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Reading: सोने पर सरकार ने कब लगाई थी सबसे सख्त लिमिट? आदमी और औरत के लिए थे अलग-अलग नियम, क्या था ‘गोल्ड कंट्रोल कानून’?
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सोने पर सरकार ने कब लगाई थी सबसे सख्त लिमिट? आदमी और औरत के लिए थे अलग-अलग नियम, क्या था ‘गोल्ड कंट्रोल कानून’?

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/18 at 4:46 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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भारत में सोना सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि परंपरा, निवेश और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक, भारतीय परिवारों में सोने की खास अहमियत रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब भारत सरकार ने लोगों के पास रखे जाने वाले सोने की मात्रा तक तय कर दी थी? यहां तक कि पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग लिमिट बनाई गई थी।

Contents
आखिर क्या था गोल्ड कंट्रोल एक्ट?क्यों लाना पड़ा था यह कानून?गोल्ड कंट्रोल एक्ट के तहत क्या-क्या नियम थे?1. शुद्ध सोना खरीदने पर रोक2. गोल्ड होल्डिंग लिमिट तय3. ज्वेलर्स पर सख्त नियंत्रण4. पुराने सोने को पिघलाने पर नियमकानून लागू होने के बाद क्या हुआ?तस्करी तेजी से बढ़ गईज्वेलरी कारोबार प्रभावित हुआजनता में असंतोष बढ़ाआखिर क्यों खत्म करना पड़ा यह कानून?क्या आज फिर ऐसा कानून आ सकता है?भारत में आज भी क्यों इतना लोकप्रिय है सोना?निष्कर्ष

आज जब सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही हैं और देश में गोल्ड इंपोर्ट को लेकर चर्चा तेज है, तब पुराना ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ एक बार फिर चर्चा में आ गया है। यह कानून भारत के आर्थिक इतिहास के सबसे विवादित फैसलों में से एक माना जाता है।

आखिर क्या था गोल्ड कंट्रोल एक्ट?

‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ भारत सरकार द्वारा लागू किया गया एक सख्त कानून था, जिसका उद्देश्य देश में सोने की बढ़ती मांग को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाना था। इसकी शुरुआत 1963 में ‘गोल्ड कंट्रोल रूल्स’ के रूप में हुई थी। बाद में इसे और कठोर बनाते हुए 1968 में पूर्ण कानून यानी “Gold Control Act, 1968” का रूप दिया गया।

उस समय भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर दौर से गुजर रही थी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद देश पर भारी आर्थिक दबाव था। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था और बड़ी मात्रा में सोना आयात होने से सरकार की चिंता बढ़ती जा रही थी।

सरकार का मानना था कि अगर सोने की मांग को सीमित नहीं किया गया तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार गंभीर संकट में आ सकता है।

क्यों लाना पड़ा था यह कानून?

1960 के दशक में भारतीय परिवार बड़ी मात्रा में सोना खरीद रहे थे। उस समय निवेश के विकल्प सीमित थे और लोग अपनी बचत का बड़ा हिस्सा सोने में लगाते थे। इससे देश को भारी मात्रा में सोना विदेशों से आयात करना पड़ता था।

सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम हो रहा था, सोने की तस्करी और कालाबाजारी बढ़ रही थी इन्हीं कारणों से तत्कालीन सरकार ने सोने पर नियंत्रण लगाने का फैसला लिया।

गोल्ड कंट्रोल एक्ट के तहत क्या-क्या नियम थे?

यह कानून आम लोगों से लेकर सर्राफा व्यापारियों तक सभी पर लागू होता था। इसमें कई कड़े प्रावधान शामिल किए गए थे।

1. शुद्ध सोना खरीदने पर रोक

लोग सोने के बिस्कुट, बार या सिक्के नहीं खरीद सकते थे। सरकार चाहती थी कि लोग केवल गहनों के रूप में ही सोना रखें।

2. गोल्ड होल्डिंग लिमिट तय

सरकार ने अलग-अलग वर्गों के लिए सोना रखने की सीमा तय कर दी थी।

वर्गसोना रखने की सीमा
विवाहित महिला500 ग्राम
अविवाहित महिला250 ग्राम
पुरुष100 ग्राम

इन सीमाओं से ज्यादा सोना रखने पर कार्रवाई हो सकती थी।

3. ज्वेलर्स पर सख्त नियंत्रण

सर्राफा कारोबारियों को लाइसेंस लेना जरूरी था। उनके कारोबार, स्टॉक और बिक्री पर सरकार की कड़ी नजर रहती थी।

4. पुराने सोने को पिघलाने पर नियम

सोने को गलाने और शुद्ध बनाने पर भी नियंत्रण लगाया गया था ताकि लोग छिपाकर सोना जमा न कर सकें।

कानून लागू होने के बाद क्या हुआ?

सरकार को उम्मीद थी कि इससे सोने की मांग कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग निकली।

तस्करी तेजी से बढ़ गई

जब कानूनी तरीके से सोना खरीदना मुश्किल हुआ तो अवैध रास्ते तेजी से बढ़ने लगे। दुबई और अन्य देशों से बड़े पैमाने पर सोने की तस्करी होने लगी।

1970 और 1980 के दशक में भारत में गोल्ड स्मगलिंग एक बड़ा नेटवर्क बन गया। उस दौर में कई बड़े तस्करों के नाम भी चर्चा में आए।

ज्वेलरी कारोबार प्रभावित हुआ

सर्राफा व्यापारियों का कामकाज मुश्किल हो गया। लाइसेंसिंग और सरकारी नियंत्रण के कारण कारोबारियों में भारी नाराजगी थी।

जनता में असंतोष बढ़ा

भारतीय समाज में सोने की सांस्कृतिक अहमियत को देखते हुए लोग इस कानून को पसंद नहीं करते थे। शादी-ब्याह और पारिवारिक परंपराओं पर भी इसका असर पड़ा।

आखिर क्यों खत्म करना पड़ा यह कानून?

करीब 22 साल तक यह कानून लागू रहा, लेकिन सरकार धीरे-धीरे समझ गई कि यह अपने मकसद में सफल नहीं हो पाया है। 1990 तक आते-आते भारत गंभीर आर्थिक संकट में पहुंच चुका था। देश आर्थिक सुधारों की तैयारी कर रहा था। उसी दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री मधु दंडवते ने गोल्ड कंट्रोल एक्ट को समाप्त करने का फैसला लिया।

सरकार ने माना कि:

  • कानून से तस्करी कम नहीं हुई
  • अवैध कारोबार बढ़ गया
  • बाजार में पारदर्शिता खत्म हो गई
  • जनता और व्यापारियों में असंतोष बढ़ा

इसके बाद 1990 में यह कानून पूरी तरह खत्म कर दिया गया।

क्या आज फिर ऐसा कानून आ सकता है?

फिलहाल भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो लोगों के पास रखे जाने वाले सोने की सीमा तय करता हो। हालांकि आयकर विभाग के नियमों के तहत अगर किसी व्यक्ति के पास बड़ी मात्रा में सोना मिलता है, तो उसकी आय का स्रोत बताना पड़ सकता है। CBDT के पुराने दिशा-निर्देशों के मुताबिक विवाहित महिला के पास 500 ग्राम तक सोना, अविवाहित महिला के पास 250 ग्राम तक, पुरुष के पास 100 ग्राम तक

होने पर सामान्य परिस्थितियों में पूछताछ में राहत मिल सकती है। लेकिन यह “होल्डिंग लिमिट” नहीं है, बल्कि टैक्स जांच से जुड़ा एक व्यावहारिक दिशा-निर्देश माना जाता है।

भारत में आज भी क्यों इतना लोकप्रिय है सोना?

आज भी भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ता देशों में शामिल है। इसकी वजहें कई हैं शादी-ब्याह में परंपरागत महत्व, सुरक्षित निवेश का भरोसा, महंगाई से बचाव, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बचत का माध्यम यही कारण है कि सरकारें समय-समय पर गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर मांग नियंत्रित करने की कोशिश करती रही हैं, लेकिन 1960 के दशक जैसा सख्त नियंत्रण अब संभव नहीं माना जाता।

निष्कर्ष

गोल्ड कंट्रोल एक्ट भारत के आर्थिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय था, जिसने दिखाया कि किसी सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत आदत पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण हमेशा सफल नहीं होता। सरकार ने विदेशी मुद्रा बचाने और सोने की मांग कम करने के लिए यह कानून बनाया था, लेकिन नतीजा उल्टा निकला और तस्करी तेजी से बढ़ गई।

आज यह कानून भले ही इतिहास बन चुका हो, लेकिन जब भी सोने की कीमतें बढ़ती हैं या गोल्ड इंपोर्ट पर बहस होती है, तब ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ का जिक्र फिर से होने लगता है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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