1976 का दौर भारत में टेक्नोलॉजी के लिहाज से आज से बिल्कुल अलग था। उस समय कंप्यूटर आम लोगों के लिए नई और काफी हद तक अनजान तकनीक थे। स्टार्टअप कल्चर जैसी कोई चीज नहीं थी और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपना कारोबार शुरू करना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था। ऐसे समय में छह युवा प्रोफेशनल्स ने अपनी नौकरियां छोड़कर एक ऐसा फैसला लिया, जिसने आगे चलकर भारतीय आईटी इंडस्ट्री का इतिहास बदल दिया।
इन छह लोगों ने महज 1.87 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी के साथ अपनी कंपनी शुरू की। पैसे जुटाने के लिए उन्होंने अपनी बचत लगाई, कुछ रकम उधार ली और यहां तक कि अपनी एक कार भी बेच दी। दिल्ली के गोल्फ लिंक्स इलाके में एक छोटे से बरसाती कमरे से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर HCL जैसी ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनी तक पहुंचा।
छह लोगों ने छोड़ी नौकरी और शुरू किया नया सफर
We quit our jobs.
There were six of us — Shiv Nadar, Arjun Malhotra, Yogesh Vaidya, Subhash Arora, D.S. Puri and me.
It was 1976. Startups were not really a thing in India. Venture capital did not exist. Banks were not exactly lining up to lend money to six young men with an… pic.twitter.com/4fJHtX5qK4
— Ajai Chowdhry (@AjaiChowdhry) August 11, 2026 HCL की नींव रखने वाले छह संस्थापकों में शिव नाडर, अजय चौधरी, अर्जुन मल्होत्रा, योगेश वैद्य, सुभाष अरोड़ा और डी.एस. पुरी शामिल थे। इन सभी ने अपनी नौकरियां छोड़कर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कुछ बड़ा करने का फैसला किया था।
HCL के शुरुआती दिनों की कहानी कंपनी के को-फाउंडर अजय चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा की। उनकी पोस्ट के मुताबिक, उस समय इन लोगों के पास न तो बड़ी पूंजी थी और न ही कोई बड़ा ऑफिस। उनके पास एक विचार था और उस विचार को कारोबार में बदलने का साहस था।
कंपनी शुरू करने के लिए उन्होंने अपनी व्यक्तिगत बचत का इस्तेमाल किया। इसके अलावा कुछ रकम उधार ली गई और जरूरत पड़ने पर अपनी कार तक बेच दी गई। इस तरह करीब 1.87 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी जुटाई गई।
शुरुआत में कंपनी का ऑफिस दिल्ली के गोल्फ लिंक्स में एक छोटे से बरसाती कमरे में था। छह लोगों की टीम ने वहीं से अपने सपने को आगे बढ़ाना शुरू किया।
पहले कंपनी का नाम था Microcomp
दिलचस्प बात यह है कि HCL की शुरुआत सीधे HCL के नाम से नहीं हुई थी। संस्थापकों ने अपनी नई कंपनी का नाम पहले Microcomp रखा था।
उस समय इन छह लोगों को भरोसा था कि माइक्रोप्रोसेसर आने वाले समय में दुनिया की टेक्नोलॉजी को बदल देंगे। उनका लक्ष्य भारत में अपना कंप्यूटर तैयार करना था।
हालांकि, इस सपने को पूरा करना आसान नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उनके पास कंप्यूटर बनाने के लिए जरूरी मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नहीं था।
यहीं से उनकी असली कारोबारी परीक्षा शुरू हुई।
UP Electronics Corporation के साथ हुई साझेदारी
लाइसेंस की समस्या को हल करने के लिए संस्थापकों ने UP Electronics Corporation के साथ साझेदारी की। इस संस्था के पास जरूरी मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस था।
इसी साझेदारी के बाद Hindustan Computers Limited, यानी HCL का गठन हुआ। इसके साथ ही भारत में स्वदेशी कंप्यूटर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
यह वह दौर था जब भारत में कंप्यूटर इंडस्ट्री अभी शुरुआती अवस्था में थी। ऐसे में घरेलू स्तर पर कंप्यूटर बनाने और बेचने का प्रयास अपने आप में काफी बड़ा जोखिम था।
कंप्यूटर तैयार होने से पहले ही बेचने की रणनीति
HCL के शुरुआती सफर का सबसे दिलचस्प हिस्सा इसकी बिक्री रणनीति थी। कंपनी ने उस कंप्यूटर को बेचने की कोशिश शुरू कर दी थी, जिसका डिजाइन अभी पूरी तरह तैयार भी नहीं हुआ था।
ग्राहकों को प्रोडक्ट दिखाने के लिए HCL की सेल्स टीम के पास ब्रोशर और एक मॉक-अप था। यानी कंपनी को ग्राहक को यह भरोसा दिलाना था कि जिस कंप्यूटर का वह ऑर्डर दे रहा है, उसे भविष्य में वास्तव में तैयार करके दिया जा सकेगा।
यह रणनीति बेहद जोखिम भरी थी, लेकिन यहीं से HCL को शुरुआती सफलता मिलनी शुरू हुई।
IIT से मिला पहला बड़ा भरोसा
HCL को शुरुआती ऑर्डर IIT खड़गपुर और IIT मद्रास से मिले। इन संस्थानों से मिला भरोसा कंपनी के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।
पहले कुछ ऑर्डर मिलने के बाद संस्थापकों का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने देश के दूसरे संस्थानों और कंपनियों तक पहुंच बनाने पर ध्यान देना शुरू किया।
इसी दौरान कंपनी को बड़े और स्थापित खिलाड़ियों से भी मुकाबला करना पड़ा।
छोटी कंपनी ने बड़ी कंपनी को दी टक्कर
अजय चौधरी के मुताबिक, कोयंबटूर में प्रीमियर मिल्स को अपना कंप्यूटर प्रोडक्ट पेश करते समय HCL का सामना DCM Data Products जैसी बड़ी कंपनी से हुआ।
HCL उस समय एक छोटी और नई कंपनी थी, जबकि सामने एक स्थापित नाम मौजूद था। इसके बावजूद HCL ने यह ऑर्डर हासिल कर लिया।
इस जीत ने कंपनी के लिए नए दरवाजे खोल दिए। चौधरी के अनुसार, एक डील से पांच और डील मिलीं और उसके बाद कारोबार का दायरा लगातार बढ़ता गया।
यानी शुरुआती दौर में एक ग्राहक हासिल करना सिर्फ एक ऑर्डर नहीं था, बल्कि वह कंपनी के लिए नए ग्राहकों तक पहुंचने का जरिया बन रहा था।
चार साल में भारत से बाहर पहुंची कंपनी
HCL ने शुरुआती सफलता के बाद सिर्फ भारतीय बाजार तक खुद को सीमित नहीं रखा। कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर भी देखना शुरू किया।
शुरुआत के करीब चार साल के भीतर HCL ने सिंगापुर में कदम रखा। यह उस समय की एक भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनी के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
एक छोटे से कमरे और सीमित पूंजी से शुरू हुई कंपनी का अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचना दिखाता है कि संस्थापकों ने शुरुआत से ही अपने कारोबार को बड़े स्तर पर ले जाने की महत्वाकांक्षा रखी थी।
1.87 लाख रुपये से ग्लोबल टेक कंपनी तक का सफर
HCL की कहानी सिर्फ एक कंपनी के बनने की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी भी है जब भारत में टेक्नोलॉजी कारोबार के लिए बुनियादी ढांचा और बाजार दोनों शुरुआती चरण में थे।
छह लोगों ने अपनी नौकरियां छोड़कर जोखिम उठाया। उन्होंने अपनी बचत लगाई, पैसे उधार लिए और जरूरत पड़ने पर कार बेचकर पूंजी जुटाई। एक छोटे से बरसाती कमरे से काम शुरू किया और फिर धीरे-धीरे ग्राहकों का भरोसा हासिल किया।
शुरुआत में कंपनी के पास तैयार कंप्यूटर भी नहीं था, लेकिन उसके पास एक स्पष्ट विजन था। पहले IIT जैसे संस्थानों से ऑर्डर मिले, फिर बड़े कारोबारी ग्राहकों तक पहुंच बनी और कुछ ही वर्षों में कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजार का रुख कर लिया।
करीब पांच दशक बाद HCL का नाम भारतीय टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री की प्रमुख कंपनियों में गिना जाता है। अजय चौधरी की साझा की गई इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि बड़े कारोबार की शुरुआत हमेशा बड़ी पूंजी से नहीं होती।
कभी-कभी छोटी टीम, सीमित संसाधन और बड़ा विजन भी किसी कंपनी की नींव बन सकते हैं। HCL के संस्थापकों ने जिस समय जोखिम उठाया, उस समय भारत में टेक्नोलॉजी का बाजार आज की तरह विकसित नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने भविष्य की तकनीक पर भरोसा किया और उसी भरोसे को कारोबार में बदलने की कोशिश की।
1.87 लाख रुपये, छह संस्थापक और एक छोटा-सा ऑफिस—यहीं से शुरू हुई कहानी आगे चलकर भारतीय टेक इंडस्ट्री की बड़ी सफलता की कहानी बन गई।


