Gold Rally: 31 जुलाई से सोने की कीमतों में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है। मैक्रो-इकोनॉमिक परिस्थितियों, जियो-पॉलिटिकल तनाव और निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी समेत कई कारणों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम करीब 9-10% तक चढ़ गए हैं। वहीं, MCX पर गोल्ड में लगभग 8% की तेजी दर्ज की गई है। ऐसे में निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि इतनी तेज रैली के बाद अब सोने में निवेश करना चाहिए या मुनाफावसूली का इंतजार करना बेहतर होगा?
31 जुलाई से 12 अगस्त 2026 के बीच सोने की कीमतों में आई तेजी ने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस दौरान कमजोर अमेरिकी आर्थिक संकेतक, महंगाई में नरमी, फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें और वैश्विक तनाव ने गोल्ड को मजबूत सपोर्ट दिया है।
सोने में तेजी की बड़ी वजहें क्या हैं?

ऑगमॉन्ट (Augmont) की चीफ रिसर्च ऑफिसर रेनिशा चैनानी के मुताबिक, 31 जुलाई से COMEX/LBMA पर सोने में 9-10% और MCX गोल्ड में करीब 8% की तेजी के पीछे कई कारण हैं।
अमेरिका में महंगाई के आंकड़ों में नरमी से फेडरल रिजर्व के अपेक्षाकृत नरम रुख की उम्मीद मजबूत हुई है। जुलाई में CPI घटकर 3.4% रहने से बाजार को संकेत मिला कि महंगाई का दबाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। इससे ब्याज दरों को लेकर निवेशकों की उम्मीदों में बदलाव आया है।
इसके अलावा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ता तनाव और मिडिल ईस्ट में जारी जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता ने सोने की सेफ-हेवन मांग को बढ़ाया है। जब वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक अक्सर जोखिम वाली परिसंपत्तियों के बजाय सोने जैसे सुरक्षित विकल्पों की तरफ रुख करते हैं।
सोने के 4,200 डॉलर के अहम स्तर को पार करने के बाद तकनीकी मोमेंटम ने भी तेजी को बढ़ावा दिया। इससे ट्रेंड-फॉलोइंग निवेशकों की खरीदारी और शॉर्ट कवरिंग देखने को मिली।
क्या सोने में तेजी आगे भी जारी रह सकती है?
बोनान्ज़ा के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निरपेंद्र यादव के अनुसार, 31 जुलाई के बाद सोने में आई तेजी किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। मैक्रो-इकोनॉमिक परिस्थितियों, जियो-पॉलिटिकल जोखिम और निवेश प्रवाह ने मिलकर गोल्ड को मजबूती दी है।
अमेरिका के उम्मीद से कमजोर जॉब डेटा और महंगाई में नरमी ने इस संभावना को मजबूत किया है कि फेडरल रिजर्व आगे ज्यादा सख्त रुख अपनाने से बच सकता है। ब्याज दरें कम रहने की उम्मीद सोने के लिए सकारात्मक होती है, क्योंकि इससे बिना ब्याज देने वाली परिसंपत्ति को रखने की अवसर लागत कम हो जाती है।
कमजोर डॉलर का असर भी सोने की कीमतों पर सकारात्मक पड़ सकता है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने सेफ-हेवन डिमांड को बढ़ाया है।
गोल्ड-बैक्ड ETFs में निवेश की वापसी भी बाजार के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। इससे संकेत मिलता है कि हाल के महीनों में कम भागीदारी के बाद संस्थागत निवेशक फिर से गोल्ड मार्केट में सक्रिय हो रहे हैं।
सेंट्रल बैंक की खरीदारी भी बनी बड़ी ताकत
सोने के लिए एक महत्वपूर्ण स्ट्रक्चरल सपोर्ट केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी है। दुनियाभर के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
इसके साथ एशियाई बाजारों में फिजिकल गोल्ड की मांग में सुधार भी कीमतों को सहारा दे रहा है। तकनीकी मोर्चे पर अहम रेजिस्टेंस के ऊपर ब्रेकआउट के बाद ट्रेंड-फॉलोइंग फंड्स और शॉर्ट कवरिंग ने तेजी को और गति दी है।
यानी मौजूदा गोल्ड रैली के पीछे फंडामेंटल और टेक्निकल, दोनों तरह के कारण मौजूद हैं।
अब सोना खरीदें, बेचें या होल्ड करें?
तेजी के बाद निवेशकों के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि अब क्या रणनीति अपनाई जाए।
रेनिशा चैनानी के मुताबिक, जिन निवेशकों के पास पहले से सोना है, वे मौजूदा तेजी और सपोर्टिव मैक्रो माहौल को देखते हुए अपनी होल्डिंग बनाए रख सकते हैं। हालांकि, नए निवेशकों के लिए मौजूदा स्तरों पर तेजी के पीछे भागकर एकमुश्त खरीदारी करना जोखिम भरा हो सकता है।
उनके अनुसार, नए निवेशक करीब 4,350 डॉलर के सपोर्ट क्षेत्र के आसपास गिरावट आने पर धीरे-धीरे खरीदारी करने की रणनीति पर विचार कर सकते हैं। जब तक तेजी का मोमेंटम बना हुआ है, तब तक आक्रामक बिकवाली की जरूरत नहीं दिखती।
तेज उछाल के बाद प्रॉफिट बुकिंग का खतरा
निरपेंद्र यादव का मानना है कि निवेशकों को हालिया तेज उछाल के बाद प्रॉफिट बुकिंग के जोखिम को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
आने वाले अमेरिकी PPI और रिटेल सेल्स के आंकड़े गोल्ड की दिशा के लिए महत्वपूर्ण होंगे। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व के अधिकारियों के बयान भी ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदों को प्रभावित कर सकते हैं।
अगर अमेरिकी डॉलर या ट्रेजरी यील्ड में अचानक तेजी आती है, तो इससे सोने की कीमतों पर कुछ समय के लिए दबाव देखने को मिल सकता है।
इसलिए, सोने का बड़ा ट्रेंड भले ही सकारात्मक बना हुआ हो, लेकिन लगातार तेज चढ़ाई के बाद थोड़ी गिरावट या कंसोलिडेशन बाजार के लिए स्वाभाविक और स्वस्थ माना जा सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है सही रणनीति?
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए निवेशकों के लिए ‘Buy on Dips’ यानी गिरावट पर धीरे-धीरे खरीदारी की रणनीति ज्यादा बेहतर हो सकती है। जिन निवेशकों के पास पहले से पर्याप्त गोल्ड एक्सपोजर है, वे जल्दबाजी में पूरी होल्डिंग बेचने के बजाय अपने पोर्टफोलियो और जोखिम क्षमता के हिसाब से होल्ड करने पर विचार कर सकते हैं।
वहीं, नए निवेशकों को एक ही बार में बड़ी रकम लगाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करने पर विचार करना चाहिए। इससे अचानक होने वाली गिरावट के जोखिम को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
ध्यान रहे कि सोना भी बाजार जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं है। अमेरिकी ब्याज दरों, डॉलर, बॉन्ड यील्ड, जियो-पॉलिटिकल परिस्थितियों और केंद्रीय बैंकों की नीतियों में बदलाव का सीधा असर इसकी कीमतों पर पड़ सकता है।
निष्कर्ष: 31 जुलाई से सोने में आई करीब 10% की अंतरराष्ट्रीय तेजी ने गोल्ड को एक बार फिर निवेशकों के रडार पर ला दिया है। मौजूदा फंडामेंटल गोल्ड के पक्ष में नजर आ रहे हैं, लेकिन इतने तेज उछाल के बाद बीच-बीच में करेक्शन या कंसोलिडेशन से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में नए निवेशकों के लिए ऊंचे स्तरों पर जल्दबाजी के बजाय गिरावट पर चरणबद्ध खरीदारी और मौजूदा निवेशकों के लिए संतुलित होल्डिंग की रणनीति बेहतर हो सकती है।
डिस्क्लेमर: NewsJagran.in पर प्रकाशित यह लेख केवल सामान्य जानकारी और बाजार में उपलब्ध विशेषज्ञ राय पर आधारित है। इसमें दिए गए निवेश संबंधी विचार किसी व्यक्ति विशेष के लिए निवेश सलाह नहीं हैं। सोने या किसी अन्य परिसंपत्ति में निवेश करने से पहले अपनी जोखिम क्षमता, वित्तीय लक्ष्य और निवेश अवधि को ध्यान में रखें तथा जरूरत पड़ने पर SEBI-रजिस्टर्ड/सर्टिफाइड वित्तीय सलाहकार की सलाह लें।


