भारत में मानसून की चाल इस बार चिंता बढ़ा रही है। स्काईमेट वेदर सर्विसेज ने इस मानसून सीजन में सूखे की संभावना बढ़ाकर 70 फीसदी कर दी है। एजेंसी के चेयरमैन जतिन सिंह के मुताबिक, जून से शुरू हुई बारिश की कमी सितंबर तक जारी रह सकती है। इसके पीछे मजबूत अल नीनो और कमजोर समुद्री संकेतों को प्रमुख वजह माना जा रहा है। बारिश में लगातार कमी का असर खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बिजली और देश की GDP पर भी पड़ सकता है।
भारत में मानसूनी बारिश की स्थिति लगातार चिंता का विषय बनती जा रही है। अगस्त के पहले पखवाड़े में लगभग हर दिन बारिश मासिक औसत से कम रही। इसके चलते अगस्त की बारिश का घाटा महीने की शुरुआत के करीब 11 फीसदी से बढ़कर 13 फीसदी हो गया है। जून से चली आ रही कमी और अगस्त में कमजोर बारिश को देखते हुए इस मानसून के सामान्य स्तर तक पहुंचने की संभावना अब काफी कम मानी जा रही है।
स्काईमेट वेदर सर्विसेज के संस्थापक और चेयरमैन जतिन सिंह ने CNBC-TV18 को दिए इंटरव्यू में मानसून की मौजूदा स्थिति, सूखे के जोखिम और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित असर को लेकर जानकारी दी। उनके मुताबिक, इस सीजन में सूखे की संभावना अब बढ़कर 70 फीसदी हो गई है।
अगस्त और सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान
जतिन सिंह के मुताबिक, अगस्त और सितंबर में बारिश मासिक औसत के करीब 85 फीसदी के आसपास रह सकती है। ऐसे में इस मानसून सीजन के सामान्य से अधिक बारिश के साथ खत्म होने की संभावना लगभग शून्य है।
उनके अनुसार इस समय सामान्य से कम बारिश की संभावना करीब 80 फीसदी है, जबकि सूखे का जोखिम 70 फीसदी तक पहुंच गया है। सबसे बेहतर स्थिति यह हो सकती है कि पूरे सीजन में बारिश सामान्य औसत के 90 से 95 फीसदी तक पहुंच जाए। साल 2023 में भी मानसून लगभग इसी दायरे में रहा था।
हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में 90 फीसदी से कम बारिश सबसे संभावित परिदृश्य दिखाई दे रहा है। अगर ऐसा होता है तो देश के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता और कृषि गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।
अल नीनो बना बारिश की कमी की बड़ी वजह
स्काईमेट के मुताबिक, इस मानसून में बारिश की कमी के पीछे अल नीनो एक प्रमुख कारण है। जतिन सिंह ने बताया कि दक्षिण प्रशांत महासागर में अल नीनो की परिस्थितियां बनने के संकेत मिलने के बाद ही दिसंबर 2022 में सामान्य से कम मानसून के जोखिम को लेकर चेतावनी दी गई थी।
ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर अल नीनो वाले वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश होने का जोखिम काफी अधिक रहता है। हालांकि इस बार इंडियन ओशन डिपोल यानी IOD से बारिश की कमी की भरपाई की उम्मीद थी। IOD पॉजिटिव जरूर हुआ, लेकिन इसकी ताकत इतनी नहीं रही कि वह अल नीनो के प्रभाव को पूरी तरह कम कर सके।
इंडियन ओशन डिपोल हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री तापमान में अंतर से जुड़ी स्थिति है। अतीत में 1997 और 2019 जैसे वर्षों में मजबूत पॉजिटिव IOD देखने को मिला था।
सूखे से GDP पर पड़ सकता है बड़ा असर
बारिश में कमी का सबसे सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती की महत्वपूर्ण भूमिका है और कमजोर मानसून से फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और मांग प्रभावित होने का खतरा रहता है।
जतिन सिंह ने ऐतिहासिक आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पिछले 60-70 वर्षों के रुझानों में सूखे वाले वर्षों में भारत की GDP पर करीब 1 फीसदी तक का नकारात्मक असर देखने को मिला है।
सूखे का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। बिजली उत्पादन, ग्रामीण खपत, कृषि आधारित उद्योग और पानी की उपलब्धता जैसे कई क्षेत्रों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। खासतौर पर अगर बारिश की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो ग्रामीण मांग और कृषि आय पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि सरकार के पास खाद्य भंडार और सप्लाई मैनेजमेंट जैसे उपाय मौजूद हैं। इसकी वजह से फिलहाल खाद्य कीमतों पर बहुत बड़ा दबाव दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन लंबे समय तक बारिश की कमी रहने पर महंगाई का जोखिम दोबारा बढ़ सकता है।
मानसून की समय से पहले विदाई का खतरा
इस साल मानसून के सामान्य समय से पहले विदा होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। जतिन सिंह ने 2009 का उदाहरण देते हुए बताया कि उस साल अगस्त के बाद बारिश की वापसी नहीं हुई थी।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी से मानसून की समय से पहले विदाई को लेकर निश्चित भविष्यवाणी करना मुश्किल है। आने वाले हफ्तों में समुद्री परिस्थितियों और बारिश के पैटर्न पर काफी कुछ निर्भर करेगा।
लगातार दो वर्षों तक अल नीनो का बने रहना और लगातार दो सूखे पड़ना भी बेहद दुर्लभ स्थिति है। इतिहास में ऐसी स्थिति 1966-67 और 2014-15 के दौरान देखने को मिली थी। मौजूदा अल नीनो अगले साल जनवरी तक बने रहने की संभावना भी जताई गई है।
इन राज्यों में बढ़ सकती है पानी और खेती की चिंता
स्काईमेट ने देश के कई प्रमुख कृषि राज्यों में बारिश की कमी को लेकर चिंता जताई है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना को बारिश की कमी के लिहाज से संवेदनशील राज्यों में रखा गया है।
असम में हाल में बाढ़ की स्थिति बनी थी, लेकिन इसके बावजूद वहां पूरे मानसून सीजन की बारिश सामान्य से कम रहने की बात कही गई है। वहीं IMD के मौजूदा आंकड़ों में मराठवाड़ा बारिश की कमी के लिहाज से गंभीर स्थिति वाले क्षेत्रों में शामिल है।
अगर अगस्त के बाकी दिनों और सितंबर में भी बारिश कमजोर रहती है तो इन राज्यों में जलाशयों और नदियों में पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
रबी फसल पर भी पड़ सकता है असर
कमजोर मानसून का असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव आने वाले रबी सीजन पर भी पड़ सकता है। जिन इलाकों में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं है, वहां मिट्टी में नमी और जल स्रोतों की स्थिति रबी फसलों के लिए महत्वपूर्ण होगी।
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपेक्षाकृत बेहतर सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर हैं, जबकि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में मानसूनी बारिश तथा नदी-जलाशयों की स्थिति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अगर मानसून के बाकी हिस्से में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो रबी सीजन के दौरान पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है। इसका असर गेहूं, चना, सरसों और दूसरी रबी फसलों की बुवाई पर पड़ने की आशंका रहेगी।
आगे क्या रहेगा सबसे बड़ा जोखिम?
फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि मानसून की शुरुआती कमी की भरपाई आने वाले हफ्तों में कितनी हो पाती है। अगस्त के पहले पखवाड़े में बारिश कमजोर रहने से स्थिति पहले के मुकाबले और चुनौतीपूर्ण हुई है।
अगर अगस्त और सितंबर में बारिश सामान्य से काफी नीचे रहती है तो सूखे का जोखिम और बढ़ सकता है। इसका असर कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय, खाद्य महंगाई, बिजली और अंततः आर्थिक विकास की रफ्तार पर पड़ सकता है।
हालांकि मानसून के अंतिम आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं। इसलिए आने वाले दिनों में बारिश के पैटर्न, समुद्री परिस्थितियों और क्षेत्रीय स्तर पर वर्षा की स्थिति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।


