भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल Adani Group अब अपने बिजनेस मॉडल में एक बड़ा और रणनीतिक बदलाव करने जा रहा है। समूह अब दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Apple की तर्ज पर “एक्सटेंडेड एंटरप्राइज मॉडल” अपनाने की तैयारी में है। इसका मतलब यह है कि कंपनी भविष्य में अपने कई ऑपरेशनल काम बाहरी वेंडर्स और पार्टनर कंपनियों से करवाएगी, जबकि रिसर्च, डिजाइन, फाइनेंस और रणनीतिक फैसले अपने नियंत्रण में रखेगी।
यह बदलाव सिर्फ कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर तक सीमित नहीं है। इसके साथ ही समूह ने बाहरी भर्ती को लगभग रोकने, आंतरिक कर्मचारियों को प्रमोट करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए नया “3-लेयर मैनेजमेंट मॉडल” लागू करने की दिशा में भी काम शुरू कर दिया है।
यह बदलाव ऐसे समय पर हो रहा है जब अदाणी समूह अगले पांच वर्षों में लगभग ₹2 लाख करोड़ से अधिक निवेश की तैयारी कर रहा है। ऐसे में ग्रुप अपने तेजी से फैलते कारोबार को ज्यादा चुस्त, कम खर्चीला और तेज निर्णय क्षमता वाला बनाना चाहता है।
आखिर क्या है Apple मॉडल, जिसे अपनाने जा रहा है अदाणी ग्रुप?
दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल Apple खुद अपने अधिकांश प्रोडक्ट्स का निर्माण नहीं करती। कंपनी अपने iPhone और दूसरे डिवाइसेज के कई पार्ट्स अलग-अलग कंपनियों से बनवाती है। उदाहरण के लिए डिस्प्ले सैमसंग बनाती है, कैमरा सेंसर सोनी तैयार करती है और चिप्स का निर्माण TSMC जैसी कंपनियां करती हैं, जबकि असेंबलिंग का बड़ा हिस्सा Foxconn संभालती है।
इसके बावजूद डिजाइन, सॉफ्टवेयर, रिसर्च, ब्रांडिंग और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर पूरा नियंत्रण Apple के पास ही रहता है। इसी मॉडल को अब अदाणी समूह भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से अपनाने की दिशा में बढ़ रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, समूह लॉजिस्टिक्स, इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और साइट-लेवल ऑपरेशंस जैसे कई कार्यों के लिए एक मजबूत थर्ड-पार्टी वेंडर नेटवर्क विकसित कर रहा है। जबकि बिजनेस स्ट्रैटेजी, फाइनेंस, टेक्नोलॉजी कंट्रोल और डिज़ाइन जैसी मुख्य जिम्मेदारियां समूह के पास ही रहेंगी।
क्यों जरूरी पड़ा इतना बड़ा बदलाव?
पिछले कुछ वर्षों में Adani Group ने पोर्ट्स, एयरपोर्ट, ग्रीन एनर्जी, सीमेंट, डेटा सेंटर, ट्रांसमिशन और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कई सेक्टर्स में तेजी से विस्तार किया है। समूह की कई लिस्टेड और अनलिस्टेड कंपनियां अब हजारों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स संभाल रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे कंपनी का आकार बढ़ता है, वैसे-वैसे पारंपरिक कॉर्पोरेट ढांचा धीमा और महंगा होने लगता है। ऐसे में आउटसोर्सिंग आधारित मॉडल कंपनी को कई फायदे दे सकता है:
- पूंजीगत खर्च कम होगा
- प्रोजेक्ट्स तेजी से पूरे होंगे
- फिक्स्ड कर्मचारी लागत घटेगी
- मैनेजमेंट रणनीतिक फैसलों पर ज्यादा ध्यान दे सकेगा
- अलग-अलग सेक्टर्स में स्केलिंग आसान होगी
यानी कंपनी अब “कम लोगों से ज्यादा काम” वाले मॉडल की ओर बढ़ रही है।
अदाणी ग्रुप में बाहरी भर्ती पर क्यों लग रही रोक?
इस बदलाव का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला हिस्सा है “लेटरल हायरिंग फ्रीज” यानी बाहर से अनुभवी अधिकारियों की भर्ती को सीमित करना। रिपोर्ट्स के मुताबिक, समूह ने अपनी कंपनियों को निर्देश दिया है कि खाली पदों को पहले आंतरिक जॉब पोर्टल के जरिए भरा जाए। अगर किसी पद के लिए ग्रुप के भीतर उपयुक्त कर्मचारी नहीं मिलता, तभी बाहर से भर्ती की अनुमति दी जाएगी।
बताया जा रहा है कि इसके लिए समूह के एचआर प्रमुख और Karan Adani की मंजूरी जरूरी होगी। हाल ही में लेबर डे कार्यक्रम के दौरान Gautam Adani ने भी संकेत दिए थे कि वे भविष्य में समूह को “घरेलू प्रतिभाओं” के दम पर चलाना चाहते हैं। उनका फोकस अब लंबे समय तक कंपनी के साथ जुड़े कर्मचारियों को नेतृत्व की भूमिका देने पर है।
क्या है नया 3-लेयर फॉर्मूला?
अदाणी समूह अब अपने संगठनात्मक ढांचे को सरल बनाने के लिए “3-लेयर रिपोर्टिंग स्ट्रक्चर” लागू कर रहा है। पहले कई स्तरों वाली मैनेजमेंट प्रणाली में फैसले लेने में समय लगता था। अब इसे घटाकर सिर्फ तीन मुख्य स्तरों तक सीमित किया जा रहा है:
- हेड ऑफिस लेयर
- साइट लेयर
- शॉप फ्लोर लेयर
इसका सीधा मतलब यह है कि साइट पर काम करने वाले अधिकारी और कर्मचारी सीधे उच्च प्रबंधन से जुड़ सकेंगे। इससे फैसले तेजी से होंगे, जवाबदेही स्पष्ट होगी, कम्युनिकेशन गैप घटेगा, प्रोजेक्ट्स की निगरानी बेहतर होगी कॉर्पोरेट विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल खासतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काफी प्रभावी साबित हो सकता है, जहां देरी से लागत बढ़ जाती है।
अगले 5 साल में ₹2 लाख करोड़ निवेश का प्लान
ब्लूमबर्ग और अन्य बिजनेस रिपोर्ट्स के मुताबिक, Adani Group अगले पांच वर्षों में लगभग ₹2 लाख करोड़ से अधिक का कैपेक्स निवेश करने की तैयारी में है। यह निवेश ग्रीन एनर्जी, एयरपोर्ट्स, डेटा सेंटर, ट्रांसमिशन, पोर्ट्स और सीमेंट कारोबार में किया जा सकता है।
वित्त वर्ष 2026 के शुरुआती नौ महीनों में समूह का EBITDA ₹92,000 करोड़ से अधिक रहने की जानकारी भी सामने आई है। इससे साफ है कि समूह अपने अगले ग्रोथ फेज की तैयारी में है और उसी हिसाब से कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को नया रूप दिया जा रहा है।
क्या इस मॉडल में जोखिम भी हैं?
हालांकि यह मॉडल लागत घटाने और दक्षता बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन इसके कुछ बड़े जोखिम भी हैं। रिस्क एडवाइजरी एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब कोई कंपनी थर्ड-पार्टी वेंडर्स पर ज्यादा निर्भर हो जाती है, तो कई नई चुनौतियां सामने आती हैं:
1. साइबर सिक्योरिटी रिस्क
अगर बाहरी कंपनियों के सिस्टम कमजोर हुए तो डेटा लीक और साइबर अटैक का खतरा बढ़ सकता है।
2. ESG और लेबर कंप्लायंस
वेंडर कंपनियों द्वारा श्रम कानूनों या पर्यावरण नियमों का उल्लंघन समूह की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
3. क्वालिटी कंट्रोल
आउटसोर्सिंग मॉडल में अलग-अलग कंपनियों के बीच गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
4. नई सोच की कमी
अगर कंपनी लगातार सिर्फ अंदर के कर्मचारियों को प्रमोट करेगी, तो बाहरी उद्योग अनुभव और नई रणनीतिक सोच की कमी हो सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि टेक्नोलॉजी, AI, साइबर सिक्योरिटी और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में भविष्य में भी बाहरी विशेषज्ञों की जरूरत बनी रहेगी।
भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में क्या शुरू होने वाला है नया ट्रेंड?
विश्लेषकों का मानना है कि अगर Adani Group का यह मॉडल सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत के कई बड़े औद्योगिक समूह भी इसी दिशा में बढ़ सकते हैं।
पहले ही कई टेक और ऑटो कंपनियां “एसेट-लाइट मॉडल” की ओर बढ़ रही हैं। अब इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी यही ट्रेंड देखने को मिल सकता है। यानी आने वाले समय में कंपनियां कम स्थायी कर्मचारी रखेंगी, ज्यादा वेंडर नेटवर्क बनाएंगी, टेक्नोलॉजी और डेटा कंट्रोल अपने पास रखेंगी, तेजी से फैसले लेने वाले छोटे मैनेजमेंट मॉडल अपनाएंगी.
निष्कर्ष
Adani Group का नया बिजनेस मॉडल सिर्फ एक कॉर्पोरेट बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग जगत में आने वाले बड़े ट्रेंड का संकेत माना जा रहा है। Apple जैसे वैश्विक मॉडल से प्रेरित यह रणनीति समूह को अधिक तेज, लचीला और लागत-कुशल बना सकती है। हालांकि, इसके साथ साइबर सुरक्षा, वेंडर निर्भरता और इनोवेशन जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। अब देखना होगा कि भारत का यह बड़ा कारोबारी समूह अपने “Apple मॉडल” को कितनी सफलता के साथ जमीन पर उतार पाता है।
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