नई दिल्ली: विदेशी निवेशकों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को दूर करने के लिए केंद्र सरकार मॉडल बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (BIT) में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित बदलाव के तहत विदेशी निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (International Arbitration) का रास्ता अपनाने के लिए स्थानीय कानूनी उपायों का पांच साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। यह अवधि घटाकर सिर्फ एक साल किए जाने का प्रस्ताव है।
वित्त मंत्रालय ने करीब 10 साल पुराने मॉडल BIT में बदलाव के लिए कैबिनेट नोट पेश किया है। आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर ने भी हाल में संकेत दिया था कि सरकार प्रस्तावित बदलावों को जल्द कैबिनेट के सामने मंजूरी के लिए रख सकती है।
पांच साल की जगह एक साल होगा इंतजार
भारत के मौजूदा मॉडल BIT के तहत विदेशी निवेशक अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद निपटान प्रक्रिया का सहारा लेने से पहले घरेलू कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने के लिए पांच साल तक बाध्य हैं। सरकार अब इस अवधि को घटाकर एक साल करने पर विचार कर रही है।
विदेशी निवेशकों की प्रमुख मांगों में से एक यह रही है कि भारत में निवेश से जुड़े विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया अधिक तेज और प्रभावी हो। प्रस्तावित बदलाव इसी दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
निवेश की परिभाषा में भी बदलाव
मॉडल BIT में केवल विवाद निपटाने की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि ‘निवेश’ की परिभाषा में भी बदलाव का प्रस्ताव है। इसके तहत लंबे समय से रखे गए शेयर और इक्विटी निवेश को भी निवेश की परिभाषा के दायरे में लाया जा सकता है।
प्रस्ताव के मुताबिक, पांच साल या उससे अधिक अवधि से रखे गए शेयर और इक्विटी को भी कुछ परिस्थितियों में निवेश माना जा सकता है। इससे विदेशी निवेशकों को अपने निवेश की कानूनी सुरक्षा के लिए अधिक स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
सब्सिडी और पेटेंट पर सरकार के अधिकार रहेंगे
सरकार कुछ मामलों में अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए अपवाद जारी रखने पर भी विचार कर रही है। इनमें सब्सिडी, स्थानीय सरकारों के फैसले और अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) जैसे मामले शामिल हो सकते हैं।
अनिवार्य लाइसेंसिंग का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी आपात स्थिति में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी जरूरी दवा या तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति देने के लिए किया जा सकता है। ऐसे मामलों में सरकार पूरी तरह अपने नीतिगत अधिकार छोड़ना नहीं चाहती।
क्या है BIT?
बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (BIT) दो देशों के बीच होने वाला एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। इसका उद्देश्य एक देश के निवेशकों को दूसरे देश में किए गए निवेश के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा प्रदान करना होता है।
इन समझौतों में विदेशी निवेशकों के साथ व्यवहार, निवेश की सुरक्षा और विवाद निपटाने की प्रक्रिया से जुड़े नियम तय किए जाते हैं। भारत ने अपना पहला मॉडल BIT 1993 में तैयार किया था।
2015 के बाद भारत ने कड़े किए थे नियम
भारत को वर्ष 2015 के आसपास कई अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों का सामना करना पड़ा था। एक मामले में भारत को ऑस्ट्रेलिया की कंपनी से जुड़े विवाद में हार भी मिली थी। इसके बाद सरकार ने निवेश समझौतों के नियमों की समीक्षा की और अपने नीतिगत हितों की सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया।
इसके बाद भारत का मॉडल BIT पहले की तुलना में अधिक सख्त बनाया गया। हालांकि, इससे विदेशी निवेशकों की ओर से यह शिकायत सामने आती रही कि विवादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की प्रक्रिया काफी लंबी है।
2018 के बाद सीमित देशों से हुआ BIT समझौता
UNCTAD के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 के बाद भारत के साथ नए BIT समझौतों पर सहमति बनाने वाले देशों की संख्या सीमित रही है। यही वजह है कि सरकार अब मॉडल BIT में बदलाव के जरिए विदेशी निवेशकों के लिए व्यवस्था को अधिक आकर्षक बनाने की कोशिश कर रही है।
हालांकि, निवेशकों के अधिकारों और सरकार के नीतिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना इस बदलाव की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
EFTA समझौते में अलग व्यवस्था
स्विट्जरलैंड की अगुवाई वाले EFTA (European Free Trade Association) देशों के साथ भारत के समझौतों में भी निवेश से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इनमें मुख्य रूप से सरकारों के बीच जिम्मेदारियों का ढांचा तय किया गया है और निवेशकों को हर मामले में सीधे अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रिया में जाने का अधिकार नहीं दिया गया है।
हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में अपवादों का प्रावधान मौजूद है।
सरकार के प्रस्तावित बदलावों की बड़ी बातें
- इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन: घरेलू कानूनी उपायों के बाद पांच साल की प्रतीक्षा अवधि को घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव।
- निवेश की नई परिभाषा: लंबे समय से रखे गए शेयर और इक्विटी को भी निवेश की श्रेणी में शामिल करने पर विचार।
- सरकारी अधिकार सुरक्षित: सब्सिडी, स्थानीय निकायों के फैसले और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी आपात स्थितियों में सरकार को कुछ अधिकार मिलते रहेंगे।
- निवेशकों की सुरक्षा: विदेशी कंपनियों के भारत में निवेश को अधिक कानूनी स्पष्टता देने की कोशिश।
- भारतीय निवेशकों का हित: विदेशों में निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों को भी पर्याप्त सुरक्षा मिले, इस पहलू को प्रस्ताव में ध्यान में रखा जा सकता है।
विदेशी निवेश के लिए क्यों अहम है बदलाव?
अगर प्रस्तावित बदलावों को कैबिनेट की मंजूरी मिल जाती है, तो भारत के मॉडल BIT में करीब एक दशक बाद महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। पांच साल से घटकर एक साल की समय सीमा विदेशी निवेशकों के लिए विवाद निपटाने की प्रक्रिया को काफी तेज कर सकती है।
सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि निवेशकों को भरोसेमंद विवाद समाधान व्यवस्था देने के साथ-साथ भारत की नीतिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित भी सुरक्षित रहें। यही संतुलन नए मॉडल BIT की सफलता में अहम भूमिका निभाएगा।


