Gold vs Share Market: निवेश के लिए सही एसेट चुनना हर निवेशक के लिए अहम फैसला होता है। बीते एक साल के प्रदर्शन को देखें तो गोल्ड ने शेयर बाजार को काफी पीछे छोड़ दिया है। सोने ने इस अवधि में 35.3 फीसदी का रिटर्न दिया, जबकि Nifty 50 Total Return Index (TRI) ने 5.4 फीसदी का निगेटिव रिटर्न दिया। यानी जहां गोल्ड निवेशकों को शानदार मुनाफा मिला, वहीं शेयर बाजार में निवेश करने वालों को नुकसान उठाना पड़ा।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब शेयरों की जगह गोल्ड में निवेश करना ज्यादा बेहतर रहेगा? इसका जवाब सिर्फ पिछले एक साल के रिटर्न को देखकर देना सही नहीं होगा। निवेश की अवधि बढ़ने पर तस्वीर काफी बदल जाती है।
छोटे समय में गोल्ड ने शेयरों को छोड़ा पीछे
फंड्सइंडिया की अगस्त 2026 की वेल्थ कन्वर्सेशंस रिपोर्ट में गोल्ड और Nifty 50 TRI के प्रदर्शन की तुलना की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, छोटी निवेश अवधि में कई बार गोल्ड ने शेयरों की तुलना में बेहतर रिटर्न दिया है।
हालांकि, किसी एक या दो साल के प्रदर्शन को देखकर निवेश का फैसला करना जोखिम भरा हो सकता है। अलग-अलग समय में कभी गोल्ड आगे रहा है तो कभी इक्विटी ने बेहतर प्रदर्शन किया है। यही वजह है कि निवेशकों को केवल मौजूदा तेजी या पिछले साल के रिटर्न पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
साल-दर-साल बदलता रहा गोल्ड और शेयरों का प्रदर्शन
साल 2000 से अब तक के आंकड़ों में गोल्ड और Nifty 50 TRI के सालाना प्रदर्शन में काफी अंतर देखने को मिला है। कुछ वर्षों में गोल्ड ने शेयर बाजार से काफी बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि दूसरे वर्षों में इक्विटी ने सोने को पीछे छोड़ दिया।
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि कुछ वर्षों में गोल्ड का प्रदर्शन शेयरों की तुलना में करीब 79 फीसदी तक बेहतर रहा। वहीं कुछ अवधियों में इसका रिटर्न शेयरों के मुकाबले करीब 65 फीसदी तक कम भी रहा।
इससे साफ है कि किसी एक साल का प्रदर्शन यह तय नहीं कर सकता कि आने वाले वर्षों में कौन-सा एसेट सबसे ज्यादा रिटर्न देगा।
10, 15 और 20 साल में शेयरों का प्रदर्शन बेहतर
जब निवेश की अवधि लंबी होती है तो तस्वीर गोल्ड के मुकाबले शेयरों के पक्ष में जाती है। फंड्सइंडिया के विश्लेषण के अनुसार, 10 साल की अवधि में गोल्ड का औसत सालाना रिटर्न Nifty 50 TRI से करीब 2 प्रतिशत अंक कम रहा।
15 साल की अवधि में भी गोल्ड का सालाना औसत रिटर्न शेयरों की तुलना में लगभग 2 प्रतिशत अंक कम रहा। 20 साल की अवधि में भी यही ट्रेंड देखने को मिला।
यह अंतर पहली नजर में छोटा लग सकता है, लेकिन लंबे समय तक कंपाउंडिंग के कारण 2 प्रतिशत का अंतर भी निवेश की अंतिम रकम में बड़ा फर्क पैदा कर सकता है।
2% का अंतर लंबे समय में क्यों बड़ा हो जाता है?
मान लीजिए किसी निवेशक को एक एसेट से औसतन 10 फीसदी और दूसरे से 12 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है। शुरुआत में दोनों के बीच अंतर बहुत बड़ा नहीं दिखता। लेकिन 10, 15 या 20 साल तक कंपाउंडिंग होने पर दोनों निवेशों की अंतिम वैल्यू में काफी बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।
इसी वजह से लंबी अवधि के निवेश में सिर्फ मौजूदा रिटर्न देखना पर्याप्त नहीं है। निवेशक को यह भी देखना चाहिए कि उसका लक्ष्य क्या है, निवेश की अवधि कितनी है और वह कितने जोखिम को स्वीकार कर सकता है।
वेल्थ क्रिएशन के लिए शेयर क्यों अहम हैं?
लंबी अवधि में संपत्ति बनाने यानी वेल्थ क्रिएशन के लिए इक्विटी को आमतौर पर ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। कंपनियों के मुनाफे और कारोबार में बढ़ोतरी के साथ शेयरों में लंबे समय में पूंजी बढ़ाने की क्षमता होती है।
यही कारण है कि 10, 15 या 20 साल जैसे लंबे निवेश क्षितिज वाले निवेशकों के पोर्टफोलियो में इक्विटी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा पैसा शेयर बाजार में ही लगा देना चाहिए। शेयरों में ज्यादा रिटर्न की संभावना के साथ बाजार में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी रहता है।
गोल्ड पोर्टफोलियो में क्यों जरूरी है?
गोल्ड की भूमिका शेयरों से अलग होती है। इसे पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन और जोखिम को संतुलित करने वाले एसेट के तौर पर देखा जाता है।
जब शेयर बाजार में गिरावट या अनिश्चितता बढ़ती है, तब कई बार गोल्ड बेहतर प्रदर्शन करता है। बीते एक साल का प्रदर्शन इसका अच्छा उदाहरण है। इस अवधि में Nifty 50 TRI ने निगेटिव रिटर्न दिया, जबकि गोल्ड ने 35.3 फीसदी का रिटर्न दिया।
इस तरह गोल्ड पोर्टफोलियो के एक हिस्से को बाजार की कमजोरी से बचाने में मदद कर सकता है।
तो गोल्ड में निवेश करें या शेयरों में?
इसका जवाब ‘गोल्ड या शेयर’ के बजाय ‘गोल्ड और शेयर’ में छिपा है। दोनों एसेट क्लास की भूमिका अलग है।
अगर आपका लक्ष्य 10, 15 या 20 साल में वेल्थ क्रिएशन करना है तो इक्विटी को पोर्टफोलियो में प्रमुख स्थान दिया जा सकता है। वहीं, पोर्टफोलियो में कुछ हिस्सा गोल्ड में रखने से डायवर्सिफिकेशन बेहतर हो सकता है और बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान जोखिम को संतुलित किया जा सकता है।
यानी बीते एक साल में गोल्ड का 35 फीसदी से ज्यादा रिटर्न शानदार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लंबी अवधि के निवेश के लिए शेयरों को छोड़कर पूरा पैसा गोल्ड में लगा दिया जाए।
निवेश का फैसला सिर्फ पिछले रिटर्न के आधार पर न लें
निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि कोई भी एसेट हर समय सबसे बेहतर प्रदर्शन नहीं करता। गोल्ड कुछ अवधियों में शेयरों से काफी आगे निकल सकता है, जबकि लंबी अवधि में इक्विटी बेहतर वेल्थ क्रिएशन दे सकती है।
इसलिए पोर्टफोलियो बनाते समय निवेश की अवधि, जोखिम उठाने की क्षमता, वित्तीय लक्ष्य और एसेट एलोकेशन को ध्यान में रखना ज्यादा जरूरी है।
निष्कर्ष: बीते एक साल में गोल्ड ने शेयर बाजार से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन लंबी अवधि के आंकड़े बताते हैं कि इक्विटी वेल्थ क्रिएशन के लिए अधिक प्रभावी रही है। ऐसे में समझदारी यही है कि निवेशक अपनी जरूरत और जोखिम क्षमता के अनुसार शेयर और गोल्ड दोनों को पोर्टफोलियो में उचित जगह दें, न कि केवल पिछले एक साल के रिटर्न को देखकर किसी एक एसेट में पूरा निवेश कर दें।


