Global Manufacturing Share: पिछले दो दशकों में दुनिया की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी अमेरिका, यूरोप और जापान का दबदबा रहने वाले इस सेक्टर में चीन ने तेजी से अपनी जगह बनाई है। 2005 में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 27 फीसदी हो गई। यानी 20 साल में चीन की हिस्सेदारी करीब तीन गुना हो गई।
इसके उलट इस अवधि में अमेरिका, यूरोप और जापान की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। भारत ने भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, लेकिन चीन की तुलना में उसकी बढ़त काफी सीमित रही है। यही वजह है कि भारत अभी भी वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग के मामले में छठे स्थान पर बना हुआ है।
चीन ने कैसे बनाई दुनिया की फैक्ट्री वाली पहचान?
पिछले दो दशक में चीन ने मैन्युफैक्चरिंग को अपनी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, मशीनरी, सोलर पैनल, बैटरी, ऑटो पार्ट्स और कई तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के उत्पादन में चीन की भूमिका तेजी से बढ़ी है।
चीन की कंपनियों ने बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता विकसित की। इसके साथ ही सप्लाई चेन, बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी भारी निवेश हुआ। इसका फायदा यह हुआ कि चीन बड़ी मात्रा में सामान कम लागत पर तैयार करने में सक्षम हुआ।
इसी वजह से आज दुनिया के कई देशों के बाजारों में मेड इन चाइना उत्पादों की बड़ी मौजूदगी दिखाई देती है।
2005 में चीन से आगे थे अमेरिका, यूरोप और जापान
लगभग 20 साल पहले तस्वीर काफी अलग थी। 2005 में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी करीब 24 फीसदी थी। अमेरिका लगभग 22 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर था। जापान की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी थी।
उस समय चीन की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी थी और वह चौथे स्थान पर था।
लेकिन अगले 20 वर्षों में चीन ने तेजी से अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई और दूसरे बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों की तुलना में उसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ती गई।
2025 में चीन की हिस्सेदारी 27 फीसदी
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2025 में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी पहुंच गई। इसका मतलब है कि दुनिया में बनने वाले मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट का एक बड़ा हिस्सा चीन से जुड़ा हुआ है।
चीन की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ ही अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी कम हुई। यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 2005 के 24 फीसदी से घटकर 2025 में करीब 17 फीसदी रह गई।
अमेरिका की हिस्सेदारी भी लगभग 22 फीसदी से घटकर 17 फीसदी हो गई। हालांकि अमेरिका अभी भी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग ताकतों में शामिल है।
जापान की हिस्सेदारी में बड़ी गिरावट
जापान के लिए पिछले दो दशक काफी चुनौतीपूर्ण रहे हैं। 2005 में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में जापान की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी थी। 2025 में यह घटकर लगभग 5 फीसदी रह गई।
यानी जापान की हिस्सेदारी में करीब 8 प्रतिशत अंक की गिरावट आई। इसी के साथ वह वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग रैंकिंग में तीसरे स्थान से खिसककर चौथे स्थान पर आ गया।
जापान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से धीमी ग्रोथ, उम्रदराज आबादी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। वहीं चीन ने इसी अवधि में बड़े पैमाने पर अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार किया।
भारत ने बढ़ाई हिस्सेदारी, लेकिन चीन से काफी पीछे
भारत की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। पिछले 20 वर्षों में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में भारत की हिस्सेदारी करीब 2 फीसदी से बढ़कर 3 फीसदी हो गई है।
हालांकि यह बढ़ोतरी चीन की तुलना में काफी कम है। 2005 में भी भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग रैंकिंग में छठे स्थान पर था और 2025 में भी वह छठे नंबर पर बना हुआ है।
इसका मतलब है कि भारत ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई जरूर है, लेकिन वैश्विक स्तर पर अन्य देशों की तुलना में इतनी तेज छलांग नहीं लगा पाया कि रैंकिंग में बड़ा बदलाव हो सके।
भारत के लिए क्यों अहम है यह आंकड़ा?
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से देश को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने पर जोर दे रही है। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा, डिफेंस, सोलर और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
‘मेक इन इंडिया’ और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI जैसी योजनाओं का उद्देश्य घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना है।
अगर भारत वैश्विक सप्लाई चेन में चीन के विकल्प के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करता है, तो इससे रोजगार, निर्यात और निवेश में बढ़ोतरी हो सकती है।
दक्षिण कोरिया और मैक्सिको भी अहम खिलाड़ी
वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में चीन, अमेरिका और यूरोप के अलावा दक्षिण कोरिया और मैक्सिको की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
दक्षिण कोरिया की हिस्सेदारी करीब 3 फीसदी है और वह वैश्विक रैंकिंग में पांचवें स्थान पर है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और शिपबिल्डिंग जैसे क्षेत्रों में दक्षिण कोरिया की मजबूत स्थिति है।
वहीं मैक्सिको करीब 2 फीसदी हिस्सेदारी के साथ सातवें स्थान पर है। अमेरिका के नजदीक होने और उत्तरी अमेरिकी सप्लाई चेन का हिस्सा होने की वजह से मैक्सिको को मैन्युफैक्चरिंग निवेश का फायदा मिला है।
रूस की हिस्सेदारी में बड़ा बदलाव नहीं
रूस की वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हिस्सेदारी भी लगभग 2 फीसदी के आसपास बनी हुई है। 2005 में भी रूस करीब 2 फीसदी हिस्सेदारी के साथ आठवें स्थान पर था और 2025 में भी उसकी स्थिति लगभग वैसी ही है।
इससे साफ है कि पिछले दो दशकों में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का सबसे बड़ा बदलाव चीन के उभार और पारंपरिक औद्योगिक ताकतों की हिस्सेदारी घटने के रूप में सामने आया है।
चीन और भारत के बीच कितना बड़ा अंतर?
सबसे महत्वपूर्ण बात चीन और भारत की मौजूदा हिस्सेदारी के बीच का अंतर है। चीन करीब 27 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग ताकत बन चुका है, जबकि भारत करीब 3 फीसदी पर है।
यानी चीन की वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हिस्सेदारी भारत से करीब 9 गुना है।
भारत के लिए चुनौती सिर्फ अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की नहीं है, बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता, लागत, लॉजिस्टिक्स, स्किल्ड वर्कफोर्स और ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी भूमिका को मजबूत करने की भी है।
आने वाले वर्षों में भारत के सामने बड़ा मौका
दुनिया की कई कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने की कोशिश कर रही हैं। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कंपनियां चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रही हैं।
ऐसे समय में भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को तेजी से विस्तार देने का मौका है। भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल और बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे फायदे हैं।
लेकिन चीन के स्तर तक पहुंचने के लिए भारत को मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता कई गुना बढ़ानी होगी। इसके लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज लॉजिस्टिक्स, प्रतिस्पर्धी बिजली लागत, स्किल डेवलपमेंट और कारोबार करने की प्रक्रिया को और आसान बनाना महत्वपूर्ण होगा।
ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में प्रमुख देशों की हिस्सेदारी
| देश/क्षेत्र | 2005 | 2025 | स्थिति |
|---|---|---|---|
| चीन | 9% | 27% | तेजी से बढ़ा |
| यूरोपीय संघ | 24% | 17% | हिस्सेदारी घटी |
| अमेरिका | 22% | 17% | हिस्सेदारी घटी |
| जापान | 13% | 5% | बड़ी गिरावट |
| भारत | 2% | 3% | मामूली बढ़त |
| दक्षिण कोरिया | करीब 3% | करीब 3% | लगभग स्थिर |
| मैक्सिको | करीब 2% | करीब 2% | महत्वपूर्ण खिलाड़ी |
| रूस | करीब 2% | करीब 2% | लगभग स्थिर |
निष्कर्ष
पिछले 20 साल की कहानी बताती है कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र किस तरह तेजी से चीन की ओर शिफ्ट हुआ है। 2005 में 9 फीसदी हिस्सेदारी वाला चीन 2025 में करीब 27 फीसदी तक पहुंच गया। वहीं अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान की हिस्सेदारी में गिरावट आई।
भारत ने जरूर अपनी हिस्सेदारी 2 फीसदी से बढ़ाकर 3 फीसदी की है, लेकिन वैश्विक रैंकिंग में वह अभी भी छठे स्थान पर है। इसलिए आने वाले वर्षों में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ चीन से प्रतिस्पर्धा करना नहीं, बल्कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में अपनी हिस्सेदारी को तेज गति से बढ़ाना होगी।


