1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के साथ सिर्फ जमीन और आबादी का ही विभाजन नहीं हुआ था, बल्कि कारोबारियों, उद्योगपतियों और रियासतों की संपत्ति की तस्वीर भी बदल गई थी। उस दौर में आज जैसी फोर्ब्स या ब्लूमबर्ग की अरबपतियों की रैंकिंग मौजूद नहीं थी, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों और अलग-अलग आकलनों में हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान का नाम दुनिया के सबसे धनी लोगों में लिया जाता है।
आज जब भारत के सबसे अमीर कारोबारियों की बात होती है तो मुकेश अंबानी और गौतम अदाणी जैसे नाम सबसे आगे आते हैं। इन कारोबारियों ने पेट्रोकेमिकल, टेलीकॉम, रिटेल, इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाह, ऊर्जा और कई दूसरे क्षेत्रों में विशाल कारोबारी साम्राज्य खड़े किए हैं। लेकिन करीब आठ दशक पीछे जाएं तो भारत की सबसे बड़ी निजी दौलत का चेहरा बिल्कुल अलग था।
1947 में भारत आजाद हुआ और इसी के साथ पाकिस्तान का गठन हुआ। उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में कई रियासतें मौजूद थीं। इनमें हैदराबाद सबसे बड़ी और सबसे समृद्ध रियासतों में गिना जाता था। इसके शासक मीर उस्मान अली खान के पास इतनी बड़ी संपत्ति थी कि आधुनिक दौर में उनकी दौलत का मूल्यांकन सैकड़ों अरब डॉलर तक किया जाता है।
1947 में भारत का सबसे अमीर व्यक्ति कौन था?
1947 के आसपास भारत के सबसे अमीर व्यक्ति के तौर पर हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है। वह 1911 से 1948 तक हैदराबाद रियासत के शासक रहे।
उनके पास सिर्फ नकद पैसा या सोना ही नहीं था। हैदराबाद एक विशाल और समृद्ध रियासत थी, जिसके पास जमीन, खनिज संसाधन, शाही खजाना, आभूषण और दूसरे मूल्यवान संसाधनों का बड़ा भंडार था। निजाम की निजी संपत्ति और रियासत की संपत्ति के बीच अंतर करना भी जरूरी है, क्योंकि ऐतिहासिक आकलनों में कई बार दोनों को अलग-अलग तरीके से गिना गया है।
निजाम की संपत्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें 1930 के दशक में दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में गिना जाता था। Time Magazine ने 1937 में उन्हें अपने कवर पर भी जगह दी थी।
हालांकि उनकी संपत्ति को आज के डॉलर में बदलने पर अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक उनकी संपत्ति 1940 के दशक में करीब 2 अरब डॉलर के आसपास थी, जबकि महंगाई और आर्थिक आकार के हिसाब से इसका आधुनिक मूल्य इससे कई गुना ज्यादा बैठ सकता है।
क्या निजाम की दौलत आज के अंबानी-अदाणी से ज्यादा थी?
यहीं से यह कहानी बेहद दिलचस्प हो जाती है।
आज मुकेश अंबानी और गौतम अदाणी भारत के सबसे बड़े कारोबारी नामों में शामिल हैं। उनकी संपत्ति शेयर बाजार में कंपनियों के मूल्य, उनकी हिस्सेदारी, निवेश और अन्य परिसंपत्तियों के आधार पर लगातार बदलती रहती है।
दूसरी तरफ मीर उस्मान अली खान की संपत्ति का आकलन एक अलग दौर और अलग आर्थिक व्यवस्था में किया जाता है। इसलिए सीधे यह कहना कि उनकी संपत्ति आज के किसी कारोबारी से बिल्कुल इतने प्रतिशत ज्यादा थी, पूरी तरह सटीक तुलना नहीं होगी।
फिर भी ऐतिहासिक अनुमानों को आधुनिक डॉलर में समायोजित करने पर निजाम की संपत्ति का आकार करीब 210 अरब डॉलर से 236 अरब डॉलर तक बताया गया है। अगर इस अनुमान को आधार माना जाए तो यह आज के कई भारतीय अरबपतियों की व्यक्तिगत संपत्ति से काफी अधिक बैठती है।
यहां यह समझना जरूरी है कि निजाम की संपत्ति और आधुनिक अरबपतियों की नेटवर्थ एक जैसी चीज नहीं हैं। आज के अरबपतियों की नेटवर्थ मुख्य रूप से कंपनियों में हिस्सेदारी और बाजार मूल्य से जुड़ी होती है, जबकि निजाम की दौलत में शाही खजाना, जमीन, आभूषण और रियासत से जुड़े संसाधन शामिल थे।
निजाम के पास था दुनिया का मशहूर जैकब डायमंड
मीर उस्मान अली खान की संपत्ति की कहानियों में उनके आभूषणों और बेशकीमती रत्नों का भी खास जिक्र मिलता है।
उनके पास मौजूद प्रसिद्ध रत्नों में जैकब डायमंड का नाम लिया जाता है। यह दुनिया के चर्चित हीरों में से एक है। कहा जाता है कि निजाम ने इसे लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं किया और इसे कथित तौर पर कागज दबाने के लिए भी रखा जाता था।
निजाम के शाही खजाने में हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी की वस्तुएं और बेशकीमती आभूषणों का बड़ा संग्रह था। यही कारण है कि उनकी संपत्ति का वास्तविक मूल्य तय करना आज भी आसान नहीं है।
हैदराबाद ने भारत में शामिल होने से क्यों किया था इनकार?
1947 में ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प मिला था। कुछ रियासतों ने स्वतंत्र रहने की कोशिश भी की।
हैदराबाद ने शुरुआत में भारत में विलय का फैसला नहीं किया। निजाम मीर उस्मान अली खान हैदराबाद को स्वतंत्र रखने के पक्ष में थे।
हैदराबाद की भौगोलिक स्थिति और राजनीतिक परिस्थितियां इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाती थीं। रियासत के आसपास का लगभग पूरा क्षेत्र भारतीय भूभाग से घिरा हुआ था। इसके बावजूद निजाम स्वतंत्र स्थिति बनाए रखना चाहते थे।
आखिरकार सितंबर 1948 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो के तहत हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई की। इसके बाद हैदराबाद का भारत में विलय हुआ और निजाम की राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई।
पाकिस्तान में सबसे अमीर कौन था?
1947 में पाकिस्तान के सबसे अमीर व्यक्ति का जवाब भारत के मुकाबले थोड़ा पेचीदा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उस समय आज जैसी व्यवस्थित अरबपति रैंकिंग उपलब्ध नहीं थी।
पाकिस्तान के संदर्भ में बहावलपुर रियासत के नवाब सर सादिक मोहम्मद खान V का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। बहावलपुर के नवाब बेहद संपन्न शासक थे और उनके पास विशाल रियासत, जमीन, खजाना और अन्य संपत्तियां थीं।
इसी वजह से कई ऐतिहासिक आकलनों में उन्हें पाकिस्तान के सबसे धनी लोगों में सबसे ऊपर रखा जाता है।
हालांकि अगर केवल शाही परिवारों को अलग कर दिया जाए और निजी कारोबारियों की बात की जाए तो तस्वीर बदल जाती है।
सर आदमजी हाजी दाऊद भी थे पाकिस्तान के बड़े कारोबारी
पाकिस्तान के शुरुआती दौर के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में सर आदमजी हाजी दाऊद का नाम प्रमुखता से आता है। वह आदमजी ग्रुप के संस्थापक थे और उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र में उनका बड़ा प्रभाव था।
1947 के बाद पाकिस्तान में उद्योगों की स्थापना और आर्थिक ढांचे के निर्माण में शुरुआती कारोबारी परिवारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आदमजी परिवार भी उन्हीं प्रमुख कारोबारी घरानों में शामिल था।
इसलिए पाकिस्तान के सबसे अमीर व्यक्ति की बात करते समय नवाब सादिक मोहम्मद खान V और सर आदमजी हाजी दाऊद जैसे नाम अलग-अलग संदर्भों में सामने आते हैं।
1947 में अरबपतियों की कोई फोर्ब्स लिस्ट क्यों नहीं थी?
आज अगर कोई व्यक्ति पूछता है कि दुनिया का सबसे अमीर कौन है, तो फोर्ब्स, ब्लूमबर्ग जैसी संस्थाओं की रैंकिंग से आसानी से जवाब मिल जाता है। लेकिन 1947 में ऐसी वैश्विक अरबपति रैंकिंग मौजूद नहीं थी।
उस समय किसी व्यक्ति की संपत्ति का मूल्यांकन करना काफी मुश्किल था। शाही परिवारों की जमीन, महल, आभूषण, सोना, खनिज संसाधन और सरकारी अथवा रियासती संपत्तियों को किस तरह गिना जाए, इस पर भी अलग-अलग तरीके अपनाए जाते थे।
यही वजह है कि मीर उस्मान अली खान की संपत्ति को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं।
इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि मीर उस्मान अली खान 1947 के आसपास भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे धनी और दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक थे, न कि उनकी संपत्ति का एक निश्चित आधुनिक डॉलर आंकड़ा बिल्कुल प्रमाणित है।
अंबानी-अदाणी और निजाम की दौलत में सबसे बड़ा फर्क
आज के अरबपतियों और 1947 के शाही धन में सबसे बड़ा अंतर उनकी संपत्ति की प्रकृति है।
मुकेश अंबानी की संपत्ति का बड़ा हिस्सा उनकी कंपनियों में हिस्सेदारी से जुड़ा है। इसी तरह गौतम अदाणी की नेटवर्थ भी अदाणी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों और अन्य परिसंपत्तियों में उनकी हिस्सेदारी के बाजार मूल्य से प्रभावित होती है।
शेयर बाजार में कंपनी के शेयर की कीमत बढ़ने या घटने के साथ उनकी नेटवर्थ भी बदल सकती है।
इसके विपरीत निजाम की संपत्ति में शाही खजाना, जमीन, आभूषण, सोना और रियासत से जुड़ी संपत्तियां शामिल थीं। इसलिए दोनों की संपत्ति की सीधी तुलना करना आर्थिक रूप से पूरी तरह उचित नहीं है।
फिर भी अगर ऐतिहासिक अनुमानों को महंगाई के हिसाब से आधुनिक डॉलर में बदला जाए, तो निजाम की संपत्ति का अनुमान आज के दौर के कई सबसे बड़े अरबपतियों की व्यक्तिगत दौलत के बराबर या उससे ज्यादा दिखाई देता है।
आज के भारत और 1947 के भारत में कितना बदल गया सब कुछ?
1947 में भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर थी और देश आर्थिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति में आजाद हुआ था। दूसरी तरफ कई रियासतों के शासकों के पास निजी और रियासती संपत्ति का विशाल भंडार था।
आज भारत की आर्थिक तस्वीर बिल्कुल अलग है। देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों, वित्तीय बाजारों, रियल एस्टेट, टेक्नोलॉजी, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में फैला हुआ है।
यही कारण है कि आज के अरबपतियों की दौलत का निर्माण शाही खजाने से नहीं, बल्कि कारोबार और कंपनियों के विस्तार से हुआ है।
निष्कर्ष यही है कि 1947 के दौर में मीर उस्मान अली खान की संपत्ति अपने समय के हिसाब से असाधारण थी। आज के अंबानी और अदाणी आधुनिक कॉरपोरेट भारत की ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि निजाम उस दौर की शाही संपत्ति और रियासती वैभव के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक थे।
इस लिहाज से 1947 के भारत के सबसे अमीर व्यक्ति की कहानी सिर्फ दौलत की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि पिछले करीब 80 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था, संपत्ति और कारोबारी शक्ति का स्वरूप कितना बदल चुका है।


