India LPG Supply: भारत हाल ही में गंभीर एलपीजी सप्लाई संकट का सामना कर चुका है। इस अनुभव के बाद सरकार अब रसोई गैस की उपलब्धता को लेकर किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। इसी रणनीति के तहत भारत अमेरिका से लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट के जरिए ज्यादा एलपीजी खरीदने की तैयारी कर रहा है। खास बात यह है कि इस कदम से सिर्फ घरेलू एलपीजी सप्लाई मजबूत करने में मदद नहीं मिलेगी, बल्कि भारत को अमेरिका के साथ अपने व्यापार संतुलन को बेहतर करने में भी फायदा हो सकता है।
अमेरिका से बढ़ाई जाएगी एलपीजी खरीद
भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ताओं में शामिल है और अपनी घरेलू मांग पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर रहता है। ऐसे में किसी एक क्षेत्र या सीमित सप्लाई स्रोत पर ज्यादा निर्भरता भारत के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
इसी वजह से भारत अब अपने एलपीजी आयात के स्रोतों में विविधता लाने पर जोर दे रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) को 2027 के लिए कम से कम 15 फीसदी एलपीजी आयात अमेरिकी टर्म कॉन्ट्रैक्ट के जरिए हासिल करने का निर्देश दिया है।
भारत ने इस साल की शुरुआत में ही अमेरिका से अपनी पहली टर्म एलपीजी सप्लाई का इंतजाम किया था। इसके तहत करीब 22 लाख टन एलपीजी का कॉन्ट्रैक्ट किया गया, जो भारत के कुल एलपीजी आयात का लगभग 10 फीसदी था।
अब सरकार इस हिस्सेदारी को और बढ़ाना चाहती है। तीनों सरकारी तेल कंपनियों के अधिकारी अमेरिका में संभावित सप्लायरों के साथ बातचीत कर रहे हैं और सप्लाई सौदों का मूल्यांकन किया जा रहा है।
एक तीर से कई निशाने साधने की रणनीति
भारत की अमेरिकी एलपीजी खरीद बढ़ाने की योजना को सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह के उद्देश्य हैं।
पहला फायदा यह होगा कि भारत को एलपीजी के लिए एक अतिरिक्त और अपेक्षाकृत बड़ा सप्लाई स्रोत मिलेगा। इससे पश्चिम एशिया के देशों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
दूसरा फायदा भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से जुड़ा है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। ऐसे में अमेरिका से ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ने से भारत के अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस को कम करने में मदद मिल सकती है।
यानी भारत एक ही कदम के जरिए ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई डायवर्सिफिकेशन और ट्रेड बैलेंस जैसे तीन अहम मोर्चों पर काम करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका बना भारत का बड़ा LPG सप्लायर
रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अगस्त तक अमेरिका से भारत आने वाली एलपीजी शिपमेंट करीब 39 लाख टन तक पहुंच गई है। इसके साथ अमेरिका भारत का प्रमुख एलपीजी सप्लायर बन गया है।
तीनों सरकारी रिफाइनर संभावित सप्लायरों और उनके प्रस्तावों का मूल्यांकन करने के बाद अमेरिकी एलपीजी के लिए संयुक्त टेंडर जारी करने की योजना बना रहे हैं। इससे कंपनियों को बड़े स्तर पर खरीद करने और प्रतिस्पर्धी कीमत पर सप्लाई हासिल करने का मौका मिल सकता है।
लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट का एक फायदा यह भी है कि कंपनियों को भविष्य की सप्लाई को लेकर ज्यादा निश्चितता मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और उपलब्धता में अचानक बदलाव होने की स्थिति में यह रणनीति महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
पश्चिम एशिया पर निर्भरता घटाना क्यों जरूरी?
भारत की एलपीजी सप्लाई लंबे समय से पश्चिम एशिया के देशों से आने वाले कार्गो पर काफी निर्भर रही है। लेकिन इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर ऊर्जा सप्लाई प्रभावित होने का जोखिम बना रहता है।
होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में किसी तरह का व्यवधान भारत की ऊर्जा सप्लाई के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। भारत दुनिया के बड़े तेल और गैस आयातकों में शामिल है, इसलिए समुद्री रास्तों और सप्लाई स्रोतों का सुरक्षित रहना उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
अमेरिका से एलपीजी खरीद बढ़ने पर भारत को भौगोलिक रूप से अलग क्षेत्र से सप्लाई मिलेगी। इससे किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होने की स्थिति में भारत के पास वैकल्पिक स्रोत मौजूद रहेंगे।
LPG संकट ने बढ़ाई चिंता
भारत को हाल के महीनों में एलपीजी सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कमी की स्थिति में घरों और उद्योगों को वैकल्पिक ईंधनों का इस्तेमाल करना पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले महीने भारत की एलपीजी खपत सालाना आधार पर 16 फीसदी से ज्यादा गिरकर करीब 23.5 लाख टन रह गई। सप्लाई में कमी के कारण कुछ उपभोक्ताओं ने पाइप्ड नेचुरल गैस यानी PNG के साथ-साथ बायोमास और केरोसिन जैसे दूसरे ईंधनों का भी इस्तेमाल किया।
यह स्थिति बताती है कि एलपीजी सिर्फ एक सामान्य ऊर्जा उत्पाद नहीं है। भारत में करोड़ों परिवार खाना पकाने के लिए LPG सिलेंडर पर निर्भर हैं। इसलिए इसकी सप्लाई में लंबे समय तक बाधा का असर सीधे घरेलू बजट और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ सकता है।
आम लोगों के लिए क्या है इसका मतलब?
भारत अगर अमेरिका के साथ ज्यादा मात्रा में LPG के लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट करता है तो इसका सबसे बड़ा फायदा सप्लाई की सुरक्षा के रूप में सामने आ सकता है।
अगर अलग-अलग देशों से पर्याप्त मात्रा में एलपीजी उपलब्ध रहती है, तो किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर भारत के पास विकल्प मौजूद रहेंगे। इससे अचानक पैदा होने वाली कमी को संभालना आसान हो सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी एलपीजी खरीद बढ़ने से घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत तुरंत कम हो जाएगी। घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय LPG कीमत, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, सरकारी सब्सिडी और अन्य नीतिगत फैसलों का भी असर पड़ता है।
लेकिन लंबी अवधि में ज्यादा विविध सप्लाई नेटवर्क भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है।
भारत की ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव
अमेरिका से LPG खरीद बढ़ाने की योजना भारत की व्यापक ऊर्जा रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। भारत एक तरफ पश्चिम एशिया से मिलने वाली ऊर्जा सप्लाई को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका जैसे दूसरे बड़े उत्पादकों से आयात बढ़ाकर जोखिम को बांटना चाहता है।
यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बड़ी हैं। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था और घरेलू ऊर्जा खपत बढ़ती है, वैसे-वैसे स्थिर और भरोसेमंद ईंधन सप्लाई की जरूरत भी बढ़ती जाएगी।
इस लिहाज से अमेरिकी LPG के साथ लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट भारत के लिए सिर्फ एक खरीद सौदा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार रणनीति दोनों का हिस्सा हैं।
ट्रेड डील से भी जुड़ा है मामला
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों को मजबूत करने के लिए बातचीत चल रही है। अमेरिका लंबे समय से भारत से अपने व्यापार घाटे को कम करने और अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने की मांग करता रहा है।
ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाना इस दिशा में भारत के लिए एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। अमेरिका से LPG के अलावा भारत पहले से ही कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की खरीद करता है।
अगर LPG की खरीद में भी लंबी अवधि के बड़े कॉन्ट्रैक्ट जुड़ते हैं, तो इससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार का आकार बढ़ सकता है और व्यापक व्यापार समझौते के संदर्भ में भी इसका महत्व बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल तीनों सरकारी तेल कंपनियां अमेरिकी सप्लायरों और प्रस्तावों का मूल्यांकन कर रही हैं। इसके बाद संयुक्त टेंडर के जरिए खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है।
अगर 2027 में भारत अपने कुल LPG आयात का कम से कम 15 फीसदी अमेरिकी टर्म कॉन्ट्रैक्ट के जरिए हासिल करने में सफल रहता है, तो यह उसकी मौजूदा सप्लाई रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव होगा।
भारत के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य स्पष्ट है—LPG की उपलब्धता को सुरक्षित रखना, पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों में ऊर्जा की भूमिका को बढ़ाना।
यही वजह है कि अमेरिका से LPG खरीद बढ़ाने की यह बातचीत आम उपभोक्ता से लेकर भारत की ऊर्जा नीति और विदेश व्यापार रणनीति तक, कई स्तरों पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


