजमित रिफाइनरी का भी उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
रूस से कितना तेल आता है?
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार पिछले तीन महीनों के दौरान:
- तुर्की की स्टार रिफाइनरी के कुल फीडस्टॉक का 39% हिस्सा रूस से आया।
- भारत की जामनगर रिफाइनरी के कुल फीडस्टॉक का लगभग 15% हिस्सा रूसी कच्चे तेल पर आधारित था।
हालांकि जामनगर रिफाइनरी विभिन्न देशों से तेल खरीदती है, लेकिन रूसी तेल उसके लिए महत्वपूर्ण स्रोतों में शामिल बना हुआ है।
क्या पश्चिमी देशों के प्रतिबंध कमजोर पड़ रहे हैं?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के व्यापार से यह संकेत मिलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में प्रतिबंधों को पूरी तरह लागू करना बेहद कठिन है। तेल एक वैश्विक कमोडिटी है और कई बार उसका स्रोत अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते बदल जाता है।
यही वजह है कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिशों के बावजूद उसकी ऊर्जा आय पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है। भारत, चीन, तुर्की और अन्य देशों की खरीदारी ने रूस को बड़ा राहत कवच प्रदान किया है।
आगे क्या हो सकता है?
यूरोपीय संघ और अमेरिका भविष्य में ऐसे लूपहोल को बंद करने के लिए नए नियम ला सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक सप्लाई चेन इतनी जटिल हो चुकी है कि किसी भी देश के तेल की अंतिम उत्पत्ति का पता लगाना आसान नहीं होता।
फिलहाल इतना तय है कि रूस ने वैश्विक ऊर्जा व्यापार की इसी जटिलता का फायदा उठाकर अपने तेल को बाजार में बनाए रखा है। वहीं भारत ने अपनी रिफाइनिंग क्षमता और व्यापारिक रणनीति के जरिए इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
निष्कर्ष
रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों का उद्देश्य उसकी तेल आय को सीमित करना था, लेकिन CREA की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में मौजूद कानूनी और व्यापारिक लूपहोल्स ने इस रणनीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत समेत कई देशों की रिफाइनरियों के जरिए रूसी तेल से बने उत्पाद फिर उन्हीं देशों तक पहुंच रहे हैं जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे। इससे साफ है कि ऊर्जा बाजार में भू-राजनीति और व्यापारिक हित अक्सर एक-दूसरे से टकराते रहते हैं।


