मई 2026 में भारत ने रूस से करीब 64 हजार करोड़ रुपये का कच्चा तेल, तेल उत्पाद और कोयला खरीदा। जानिए जामनगर, वाडिनर और पारादीप रिफाइनरी में रूसी तेल की बढ़ती आवक का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा।
भारत के लिए रूसी तेल क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में सस्ता रूसी कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस ने एशियाई देशों को रियायती दरों पर तेल बेचना शुरू किया था। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत और चीन को मिला।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत को रूस से रियायती दरों पर तेल मिलता रहता है तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम रहेगा। इसके साथ ही रिफाइनिंग कंपनियों के मार्जिन में भी सुधार देखने को मिल सकता है।
भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को क्या फायदा?
रूस से आयात होने वाला कच्चा तेल भारत की कई बड़ी रिफाइनरियों के लिए लाभदायक साबित हुआ है। जामनगर, वाडिनर, पारादीप, विशाखापत्तनम और न्यू मैंगलोर जैसे रिफाइनिंग हब कम लागत पर कच्चा तेल खरीदकर पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन कर रहे हैं।
कम कीमत पर कच्चा तेल मिलने से भारतीय कंपनियां घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ डीजल, पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी बढ़ा सकती हैं। इससे विदेशी मुद्रा आय बढ़ने में मदद मिलती है और देश के व्यापार संतुलन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
क्या रूस पर भारत की निर्भरता बढ़ रही है?
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि रूस वर्तमान में भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है, लेकिन भारत केवल एक देश पर निर्भर रहने की रणनीति नहीं अपना रहा है। भारत लगातार मध्य पूर्व, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल आयात कर रहा है।
सरकार का लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना है ताकि किसी भी वैश्विक संकट या भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर देश की ऊर्जा आपूर्ति पर न पड़े।
आम लोगों पर इसका क्या असर होगा?
रूसी तेल का आयात बढ़ना आम उपभोक्ताओं के लिए भी राहत की खबर माना जा सकता है। यदि भारत को सस्ता कच्चा तेल मिलता रहता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी का जोखिम कम हो सकता है। साथ ही परिवहन लागत नियंत्रित रहने से महंगाई पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।
हालांकि तेल की अंतिम कीमतें केवल आयात लागत पर निर्भर नहीं करतीं। इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स संरचना, डॉलर-रुपया विनिमय दर और सरकारी नीतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आगे क्या?
ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार आने वाले महीनों में रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिमी देशों के प्रतिबंध और वैश्विक मांग-आपूर्ति की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा। यदि रूस एशियाई बाजारों को रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराता रहता है तो भारत की रिफाइनरियां इसका लाभ उठाती रहेंगी। वहीं किसी नए प्रतिबंध या आपूर्ति बाधा की स्थिति में वैश्विक तेल बाजार में फिर से उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।


