Success Story of Jibran Khan: कश्मीर के बांदीपोरा जिले के रहने वाले जिब्रान खान ने असफलता को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि सीख में बदला। टूरिज्म बिजनेस में 10 लाख रुपये का नुकसान झेलने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। आज वह अपनी फूड चेन ‘जीरो माइल्स’ के जरिए करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहे हैं और 120 युवाओं को रोजगार दे रहे हैं।
नई दिल्ली: सफलता की राह हमेशा आसान नहीं होती। कई बार बड़े सपने देखने वाले लोगों को शुरुआत में असफलता और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। लेकिन जो लोग मुश्किल परिस्थितियों के बाद भी दोबारा खड़े होने का साहस दिखाते हैं, वही आगे चलकर अपनी अलग पहचान बनाते हैं। कश्मीर के बांदीपोरा जिले के रहने वाले जिब्रान खान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
जिब्रान ने पर्यटन के क्षेत्र में अपना करियर शुरू किया था, लेकिन 2016 में कश्मीर के बिगड़ते हालात, कर्फ्यू और इंटरनेट बंद होने की वजह से उनका टूर एंड ट्रैवल बिजनेस बुरी तरह प्रभावित हुआ। उन्हें करीब 10 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद वह दुबई चले गए और वहां हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम किया।
दुबई में मिले अनुभव ने उनके बिजनेस विजन को नई दिशा दी। भारत लौटने के बाद उन्होंने कश्मीर के छोटे शहरों में एक बड़े कारोबारी मौके को पहचाना और 2018 में ‘जीरो माइल्स’ की शुरुआत की। आज यही ब्रांड 9 आउटलेट्स की फूड चेन बन चुका है और इसका सालाना टर्नओवर करीब 8.4 करोड़ रुपये पहुंच गया है।
बिजनेस हुआ ठप, डूब गए 10 लाख रुपये

जिब्रान खान ने टूरिज्म में बैचलर्स डिग्री और एमबीए किया है। पढ़ाई पूरी करने के बाद माता-पिता की इच्छा पर उन्होंने चंडीगढ़ की एक आईटी कंपनी में नौकरी की। हालांकि, उनका मन हमेशा अपने गृह राज्य कश्मीर में कुछ नया करने का था।
इसी सोच के साथ वह बांदीपोरा लौटे और गुरेज घाटी के लिए टूर एंड ट्रैवल कंपनी शुरू की। शुरुआत में उन्हें उम्मीद थी कि पर्यटन क्षेत्र में अच्छी संभावनाएं मिलेंगी, लेकिन 2016 में कश्मीर के हालात बिगड़ने लगे। कर्फ्यू और इंटरनेट बंद होने जैसी परिस्थितियों का सीधा असर उनके कारोबार पर पड़ा।
देखते ही देखते उनका बिजनेस ठप हो गया और उन्हें करीब 10 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। यह उनके लिए बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने इसे अपने सफर का अंत नहीं बनने दिया।
दुबई जाकर सीखा बिजनेस का नया तरीका

इस नुकसान के बाद जिब्रान दुबई चले गए। वहां उन्होंने करीब दो साल तक हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम किया। इस दौरान उन्होंने रेस्टोरेंट मैनेजमेंट, कस्टमर सर्विस और फूड बिजनेस से जुड़ी कई बारीकियां सीखीं।
दुबई में काम करने के दौरान उनके मन में अपना एक नया बिजनेस शुरू करने का विचार मजबूत हुआ। उन्होंने यह समझा कि किसी भी कारोबार की सफलता सिर्फ अच्छा प्रोडक्ट बेचने से नहीं मिलती, बल्कि ग्राहक का अनुभव, सर्विस और ब्रांड की पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
यही अनुभव बाद में उनके नए बिजनेस ‘जीरो माइल्स’ की नींव बना।
छोटे शहरों में देखा बड़ा मार्केट गैप
दुबई से लौटने के बाद जिब्रान ने कश्मीर के फूड और कैफे मार्केट को करीब से समझा। उन्होंने पाया कि प्रीमियम डाइनिंग और अच्छे कैफे का विकल्प मुख्य रूप से श्रीनगर जैसे बड़े शहरों तक सीमित था।
छोटे शहरों और कस्बों के लोगों को बेहतर खाना और अच्छा कैफे एक्सपीरियंस लेने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। जिब्रान ने इसी समस्या को बिजनेस अवसर में बदलने का फैसला किया।
उन्होंने श्रीनगर में सीधे प्रतिस्पर्धा करने के बजाय छोटे शहरों पर फोकस करने की रणनीति बनाई।
2018 में शुरू किया पहला आउटलेट

साल 2018 में जिब्रान ने अपनी बचत और अपने चचेरे भाई से मिले आर्थिक सहयोग की मदद से उत्तर कश्मीर के सोपोर में जीरो माइल्स का पहला आउटलेट शुरू किया।
उनका लक्ष्य सिर्फ एक रेस्टोरेंट खोलना नहीं था। वह ऐसा ब्रांड बनाना चाहते थे, जो कश्मीर के छोटे शहरों में भी ग्राहकों को बेहतर फूड और डाइनिंग एक्सपीरियंस दे सके। साथ ही वह स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना चाहते थे।
पहले आउटलेट के बाद धीरे-धीरे ग्राहकों का भरोसा बढ़ा और ब्रांड का विस्तार शुरू हुआ।
क्वालिटी और सर्विस को बनाया अपनी पहचान
जीरो माइल्स को दूसरे रेस्टोरेंट्स से अलग बनाने के लिए जिब्रान ने स्थानीय संस्कृति को भी महत्व दिया। अलग-अलग शहरों में आउटलेट के इंटीरियर में स्थानीय पहचान और संस्कृति की झलक देने की कोशिश की गई।
मेन्यू में फास्ट फूड, इंडियन और फ्यूजन डिशेज का मिश्रण रखा गया। इनमें स्पेशल बटर चिकन पिज्जा और बटर चिकन ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय हुए।
जिब्रान ने भारी-भरकम मार्केटिंग पर निर्भर रहने के बजाय क्वालिटी, बेहतर सर्विस और ग्राहकों के भरोसे को प्राथमिकता दी। धीरे-धीरे ग्राहकों की पसंद और वर्ड-ऑफ-माउथ पब्लिसिटी ने ब्रांड को आगे बढ़ाने में मदद की।
कोरोना ने फिर दिया बड़ा झटका

जिब्रान के सामने मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। कोरोना महामारी और लंबे लॉकडाउन के दौरान रेस्टोरेंट कारोबार पर भी गंभीर असर पड़ा। उनका बिजनेस एक बार फिर मुश्किल दौर में पहुंच गया।
लेकिन इस बार उनके पास पहले से ज्यादा अनुभव था। उन्होंने धैर्य बनाए रखा और कारोबार को दोबारा खड़ा करने पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे बिजनेस ने फिर रफ्तार पकड़ी और जीरो माइल्स का विस्तार जारी रहा।
आज 9 आउटलेट्स और ₹8.4 करोड़ का सालाना कारोबार
करीब आठ साल के सफर में जिब्रान खान ने अपने ब्रांड को एक छोटे आउटलेट से बढ़ाकर 9 आउटलेट्स की फूड चेन बना दिया है। कंपनी के साथ करीब 120 कर्मचारी जुड़े हुए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जीरो माइल्स का सालाना टर्नओवर अब करीब 8.4 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इसके आउटलेट्स पर रोजाना करीब 1,300 ग्राहक सर्विस लेते हैं।
जिब्रान की कहानी इस बात की मिसाल है कि किसी बिजनेस में शुरुआती असफलता का मतलब यह नहीं कि आगे सफलता नहीं मिल सकती। सही रणनीति, अनुभव और लगातार प्रयास से मुश्किल परिस्थितियों को भी नए अवसर में बदला जा सकता है।
अब फ्रेंचाइजी मॉडल से विस्तार की तैयारी
जिब्रान खान अब जीरो माइल्स को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी योजना फ्रेंचाइजी मॉडल के जरिए जम्मू-कश्मीर के दूसरे शहरों के साथ देश के प्रमुख महानगरों तक पहुंचने की है।
इसके अलावा वह भविष्य में इस ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय बाजार, खासकर दुबई, तक ले जाने की योजना बना रहे हैं। जिस शहर में उन्होंने हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की बारीकियां सीखी थीं, वहीं अपने ब्रांड को ले जाना उनके सफर का एक दिलचस्प अगला पड़ाव हो सकता है।
युवाओं को दिया सफलता का मंत्र
एक इंटरव्यू में जिब्रान खान ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि उन्हें सही समय का इंतजार नहीं करना चाहिए। उनका मानना है कि उपलब्ध संसाधनों के साथ शुरुआत करना और अपने विजन के प्रति प्रतिबद्ध रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
उनकी अपनी कहानी भी इसी सोच को दर्शाती है। एक तरफ टूरिज्म बिजनेस में 10 लाख रुपये का नुकसान, दूसरी तरफ कोरोना जैसी चुनौती—इन मुश्किलों के बावजूद उन्होंने दोबारा शुरुआत की और आज करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा कर लिया।
जिब्रान खान की कहानी से सबसे बड़ी सीख यही मिलती है कि असफलता मंजिल नहीं होती। कई बार वही असफलता हमें अगली सफलता के लिए तैयार करती है।


