Shivani Mehrotra: उत्तर प्रदेश के सीतापुर की रहने वाली 43 वर्षीय शिवानी मेहरोत्रा ने परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने पर्वतारोहण के जुनून को जिंदा रखा। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन्होंने रूस स्थित माउंट एल्ब्रुस की चोटी पर तिरंगा फहराकर एक नई मिसाल कायम की। उनका अगला लक्ष्य दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर पहुंचना और सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर भारतीय तिरंगा फहराना है।
परिवार और जिम्मेदारियों के बीच जिंदा रखा सपना
कई लोगों को लगता है कि उम्र बढ़ने के साथ बड़े सपने पीछे छूट जाते हैं। लेकिन 43 साल की शिवानी मेहरोत्रा की कहानी इसका बिल्कुल उलट उदाहरण है। 18 साल की बेटी की परवरिश, परिवार की जिम्मेदारियां और रोजमर्रा की जिंदगी के बीच उन्होंने पर्वतारोहण के अपने जुनून को कभी खत्म नहीं होने दिया।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर की रहने वाली शिवानी की शादी 24 साल की उम्र में लखनऊ में हुई थी। फिलहाल वह अपने परिवार के साथ मुंबई में रहती हैं। इस साल स्वतंत्रता दिवस उनके लिए बेहद खास बन गया, जब उन्होंने रूस की माउंट एल्ब्रुस चोटी पर पहुंचकर भारतीय तिरंगा फहराया।
माउंट एल्ब्रुस को यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माना जाता है। यहां तक पहुंचना सामान्य ट्रेकिंग से कहीं ज्यादा कठिन है और मौसम, ऊंचाई, बर्फ तथा कम ऑक्सीजन जैसी परिस्थितियां पर्वतारोहियों की परीक्षा लेती हैं।
‘उम्र सिर्फ एक नंबर है’
रूस से भारत लौटते समय न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में शिवानी ने कहा कि 15 अगस्त को एल्ब्रुस की चोटी तक पहुंचना सिर्फ शारीरिक ताकत की परीक्षा नहीं थी, बल्कि मानसिक मजबूती का भी बड़ा इम्तिहान था।
उनका मानना है कि उम्र को सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बनने देना चाहिए। उनके मुताबिक असली ताकत किसी व्यक्ति की उम्र में नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य के प्रति उसके संकल्प और अनुशासन में होती है।
शिवानी के लिए पर्वतारोहण सिर्फ पहाड़ चढ़ने का शौक नहीं है। यह उनके लिए परिवार और सपनों के बीच संतुलन बनाने की यात्रा भी है। वह अपने माता-पिता, पति, बेटी और दोस्तों को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं।
उनका कहना है कि 40 साल की उम्र पार करने के बाद पर्वतारोहण और ट्रेकिंग करने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम दिखाई देती है। पहाड़ों पर उन्हें इस उम्र की महिलाएं बहुत कम मिलती हैं।
2019 में शुरू हुआ पहाड़ों का सफर

शिवानी का पहाड़ों से लगाव साल 2019 में और गहरा हुआ। उस समय उन्होंने अपनी करीबी दोस्त के साथ माउंट एवरेस्ट बेस कैंप तक ट्रेकिंग करने की योजना बनाई थी।
शुरुआत में यह सिर्फ एक यात्रा थी, लेकिन धीरे-धीरे पहाड़ उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए। इसके बाद उन्होंने कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और हिमालय के कई इलाकों में ट्रेकिंग और पर्वतारोहण किया।
समय के साथ उन्होंने कठिन अभियानों में भी हिस्सा लेना शुरू किया। वह फ्रेंडशिप पीक और अफ्रीका की प्रसिद्ध माउंट किलिमंजारो जैसी चोटियों पर चढ़ाई कर चुकी हैं।
कैलाश से जुड़े पांच प्रमुख पर्वत अभियानों में से चार को वह पूरा कर चुकी हैं। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी मंजिल अभी बाकी है—माउंट एवरेस्ट।
माउंट एल्ब्रुस अभियान की शुरुआत
शिवानी ने माउंट एल्ब्रुस अभियान के लिए 8 अगस्त को मुंबई से यात्रा शुरू की। दुबई होते हुए वह रूस के मिनरल्नी वोडी पहुंचीं।
करीब 10 दिन के इस अभियान का आयोजन रूस की एक कंपनी ने किया था। चोटी पर मौसम अचानक खराब होने की संभावना को देखते हुए अभियान में एक अतिरिक्त दिन भी रखा गया था।
एल्ब्रुस की चढ़ाई के दौरान मौसम ने भी उनका साथ आसानी से नहीं दिया। तेज बर्फबारी, बारिश, कड़ाके की ठंड और ऊंचाई की चुनौती के कारण अभियान मुश्किल होता गया।
अंतिम चढ़ाई से पहले दल ने खुद को ऊंचाई और मौसम के अनुकूल बनाने के लिए कई अभ्यास चढ़ाइयां कीं। इस दौरान करीब 3,000 मीटर, 4,000 मीटर और 4,700 मीटर तक की ऊंचाई पर पहुंचकर तैयारी की गई।
रात 2 बजे शुरू हुई आखिरी चढ़ाई
शिखर पर पहुंचने के लिए अंतिम चढ़ाई रात करीब 2 बजे शुरू हुई। चारों तरफ अंधेरा था और तापमान बेहद कम था। तेज हवाओं, भारी सामान और कम ऑक्सीजन के बीच एक-एक कदम आगे बढ़ाना चुनौती बन रहा था।
लेकिन शिवानी के मन में सिर्फ एक बात थी—रुकना नहीं है, चलते रहना है।
करीब साढ़े चार घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद वह माउंट एल्ब्रुस के शिखर पर पहुंचीं और वहां भारतीय तिरंगा फहराया।
उन्होंने बताया कि इतनी ऊंचाई पर शरीर के लिए छोटे-छोटे काम भी मुश्किल हो जाते हैं। करीब 5,000 मीटर के बाद ऑक्सीजन का स्तर काफी कम हो जाता है। इसके अलावा भारी कपड़े, पर्वतारोहण के जूते और बर्फ पर पकड़ बनाने वाले उपकरणों के साथ चलना भी काफी कठिन होता है।
सेल्फ-अरेस्ट तकनीक की भी ली ट्रेनिंग
अभियान के दौरान शिवानी ने बर्फ पर फिसलने जैसी आपात स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग भी ली। इसमें ‘सेल्फ-अरेस्ट’ तकनीक शामिल थी, जिसके जरिए फिसलने की स्थिति में पर्वतारोही खुद को रोकने की कोशिश करता है।
उनके मुताबिक पर्वतारोहण के दौरान आखिरी पड़ाव अक्सर शरीर से ज्यादा दिमाग और हौसले की परीक्षा लेता है।
शिवानी ने बताया कि पिछली यात्राओं के दौरान कई बार उन्हें लगा कि अब वह इससे आगे नहीं जा सकतीं। लेकिन इन्हीं अनुभवों ने उन्हें यह समझाया कि कई बार असली चुनौती वहीं से शुरू होती है जहां इंसान को लगता है कि अब उसकी क्षमता खत्म हो चुकी है।
शिखर पर पहुंचते ही शिवानी घुटनों के बल बैठ गईं। उन्होंने पहाड़, अपने दोस्तों और उन सभी लोगों के प्रति आभार जताया जिन्होंने उनके इस सफर में उनका समर्थन किया।
उन्होंने उस पल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने माउंट एल्ब्रुस के सामने सिर झुकाकर धन्यवाद कहा।
फिटनेस के लिए रोजाना करती हैं कड़ी मेहनत
शिवानी की पर्वतारोहण की तैयारी सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है। वह अपनी फिटनेस पर भी काफी ध्यान देती हैं।
वह फुल मैराथन और हाफ मैराथन के अलावा 50 किलोमीटर की दौड़ भी पूरी कर चुकी हैं। कोरोना महामारी के दौरान उन्होंने योग को अपनाया और बाद में एडवांस्ड योग इंस्ट्रक्टर तथा थेरेपिस्ट के रूप में प्रशिक्षण लिया।
करीब छह वर्षों से वह योग सिखा रही हैं। उनके योग कार्यक्रमों में गर्भावस्था से पहले और बाद की महिलाओं के लिए विशेष अभ्यास के साथ कैंसर मरीजों के लिए तैयार किए गए कार्यक्रम भी शामिल हैं।
उनकी दिनचर्या काफी अनुशासित है। वह सुबह करीब 3:30 बजे उठती हैं। इसके बाद योग, जिम में एक्सरसाइज, दौड़ और पर्वतारोहण से जुड़ी ट्रेनिंग करती हैं। खान-पान को लेकर भी वह काफी सावधानी बरतती हैं।
हर पहाड़ की अपनी कहानी
शिवानी के लिए किसी पर्वत की अहमियत केवल उसकी ऊंचाई से तय नहीं होती। उनका मानना है कि हर पहाड़ अपने साथ एक अलग अनुभव लेकर आता है और हर पर्वत का सम्मान किया जाना चाहिए।
अब उनकी नजर नेपाल की ऊंचाई वाली चोटियों पर है। इन अभियानों को वह अपने अंतिम बड़े लक्ष्य यानी माउंट एवरेस्ट की तैयारी का हिस्सा मानती हैं।
एवरेस्ट के लिए 40-50 लाख रुपये तक का खर्च
शिवानी का सबसे बड़ा सपना माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराना है। हालांकि इस सपने को पूरा करने के रास्ते में आर्थिक चुनौती भी बड़ी है।
उनके मुताबिक एवरेस्ट अभियान में करीब 40 से 50 लाख रुपये तक खर्च हो सकते हैं। वहीं दूसरे अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण अभियानों पर भी कई लाख रुपये खर्च हो जाते हैं।
अब तक शिवानी ने अपने योग पेशे से हुई कमाई और बचत के जरिए अपने ज्यादातर अभियानों का खर्च उठाया है। वह चाहती हैं कि अपने इस सपने को वह काफी हद तक अपने दम पर पूरा करें।
सातों ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराने का सपना
माउंट एल्ब्रुस पर तिरंगा फहराना शिवानी के लिए मंजिल नहीं, बल्कि एक बड़े सपने की ओर बढ़ाया गया एक और कदम है।
उनका लक्ष्य माउंट एवरेस्ट को फतह करने के साथ दुनिया की सातों सबसे ऊंची चोटियों पर भारतीय तिरंगा फहराना है।
शिवानी का संदेश साफ है—सपनों को उम्र की सीमा में नहीं बांधना चाहिए। अगर लक्ष्य तय हो, अनुशासन बना रहे और इंसान मुश्किल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ता रहे, तो उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है।


