भारत की आजादी की कहानी सिर्फ जेल जाने वाले क्रांतिकारियों, सत्याग्रहियों और राजनीतिक नेताओं की कहानी नहीं है। इस लंबे संघर्ष के पीछे ऐसे कारोबारी, उद्योगपति और व्यापारी भी खड़े थे, जिन्होंने अपने धन, कारोबार और सामाजिक प्रभाव का इस्तेमाल राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूती देने के लिए किया। किसी ने कांग्रेस और दूसरे राष्ट्रवादी अभियानों को आर्थिक मदद दी, किसी ने विदेशी सामान का बहिष्कार किया तो किसी ने अपना कारोबार तक दांव पर लगा दिया।
इतिहास में इन लोगों का योगदान स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना में कम चर्चा में आता है, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के लिए पैसा जुटाना और उसे लगातार उपलब्ध कराना भी अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी थी। खासकर उस दौर में जब ब्रिटिश सरकार राष्ट्रवादी गतिविधियों पर नजर रखती थी और आंदोलन से जुड़े लोगों तथा उनके समर्थकों पर कार्रवाई का खतरा रहता था।
यहां ऐसे 8 नामों की कहानी है, जिनका संबंध कारोबार, उद्योग, समाजसेवा और स्वतंत्रता आंदोलन से रहा। इनमें कुछ बड़े उद्योगपति थे, जबकि कुछ व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। इनके योगदान का स्वरूप भी अलग-अलग था।
1. सर दोराबजी टाटा: उद्योग के साथ राष्ट्र निर्माण की सोच
टाटा परिवार का राष्ट्र निर्माण से जुड़ा योगदान केवल उद्योग स्थापित करने तक सीमित नहीं था। सर दोराबजी टाटा ने शिक्षा, खेल, विज्ञान और सामाजिक संस्थाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टाटा परंपरा में परोपकार और सार्वजनिक संस्थाओं को आर्थिक सहयोग देने की मजबूत परंपरा रही।
हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में टाटा समूह की भूमिका को एकतरफा तरीके से देखने के बजाय उसके अलग-अलग सदस्यों और अलग-अलग समय के योगदान को समझना जरूरी है। भारतीय उद्योग जगत के कई बड़े नाम राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़े थे, लेकिन उनके राजनीतिक रुख हमेशा एक जैसे नहीं रहे।
सर दोराबजी टाटा की बड़ी विरासत यह थी कि उन्होंने निजी संपत्ति को संस्थागत राष्ट्र निर्माण में लगाने की सोच को आगे बढ़ाया। शिक्षा, विज्ञान और सार्वजनिक संस्थाओं के लिए आर्थिक सहायता ने आगे चलकर आधुनिक भारत की बुनियाद मजबूत करने में भूमिका निभाई।
2. जमनालाल बजाज: गांधीजी के ‘पांचवें बेटे’
अगर किसी कारोबारी का नाम महात्मा गांधी के साथ सबसे गहराई से जुड़ी कहानियों में आता है, तो वह जमनालाल बजाज हैं। राजस्थान में जन्मे जमनालाल बजाज कारोबारी होने के साथ स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और गांधीवादी कार्यकर्ता भी थे।
उन्होंने असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों, खादी और सामाजिक सुधार के काम को आगे बढ़ाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह इतने करीब थे कि गांधीजी ने उन्हें अपना ‘पांचवां बेटा’ कहा था।
जमनालाल बजाज ने केवल धन देने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने वार्धा को गांधीवादी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बजाजवाड़ी में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई बड़े नेताओं की बैठकें होती थीं और यह स्थान गांधीजी के रचनात्मक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।
उन्होंने ब्रिटिश सरकार की ओर से मिले ‘राय बहादुर’ जैसे सम्मान को भी त्याग दिया। उनके लिए कारोबार से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सेवा और गांधीवादी विचार थे।
3. पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास: उद्योग जगत और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच सेतु
सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास भारत के प्रमुख कपास कारोबारी, बैंकर और उद्योगपतियों में गिने जाते थे। उन्हें उस समय के भारतीय व्यापारिक जगत में बेहद प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता था।
ठाकुरदास का योगदान केवल व्यक्तिगत आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं था। वह भारतीय व्यापारियों और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बने। जीडी बिड़ला के साथ उन्होंने 1927 में फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री यानी FICCI की स्थापना में भूमिका निभाई।
1930 के दशक में भारतीय व्यापारिक समुदाय का एक हिस्सा सविनय अवज्ञा आंदोलन के समर्थन में आया और कारोबारियों ने आंदोलन को आर्थिक सहायता भी दी। हालांकि, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सभी उद्योगपतियों का कांग्रेस या गांधीजी के हर राजनीतिक कदम पर समान रुख नहीं था। ठाकुरदास जैसे कारोबारी राष्ट्रीय हित और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते रहे।
4. हाजी उस्मान सईत: ‘कांग्रेस का कैशबैग’
हाजी उस्मान सईत की कहानी शायद इस सूची की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है। बेंगलुरु के संपन्न व्यापारी परिवार से आने वाले उस्मान सईत ने खिलाफत आंदोलन और बाद में कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन से खुद को जोड़ा।
उन्हें ‘कांग्रेस का कैशबैग’ कहा जाता था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वह जरूरत पड़ने पर कांग्रेस को बड़ी आर्थिक मदद देते थे और गांधीजी तथा दूसरे नेताओं के संपर्क में थे।
उन्होंने स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में अपने कारोबार में विदेशी सामान का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार किया। इससे उनके व्यापार को नुकसान भी हुआ और ब्रिटिश प्रशासन उनसे नाराज हुआ।
उनसे जुड़ी कुछ लोकप्रिय ऐतिहासिक कथाओं में कांग्रेस को ब्लैंक चेक और सोने के सिक्कों से मदद करने जैसी बातें भी मिलती हैं। इन कहानियों का विवरण मुख्यतः संस्मरणात्मक और द्वितीयक स्रोतों में मिलता है, इसलिए इन्हें सावधानी से देखना चाहिए। फिर भी यह स्पष्ट है कि उस्मान सईत ने अपने धन और कारोबार का बड़ा हिस्सा राष्ट्रवादी गतिविधियों के समर्थन में लगाया था।
5. घनश्याम दास बिड़ला: गांधीजी के सबसे करीबी कारोबारी सहयोगियों में से एक
जीडी बिड़ला यानी घनश्याम दास बिड़ला भारतीय उद्योग जगत के उन सबसे प्रभावशाली नामों में थे, जिन्होंने गांधीजी और कांग्रेस के साथ करीबी संबंध बनाए रखे।
बिड़ला ने राष्ट्रीय आंदोलन की विभिन्न गतिविधियों को आर्थिक सहायता दी। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर में भी उनका समर्थन महत्वपूर्ण रहा। वह गांधीजी के करीबी कारोबारी सहयोगियों में गिने जाते थे।
बिड़ला का योगदान सिर्फ चंदा देने तक सीमित नहीं था। वह भारतीय उद्योगपतियों को संगठित करने और राष्ट्रीय आर्थिक हितों को सामने रखने के प्रयासों में भी सक्रिय रहे। 1927 में FICCI के गठन में पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास के साथ उनकी भूमिका इसी व्यापक सोच का हिस्सा थी।
यह रिश्ता पूरी तरह राजनीतिक नहीं था। भारतीय उद्योगपति ब्रिटिश आर्थिक नीतियों से परेशान थे और चाहते थे कि देश में भारतीय उद्योगों के लिए बेहतर परिस्थितियां बनें। इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन और भारतीय कारोबारी हितों के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध भी विकसित हुआ।
6. सेठ हुकुमचंद: ‘कॉटन प्रिंस’ जिसने स्वदेशी का साथ दिया
इंदौर के सेठ हुकुमचंद अपने समय के बड़े उद्योगपति और कारोबारी थे। कपास कारोबार में उनकी जबरदस्त पकड़ थी और उन्हें ‘कॉटन प्रिंस ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता था।
उन्होंने भारतीय उद्योग और स्वदेशी को बढ़ावा देने में योगदान दिया। उनके औद्योगिक साम्राज्य में कपड़ा और जूट जैसे कारोबार शामिल थे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार वह गांधीजी के खादी आंदोलन से प्रभावित थे और स्वदेशी गतिविधियों का समर्थन करते थे।
हुकुमचंद की पहचान केवल कारोबारी के रूप में नहीं थी। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक कल्याण के लिए भी बड़ी रकम दान की। गांधीजी से उनकी मुलाकात के बाद उन्होंने वार्धा में गांधीवादी गतिविधियों के लिए जमीन देने पर भी सहमति जताई थी।
इस तरह उनके आर्थिक योगदान का दायरा स्वतंत्रता आंदोलन से आगे बढ़कर सामाजिक और संस्थागत निर्माण तक पहुंचता है।
7. सरला देवी चौधरानी: महिलाओं और राष्ट्रवादी आंदोलन की आवाज
सरला देवी चौधरानी का नाम पारंपरिक अर्थ में किसी बड़े उद्योगपति या व्यापारी की सूची में रखना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। वह राष्ट्रवादी कार्यकर्ता, लेखिका और महिला अधिकारों की समर्थक थीं। फिर भी स्वतंत्रता आंदोलन के आर्थिक और सामाजिक आधार को मजबूत करने में महिलाओं की भूमिका को समझने के लिए उनका नाम महत्वपूर्ण है।
उन्होंने महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने और राजनीतिक चेतना फैलाने के लिए काम किया। महिलाओं के बीच संगठन और राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।
उनकी कहानी यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े व्यापारिक घरानों का अभियान नहीं था। समाज के अलग-अलग वर्गों ने अपने संसाधनों, समय, संपर्क और प्रभाव के माध्यम से इसमें योगदान दिया।
8. तिरुप्पुर कुमारन: कारोबारी से ज्यादा एक अमर स्वतंत्रता सेनानी
तिरुप्पुर कुमारन को इस सूची में शामिल करते समय एक जरूरी तथ्य स्पष्ट करना चाहिए। वह बड़े उद्योगपति या व्यापारी नहीं थे। वह तमिलनाडु के एक युवा स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया।
उनका जन्म एक बुनकर परिवार में हुआ था। उन्होंने ‘देश बंधु यूथ एसोसिएशन’ की स्थापना की और गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
1932 में ब्रिटिश पुलिस ने एक प्रदर्शन के दौरान उन पर बर्बर हमला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को नहीं छोड़ा। बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इसी कारण उन्हें ‘कोडी काथा कुमारन’ यानी ध्वज की रक्षा करने वाले कुमारन के नाम से याद किया जाता है। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल पर भी उनके इस बलिदान का उल्लेख मिलता है।
उनके बारे में यह दावा कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपने परिवार के आभूषण बेच दिए थे, व्यापक रूप से उद्धृत होने के बावजूद यहां उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों से पुष्ट नहीं होता। इसलिए इसे तथ्य के रूप में लिखने के बजाय सावधानी बरतना बेहतर है।
आजादी की लड़ाई में कारोबारियों की भूमिका क्यों थी महत्वपूर्ण?
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन लंबे समय तक चलने वाला जन आंदोलन था। आंदोलन के लिए यात्राएं, सभाएं, प्रचार, संगठन, आश्रम, खादी, शिक्षा और सामाजिक अभियानों जैसे कामों के लिए लगातार संसाधनों की जरूरत पड़ती थी।
इसी जगह भारतीय कारोबारी समुदाय के एक हिस्से की भूमिका सामने आती है। कई उद्योगपतियों ने कांग्रेस और दूसरे राष्ट्रवादी संगठनों को आर्थिक सहयोग दिया। कुछ ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया, कुछ ने स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा दिया और कुछ ने अपने संस्थानों तथा संपत्ति को राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराया।
हालांकि इतिहास को समझते समय यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि पूरा कारोबारी समुदाय एकमत नहीं था। कुछ उद्योगपति कांग्रेस के करीब थे, तो कुछ ब्रिटिश सरकार के साथ व्यावसायिक संबंध बनाए रखना चाहते थे। कई कारोबारी राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन करते हुए भी अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना चाहते थे। इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन और उद्योग जगत के रिश्ते को केवल ‘दान देने वाले अमीरों’ की कहानी मानना अधूरा होगा।
निष्कर्ष: आजादी केवल बलिदान से नहीं, सहयोग से भी मिली
भारत की आजादी लाखों लोगों के सामूहिक संघर्ष का परिणाम थी। किसी ने जेल की सजा झेली, किसी ने लाठियां खाईं, किसी ने नौकरी छोड़ी तो किसी ने अपना कारोबार और धन राष्ट्रीय आंदोलन के लिए लगा दिया।
जमनालाल बजाज, जीडी बिड़ला, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और हाजी उस्मान सईत जैसे कारोबारी नाम बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन का आर्थिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण था। वहीं तिरुप्पुर कुमारन जैसे बलिदानियों की कहानी बताती है कि देश के लिए योगदान केवल करोड़ों रुपये देने से नहीं, बल्कि अपने जीवन तक को दांव पर लगाने से भी होता है।
इसलिए आजादी की कहानी को जब भी याद किया जाए, तो उन अनगिनत लोगों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इस संघर्ष को संसाधन, संगठन और आर्थिक ताकत दी।


