Russia Petrol Import: रूस दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल उत्पादकों में शामिल है। इसके बावजूद इन दिनों वहां पेट्रोल की कमी ने सरकार और तेल कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालात ऐसे हैं कि रूस को घरेलू मांग पूरी करने के लिए विदेशों से तैयार पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है। खास बात यह है कि इस सप्लाई में भारत भी शामिल है। यानी जिस भारत से रूस भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में प्रमुख है, अब उसी भारत से रूस तैयार पेट्रोल भी मंगा रहा है।
नई दिल्ली: रूस में पेट्रोल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कमी नहीं, बल्कि रिफाइनिंग क्षमता पर पड़ा असर है। यूक्रेनी ड्रोन हमलों में रूस की कई प्रमुख तेल रिफाइनरियां और ऊर्जा प्रतिष्ठान प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा गर्मियों में पेट्रोल की बढ़ी मांग और कुछ रिफाइनरियों में चल रहे रखरखाव ने भी सप्लाई को प्रभावित किया है।
मॉस्को समेत कई इलाकों में पेट्रोल पंपों पर बिक्री की सीमा लगाई गई है। ऐसे में रूस का भारत से पेट्रोल खरीदना वैश्विक तेल बाजार के लिए भी एक दिलचस्प स्थिति बन गया है।
पेट्रोल की बिक्री पर लगानी पड़ी सीमा
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस में पेट्रोल की कमी दोबारा गहराने के बाद कई कंपनियों ने पेट्रोल स्टेशनों पर बिक्री सीमित कर दी है।
गैजप्रोम नेफ्ट ने ऑटोमेटेड पेट्रोल स्टेशनों पर एक ग्राहक को अधिकतम 40 लीटर और अन्य स्टेशनों पर 60 लीटर तक पेट्रोल खरीदने की सीमा रखी है। वहीं रोजनेफ्ट ने एक वाहन के लिए बिक्री को 30 लीटर तक सीमित किया है।
इसके अलावा टैटनेफ्ट ने भी 50 लीटर की सीमा लागू की है। मॉस्को और आसपास के क्षेत्रों में इन प्रतिबंधों के चलते पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में पेट्रोल की कमी की पिछली लहर कुछ हद तक कम हुई थी, लेकिन अगस्त में स्थिति फिर बिगड़ गई। रिफाइनरियों पर नए ड्रोन हमलों, गर्मियों की मांग और रखरखाव के कारण घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता कम हो गई।
रूस के पास कच्चा तेल भरपूर, फिर पेट्रोल क्यों कम?
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू है।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी EIA के अनुसार, रूस ने 2025 में करीब 98.9 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का उत्पादन किया। इस आधार पर वह अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक था।
IEA के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में भी रूस का कच्चे तेल का उत्पादन करीब 87.6 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। जून में यह लगभग 88.6 लाख बैरल प्रतिदिन था।
इससे साफ है कि रूस के सामने कच्चे तेल की कमी नहीं है।
असल समस्या है रिफाइनिंग।
कच्चे तेल को सीधे कार में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उसे रिफाइनरी में प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जाता है। यदि रिफाइनरी की अहम यूनिट क्षतिग्रस्त हो जाए या उत्पादन रोकना पड़े, तो देश के पास पर्याप्त कच्चा तेल होने के बावजूद तैयार पेट्रोल की कमी पैदा हो सकती है।
यही स्थिति इस समय रूस में दिखाई दे रही है।
रूस का रिफाइनिंग नेटवर्क कितना बड़ा है?
रूस का तेल रिफाइनिंग उद्योग भी काफी विशाल है। EIA के अनुसार, रूसी रिफाइनरियों ने 2024 में लगभग 54 लाख बैरल प्रतिदिन तेल प्रोसेस किया था।
देश में ओम्स्क, किरीशी, रियाजान, निजनी नोवगोरोड, यारोस्लाव, वोल्गोग्राड और पर्म जैसे प्रमुख रिफाइनिंग केंद्र हैं।
इसलिए जब इनमें से किसी बड़ी रिफाइनरी पर हमला होता है तो उसका असर केवल एक प्लांट तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल और डीजल की घरेलू सप्लाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
यूक्रेनी ड्रोन हमलों ने बढ़ाई मुश्किल
रूस की मौजूदा पेट्रोल समस्या में यूक्रेन के ड्रोन हमलों की बड़ी भूमिका बताई जा रही है। यूक्रेन लंबे समय से रूस की तेल रिफाइनरियों और अन्य ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाता रहा है।
कीव का तर्क है कि ऊर्जा ढांचे पर हमला रूस की युद्ध क्षमता और उससे होने वाली आय को प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा है।
हाल के हमलों में निजनी नोवगोरोड क्षेत्र की NORSI रिफाइनरी भी प्रभावित हुई।
रॉयटर्स के हवाले से उद्योग से जुड़े सूत्रों ने बताया कि 26 अगस्त को हुए हमले के बाद NORSI को कच्चे तेल की प्रोसेसिंग रोकनी पड़ी। कई प्रोसेसिंग यूनिट और प्लांट के दूसरे हिस्सों को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई।
NORSI रूस की प्रमुख रिफाइनरियों में शामिल है। इसकी सालाना कच्चे तेल की प्रोसेसिंग क्षमता करीब 1.5 करोड़ टन बताई गई है। यह लगभग 50 लाख टन पेट्रोल और 50 लाख टन से अधिक डीजल का उत्पादन करने की क्षमता रखती है।
पर्म और अफिप्सकी रिफाइनरी भी हुईं प्रभावित
NORSI से कुछ दिन पहले रूस की पर्म रिफाइनरी भी ड्रोन हमले की चपेट में आई थी। 21 अगस्त को हुए हमले के बाद वहां आग लगने और तकनीकी यूनिट्स को नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई थी।
इसके अलावा दक्षिणी रूस के क्रास्नोडार क्षेत्र में स्थित अफिप्सकी रिफाइनरी में भी 25 अगस्त को ड्रोन हमले के बाद आग लगने की सूचना मिली।
अफिप्सकी ने 2024 में लगभग 72 लाख टन कच्चे तेल की प्रोसेसिंग की थी। यह करीब 1.44 लाख बैरल प्रतिदिन के बराबर बैठता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी रिफाइनरी को पूरी तरह नष्ट करना जरूरी नहीं होता। यदि उसकी प्रमुख प्रोसेसिंग यूनिट बंद हो जाएं तो कुल पेट्रोल उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है।
पेट्रोल की समस्या अगस्त से नहीं, पहले से चली आ रही थी
रूस में पेट्रोल की परेशानी अचानक अगस्त में पैदा नहीं हुई। रिपोर्टों के मुताबिक, रिफाइनिंग सेक्टर पर वसंत से ही दबाव बढ़ना शुरू हो गया था।
रॉयटर्स के हवाले से उद्योग सूत्रों ने बताया कि जुलाई की शुरुआत तक रूस में पेट्रोल उत्पादन सामान्य मौसमी मांग के करीब 65% तक रह गया था।
उस समय अनुमानित कमी लगभग 40,000 से 45,000 टन प्रतिदिन थी, जबकि गर्मियों में पेट्रोल की मांग करीब 1,15,000 से 1,20,000 टन प्रतिदिन थी।
स्थिति संभालने के लिए रूस ने कई कदम उठाए। इनमें पेट्रोल निर्यात पर प्रतिबंध, घरेलू स्टॉक का इस्तेमाल और विदेशों से तैयार ईंधन की खरीद शामिल थी।
अब भारत से पेट्रोल क्यों खरीद रहा रूस?
यहीं से भारत की भूमिका सामने आती है।
घरेलू रिफाइनरियों से पर्याप्त पेट्रोल नहीं मिलने के बाद रूस ने विदेशों से तैयार पेट्रोल खरीदना शुरू किया। बेलारूस और कजाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों से सप्लाई बढ़ाई गई। इसके अलावा समुद्री रास्ते से भारत से भी पेट्रोल मंगाया गया।
LSEG शिपिंग डेटा और उद्योग सूत्रों के हवाले से रॉयटर्स ने बताया कि भारत के वाडिनार पोर्ट से करीब 68,000 टन पेट्रोल लेकर एक कार्गो रूस के आर्कटिक पोर्ट विटिनो पहुंचा। इसके बाद ईंधन को रेल के माध्यम से घरेलू खरीदारों तक पहुंचाया गया।
इसके अलावा रिपोर्टों में भारत से रूस के लिए दो और पेट्रोल कार्गो की संभावना का भी जिक्र किया गया।
बताया गया कि यह पेट्रोल भारत की नायरा एनर्जी ने तैयार किया था। इस कंपनी में रूस की प्रमुख तेल कंपनी रोजनेफ्ट की हिस्सेदारी है।
भारत से रूस का पेट्रोल खरीदना इतना खास क्यों?
क्योंकि आम तौर पर तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है।
भारत रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। वहीं रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है।
अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा। रॉयटर्स के ट्रेड डेटा के अनुसार, जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 50.83% थी। यह करीब 24.7 लाख बैरल प्रतिदिन के बराबर थी।
वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में रूस की हिस्सेदारी करीब 43.25% रही।
इसलिए मौजूदा स्थिति बेहद असामान्य है—भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है और रूस भारत से तैयार पेट्रोल।
हालांकि दोनों कारोबार सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं। यह स्थिति सिर्फ यह दिखाती है कि कच्चे तेल का उत्पादन और उसे तैयार ईंधन में बदलने की क्षमता दो अलग चीजें हैं।
रूस के तेल उत्पादों के निर्यात पर भी असर
रिफाइनरियों पर दबाव का असर रूस के पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर भी पड़ा है।
रॉयटर्स की गणना के मुताबिक, जुलाई में रूस से समुद्री रास्ते से होने वाला तेल उत्पादों का निर्यात जून की तुलना में 33.3% और एक साल पहले की तुलना में 54.7% गिरकर करीब 39.3 लाख टन रह गया।
रिफाइनरियों को अचानक मरम्मत के लिए बंद करना भी इस गिरावट की वजहों में शामिल था।
दूसरी तरफ बेलारूस ने रूस को ईंधन की सप्लाई बढ़ाई। जुलाई में रूस को बेलारूस का पेट्रोल निर्यात करीब 2.12 लाख टन रहा, जो जून से 13% अधिक था। डीजल निर्यात भी बढ़कर करीब 1.62 लाख टन हो गया।
जनवरी से जुलाई के बीच रूस को बेलारूस की गैसोलीन सप्लाई 2025 की समान अवधि के मुकाबले करीब 25 गुना अधिक बताई गई।
कच्चा तेल ज्यादा, लेकिन रिफाइनिंग क्षमता पर दबाव
रूस की मौजूदा स्थिति तेल बाजार के लिए एक अहम उदाहरण है। किसी देश के पास दुनिया का बड़ा कच्चा तेल भंडार और उत्पादन क्षमता होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसके पास हर समय पर्याप्त पेट्रोल भी उपलब्ध रहेगा।
रूस अभी भी लाखों बैरल कच्चा तेल रोजाना निकाल रहा है। लेकिन ड्रोन हमलों से रिफाइनरियों पर दबाव, रखरखाव और गर्मियों की बढ़ी मांग ने तैयार ईंधन की सप्लाई को प्रभावित किया है।
इसी वजह से मॉस्को को पेट्रोल की बिक्री सीमित करनी पड़ रही है और विदेशों से तैयार ईंधन मंगाना पड़ रहा है।
यानी रूस की समस्या तेल की कमी नहीं, बल्कि उस तेल को समय पर पेट्रोल में बदल पाने की क्षमता की है। और इसी वजह से भारत, जो रूसी क्रूड का बड़ा खरीदार है, अब रूस को तैयार पेट्रोल भी सप्लाई कर रहा है।


