Strategic Petroleum Reserve India:
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती को और गंभीर कर दिया है। भारत अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। ऐसे में दुनिया के किसी भी बड़े तेल उत्पादक क्षेत्र में युद्ध, तनाव या सप्लाई बाधित होने का सीधा असर भारत के आयात बिल, महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है।
इसी जोखिम को कम करने के लिए केंद्र सरकार देश में स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) की क्षमता बढ़ाने की तैयारी कर रही है। सरकार राजस्थान के बीकानेर और मध्य प्रदेश के बीना में नए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाने की योजना पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य संकट की स्थिति में भारत को कुछ समय तक विदेशी तेल आपूर्ति में व्यवधान से बचाना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है।
बीकानेर और बीना में बनेंगे नए तेल भंडार
मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार राजस्थान के बीकानेर और मध्य प्रदेश के बीना में दो नए स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाने की संभावनाओं पर काम कर रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने संसद की एक स्थायी समिति को इस संबंध में जानकारी दी है।
बीकानेर परियोजना के लिए फिजिबिलिटी स्टडी पूरी हो चुकी है और उसे अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। वहीं, बीना में प्रस्तावित सुविधा को लेकर प्री-फिजिबिलिटी स्टडी पूरी हो चुकी है। अब इसके लिए विस्तृत फिजिबिलिटी स्टडी की जानी है।
अगर इन दोनों परियोजनाओं को मंजूरी मिलती है और इन्हें निर्धारित समय के मुताबिक विकसित किया जाता है, तो भारत की रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता में महत्वपूर्ण इजाफा हो सकता है।
आखिर स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व क्या होता है?
स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व ऐसे बड़े भंडार होते हैं जिनमें कच्चा तेल लंबे समय के लिए सुरक्षित रखा जाता है। इनका इस्तेमाल सामान्य परिस्थितियों में बाजार की रोजाना जरूरत पूरी करने के लिए नहीं किया जाता।
इनका असली महत्व तब सामने आता है जब किसी देश को अचानक तेल की सप्लाई में बड़ी बाधा का सामना करना पड़े। उदाहरण के लिए अगर किसी बड़े तेल उत्पादक देश में युद्ध छिड़ जाए, समुद्री मार्ग बाधित हो जाए, तेल पाइपलाइन प्रभावित हो जाए या अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक सप्लाई कम हो जाए, तो रणनीतिक भंडार से तेल निकालकर घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
यानी SPR को भारत के लिए एक तरह के ऊर्जा सुरक्षा कवच के तौर पर देखा जा सकता है।
ईरान युद्ध ने बदल दी सोच
भारत लंबे समय से कच्चे तेल के मामले में आयात पर निर्भर रहा है। देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि पश्चिम एशिया से तेल की सप्लाई अपेक्षाकृत आसानी से पहुंच सकती है। इसी वजह से लंबे समय तक नीति-निर्माताओं के बीच यह सोच रही कि भारत को कुछ दूसरे बड़े देशों की तरह बहुत विशाल रणनीतिक तेल भंडार की जरूरत नहीं है।
लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष ने इस सोच को बदलने का दबाव बढ़ाया है।
कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेजी आने पर भारत पर दोहरा असर पड़ता है। एक तरफ देश को आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, वहीं दूसरी तरफ महंगे ईंधन का असर परिवहन से लेकर खाद्य पदार्थों और दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
ऐसे में पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार के अचानक झटकों से कुछ हद तक बचा सकता है।
120 डॉलर के करीब पहुंचा था कच्चा तेल
ईरान युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इसका असर भारत के तेल आयात बिल पर भी पड़ा।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जून तिमाही में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 26 फीसदी बढ़ गया, जबकि आयात की मात्रा में लगभग 18 फीसदी की गिरावट आई।
इससे समझा जा सकता है कि सिर्फ तेल की कीमत बढ़ने से ही भारत को कितना बड़ा वित्तीय झटका लग सकता है।
भारत सालाना करीब 2 अरब बैरल कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में सिर्फ 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भी भारत के आयात बिल को लगभग 18,000 करोड़ रुपये तक बढ़ा सकती है।
यही वजह है कि सरकार तेल की कीमतों के साथ-साथ सप्लाई सिक्योरिटी पर भी फोकस बढ़ा रही है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी कुल क्रूड ऑयल जरूरत का करीब 88 फीसदी हिस्सा आयात करता है।
इस भारी आयात निर्भरता का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था तक तेजी से पहुंच सकता है।
जब कच्चा तेल महंगा होता है तो सबसे पहले भारत का आयात बिल बढ़ता है। इसके बाद इसका असर चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है। ज्यादा डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर भी दबाव आ सकता है।
इसके अलावा महंगा कच्चा तेल परिवहन लागत को बढ़ाता है। ट्रक, बस, कृषि मशीनरी, लॉजिस्टिक्स और उद्योगों में ईंधन की लागत बढ़ने से कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि कच्चे तेल को भारत की महंगाई और आर्थिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
रूस बना हुआ है भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में भी बदलाव किया है। पहली तिमाही में रूस एक बार फिर भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर रहा।
कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक रही। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात की हिस्सेदारी करीब 14.6 फीसदी, सऊदी अरब की 9.9 फीसदी, वेनेजुएला की 5.2 फीसदी और ओमान की करीब 4.5 फीसदी रही।
इससे साफ है कि भारत ने तेल आयात के मामले में अलग-अलग देशों के साथ संबंध बनाए हैं। लेकिन इसके बावजूद देश की कुल आयात निर्भरता इतनी अधिक है कि सिर्फ सप्लायर देशों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। रणनीतिक भंडार भी जरूरी हैं।
चीन के पास भारत से कई गुना बड़ा रिजर्व
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के मामले में भारत अभी दुनिया के कई बड़े देशों से काफी पीछे है।
एक अनुमान के मुताबिक, चीन के पास करीब 1,397 मिलियन बैरल का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व है। इसके बाद अमेरिका, जापान, ओईसीडी यूरोप और दक्षिण कोरिया जैसे देश आते हैं।
इसके मुकाबले भारत का मौजूदा स्ट्रैटजिक ऑयल रिजर्व करीब 21 मिलियन बैरल बताया जाता है।
यह अंतर बताता है कि भारत की रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है। खासतौर पर तब जब देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है।
नए रिजर्व से पेट्रोल-डीजल की कीमत तुरंत नहीं होगी कम
हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि बीकानेर और बीना में रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बनने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत कम हो जाएंगी।
SPR का मुख्य उद्देश्य कीमत घटाना नहीं, बल्कि आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक तेल की सप्लाई बाधित होती है और कीमतें बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तो रणनीतिक भंडार से तेल निकालकर घरेलू बाजार की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। इससे अचानक सप्लाई संकट की स्थिति में भारत को तत्काल विदेशी बाजार पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
यानी इसका फायदा आम उपभोक्ता को सीधे तौर पर कीमत में कटौती के रूप में नहीं, बल्कि तेल संकट के दौरान सप्लाई और कीमतों में अस्थिरता को नियंत्रित करने के रूप में मिल सकता है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है बड़ा तेल भंडार?
भारत की अर्थव्यवस्था में तेल की भूमिका बहुत बड़ी है। परिवहन, उद्योग, कृषि और लॉजिस्टिक्स से लेकर रोजमर्रा की गतिविधियों तक पेट्रोलियम उत्पादों की जरूरत रहती है।
ऐसे में अगर किसी वैश्विक संकट के कारण लंबे समय तक कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। इससे अर्थव्यवस्था के कई हिस्से प्रभावित हो सकते हैं।
यही कारण है कि भारत अब ऊर्जा सुरक्षा को केवल तेल खरीदने तक सीमित नहीं रखना चाहता। कहां से तेल आएगा, कितने स्रोत होंगे और संकट के समय कितना तेल देश के पास सुरक्षित रहेगा, इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जा रहा है।
आगे क्या होगा?
बीकानेर में फिजिबिलिटी स्टडी पूरी होने और बीना में विस्तृत फिजिबिलिटी स्टडी की प्रक्रिया के बाद अगला चरण परियोजनाओं की लागत, क्षमता, तकनीकी व्यवहार्यता और निर्माण से जुड़े फैसलों का होगा।
अगर दोनों परियोजनाएं आगे बढ़ती हैं तो भारत के पास भविष्य में पहले की तुलना में अधिक रणनीतिक कच्चा तेल सुरक्षित रखने की क्षमता होगी।
भारत के लिए यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरत आने वाले वर्षों में और बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में बढ़ती खपत के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत ढांचा तैयार करना भी जरूरी होगा।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव ने यह दिखा दिया है कि कच्चे तेल की सप्लाई कितनी जल्दी प्रभावित हो सकती है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए ऐसी परिस्थितियों में रणनीतिक तेल भंडार बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
बीकानेर और बीना में प्रस्तावित नए स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व इसी दिशा में बड़ा कदम हो सकते हैं। इनका मकसद पेट्रोल-डीजल को सस्ता करना नहीं, बल्कि भविष्य में किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय तेल संकट के दौरान भारत को सुरक्षित रखना है।
अगर भारत अपनी SPR क्षमता को लगातार बढ़ाता है और साथ ही तेल आयात के स्रोतों में विविधता बनाए रखता है, तो इससे देश के आयात बिल, रुपये और अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय तेल झटकों से बचाने की क्षमता मजबूत हो सकती है।


