नई दिल्ली: भारत में चीन से जुड़े विदेशी निवेश के नियमों में बदलाव के बाद विदेशी कंपनियों की ओर से निवेश प्रस्तावों में तेजी देखने को मिली है। सरकार के अनुसार, नए नियम लागू होने के बाद 20 अगस्त तक करीब 4,895.65 करोड़ रुपये के 29 FDI प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। इन प्रस्तावों में आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, डेटा सेंटर और ट्रांसपोर्ट सर्विसेज जैसे कई अहम सेक्टर शामिल हैं।
मई में बदले गए थे FDI नियम
सरकार ने मई में भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले देशों से जुड़े विदेशी निवेश के नियमों में बदलाव किया था। इससे ऐसी विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश का रास्ता आसान हुआ, जिनमें चीन जैसे देशों के निवेशकों की 10 फीसदी से कम हिस्सेदारी है।
इससे पहले ऐसे निवेश प्रस्तावों के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी थी। यानी अगर किसी विदेशी कंपनी में भारत की थल सीमा से जुड़े देश के किसी व्यक्ति या कंपनी की हिस्सेदारी थी, तो भारत में निवेश करने से पहले सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी।
10 मार्च को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने के बाद वित्त मंत्रालय ने 1 मई को इस संबंध में नोटिफिकेशन जारी किया था।
29 प्रस्तावों में ₹4,895 करोड़ का निवेश
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के मुताबिक, नियमों में बदलाव के बाद 20 अगस्त तक 29 FDI प्रस्ताव सरकार के पास आए हैं। इन प्रस्तावों में कुल 4,895.65 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव है।
इन निवेश प्रस्तावों का दायरा कई तेजी से बढ़ते क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इनमें:
- आईटी और टेक्नोलॉजी
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- मैन्युफैक्चरिंग
- फार्मास्युटिकल्स
- डेटा सेंटर
- ट्रांसपोर्ट सर्विसेज
जैसे सेक्टर शामिल हैं।
किन देशों से आए निवेश प्रस्ताव?
सरकार के अनुसार, ये प्रस्ताव मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे देशों के निवेशकों और कंपनियों से जुड़े हैं।
यह बदलाव ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब भारत अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने और टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग तथा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश बढ़ाने पर जोर दे रहा है।
चीन और हॉन्गकॉन्ग की कंपनियों को सीधी छूट नहीं
हालांकि, नए नियमों को चीन की कंपनियों के लिए सीधे निवेश की मंजूरी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। नियमों में दी गई राहत चीन या भारत की किसी अन्य थल सीमा से जुड़े देश में रजिस्टर्ड कंपनियों पर लागू नहीं होती।
इसी तरह हॉन्गकॉन्ग में रजिस्टर्ड कंपनियों के जरिए होने वाले FDI को भी इस छूट के दायरे में नहीं रखा गया है। राहत मुख्य रूप से उन विदेशी कंपनियों के लिए है, जिनमें चीन या अन्य पड़ोसी देशों के निवेशकों की हिस्सेदारी 10 फीसदी से कम है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?
भारत और चीन के बीच कारोबारी संबंधों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में कई बदलाव हुए हैं। एक तरफ भारत रणनीतिक क्षेत्रों में सुरक्षा और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ विदेशी पूंजी और वैश्विक सप्लाई चेन को आकर्षित करना भी आर्थिक प्राथमिकता है।
नए FDI नियम इसी संतुलन की दिशा में एक कदम माने जा सकते हैं। सरकार ने संवेदनशील निवेश पर नियंत्रण बनाए रखते हुए ऐसी विदेशी कंपनियों के लिए प्रक्रिया आसान की है, जिनमें चीन जैसे देशों की हिस्सेदारी सीमित है।
अब तक आए 29 प्रस्तावों से संकेत मिलता है कि नियमों में बदलाव के बाद विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है। आने वाले समय में इन प्रस्तावों की मंजूरी और वास्तविक निवेश की स्थिति से यह पता चलेगा कि इस बदलाव का भारत में FDI प्रवाह पर कितना असर पड़ता है।


