भारत ने अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने सोमवार को कहा कि सरकार वित्त वर्ष 2027 तक कुल वस्तु और सेवा निर्यात को 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। ऐसे समय में जब दुनिया अमेरिकी टैरिफ विवाद, पश्चिम एशिया तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है, भारत अपने निर्यात प्रदर्शन से दुनिया का ध्यान खींच रहा है।
सरकार का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत का कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 863 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह भारत के निर्यात इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में वह वैश्विक सप्लाई चेन में और मजबूत भूमिका निभा सकता है।
वैश्विक संकट के बीच भारत बना ‘ब्राइट स्पॉट’
नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजरायल तनाव और वैश्विक व्यापारिक अस्थिरता के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं सुस्ती का सामना कर रही हैं, लेकिन भारत का निर्यात लगातार बढ़ रहा है।
गोयल ने कहा कि भारत के मुक्त व्यापार समझौते (FTA) अब वैश्विक व्यापार के दो-तिहाई हिस्से को कवर करने लगे हैं। इससे भारतीय कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच मिल रही है और निर्यातकों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल हो रही है।
ओमान के साथ FTA 1 जून से हो सकता है लागू
भारत और Oman के बीच हुआ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) अब अंतिम कानूनी प्रक्रियाओं से गुजर रहा है। केंद्रीय मंत्री ने उम्मीद जताई कि यह समझौता 1 जून 2026 से लागू हो सकता है। भारत और ओमान ने 18 दिसंबर 2025 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस डील को भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भारतीय उत्पादों को ओमान के बाजार में बड़ी राहत मिलेगी।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत को ओमान की 98.08% टैरिफ लाइनों पर शून्य शुल्क पहुंच मिलेगी। इससे भारत के लगभग 99.38% निर्यात को फायदा होगा। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग, फूड प्रोसेसिंग और केमिकल सेक्टर को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।
वहीं भारत भी अपनी लगभग 78% टैरिफ लाइनों पर शुल्क कम करेगा, जिससे ओमान से आने वाले करीब 95% आयात प्रभावित होंगे। हालांकि सरकार ने संवेदनशील उत्पादों के लिए टैरिफ-रेट कोटा जैसी सुरक्षा व्यवस्था भी रखी है ताकि घरेलू उद्योगों पर ज्यादा दबाव न पड़े।
सिर्फ तेल नहीं, अब नए सेक्टर बनेंगे निर्यात इंजन
भारत लंबे समय तक आईटी सेवाओं और पेट्रोलियम उत्पादों पर काफी निर्भर रहा है, लेकिन अब सरकार निर्यात को विविध बनाने की कोशिश कर रही है। हाल के वर्षों में कई नए सेक्टर तेजी से उभरे हैं इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात, मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन, फार्मा सेक्टर, टेक्सटाइल और गारमेंट्स, कृषि एवं फूड प्रोसेसिंग
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन+1 रणनीति के कारण वैश्विक कंपनियां अब भारत को वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में देख रही हैं। इसका सीधा फायदा भारतीय निर्यात को मिल रहा है।
UAE, ऑस्ट्रेलिया और EFTA के बाद अब EU-UK पर नजर
भारत पहले ही United Arab Emirates, Australia और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) ब्लॉक के साथ व्यापार समझौते लागू कर चुका है। अब सरकार की नजर यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम के साथ बड़े समझौतों पर है।
सूत्रों के मुताबिक भारत-UK FTA इस साल लागू हो सकता है। यूरोपीय संघ के साथ भी वार्ता अंतिम चरण में है। इन समझौतों से भारतीय निर्यातकों को अरबों डॉलर का अतिरिक्त बाजार मिल सकता है। विशेष रूप से ऑटो पार्ट्स, टेक्सटाइल, फार्मा और आईटी सेवाओं को इन डील्स से बड़ा फायदा होने की उम्मीद है।
भारत के लिए क्यों अहम है 2 ट्रिलियन डॉलर निर्यात लक्ष्य?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आर्थिक विस्तार किया है, लेकिन अभी भी चीन जैसे देशों की तुलना में उसका वैश्विक निर्यात हिस्सा काफी कम है। सरकार का मानना है कि यदि निर्यात को मजबूत किया जाए तो करोड़ों नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलेगी, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ेगा, रुपये पर दबाव कम होगा, भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, 2 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए भारत को लॉजिस्टिक्स लागत घटानी होगी, बंदरगाह क्षमता बढ़ानी होगी और MSME सेक्टर को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा।
मध्य पूर्व संकट के बावजूद निर्यात क्यों बढ़ रहा?
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल कीमतों में उछाल ने वैश्विक व्यापार पर दबाव बनाया है। इसके बावजूद भारत का निर्यात बढ़ना कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है:
- नए बाजारों में पहुंच
- एफटीए का बढ़ता नेटवर्क
- उत्पादन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं
- इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में तेजी
- सेवाओं के निर्यात में मजबूत वृद्धि
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक मंदी गहरी नहीं होती तो भारत आने वाले वर्षों में निर्यात के मोर्चे पर और बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
पांच दौर की बातचीत के बाद बनी ओमान डील
भारत-ओमान CEPA पर बातचीत नवंबर 2023 में शुरू हुई थी। लगभग पांच दौर की वार्ताओं के बाद अगस्त 2025 में समझौता अंतिम रूप से तैयार हुआ। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और ओमान के बीच कुल व्यापार 10.61 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 18.6% अधिक है। यह दिखाता है कि खाड़ी देशों में भारत की आर्थिक मौजूदगी लगातार मजबूत हो रही है।
क्या हासिल कर पाएगा भारत अपना लक्ष्य?
भारत के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। वैश्विक मंदी, बढ़ती शिपिंग लागत, भू-राजनीतिक तनाव और संरक्षणवादी नीतियां निर्यात वृद्धि को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन सरकार को उम्मीद है कि लगातार बढ़ते एफटीए नेटवर्क और घरेलू विनिर्माण क्षमता के दम पर भारत अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि भारत निर्यात-आधारित विकास मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर लेता है, तो वह अगले दशक में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
(आईएएनएस इनपुट के साथ)
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