Affordable Housing: देश के बड़े शहरों में सस्ते और किफायती घरों की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। खासतौर पर 50 लाख रुपये तक की कीमत वाले फ्लैट अब डेवलपर्स की प्राथमिकता में पहले जैसे नहीं रहे। दूसरी ओर, प्रीमियम और लग्जरी घरों की लॉन्चिंग तेजी से बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह जमीन और निर्माण लागत के मुकाबले मुनाफे का अंतर माना जा रहा है।
हाल ही में गुरुग्राम में 271 करोड़ रुपये में एक पेंटहाउस की खरीद ने देश के लग्जरी रियल एस्टेट बाजार की तस्वीर फिर सामने रख दी। यह किसी एक अपार्टमेंट या पेंटहाउस की सबसे महंगी खरीद में शामिल है। एक तरफ करोड़ों रुपये की लग्जरी प्रॉपर्टी का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मिडिल क्लास के लिए किफायती मकानों की सप्लाई घटती जा रही है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसी मुद्दे को उठाते हुए बताया कि भारत के प्रमुख शहरी बाजारों में अफोर्डेबल हाउसिंग की बिक्री और नई सप्लाई में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। उनके मुताबिक, मामला सिर्फ मकानों की कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है। बिल्डरों के लिए कम कीमत वाले घर बनाना आर्थिक रूप से उतना आकर्षक नहीं रह गया है।
50 लाख रुपये तक के घरों की सप्लाई क्यों घट रही है?
THE ₹50 LAKH HOME IS DISAPPEARING
India’s housing problem isn’t simply that homes are getting expensive.
It’s that developers increasingly have little economic incentive to build affordable homes.
The result?
Supply is moving upmarket while middle class incomes struggle to… pic.twitter.com/gJeHRcYhCH
— CA Nitin Kaushik (FCA) | LLB (@Finance_Bareek) August 8, 2026 अफोर्डेबल हाउसिंग का सबसे बड़ा ग्राहक वर्ग मिडिल क्लास और निम्न-मध्यम आय वर्ग है। इस वर्ग के लिए घर की कीमत सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर होती है। लेकिन महानगरों में जमीन की कीमत, निर्माण सामग्री, मजदूरी, वित्तीय लागत और मंजूरी से जुड़ा खर्च लगातार बढ़ने के कारण कम कीमत में घर बनाना डेवलपर्स के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है।
नितिन कौशिक के अनुसार, भारत के टॉप-7 शहरी बाजारों में कुछ साल पहले तक अफोर्डेबल घरों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा थी। अब डेवलपर्स उसी जमीन और संसाधनों का इस्तेमाल अधिक कीमत वाली प्रॉपर्टी बनाने में कर रहे हैं, क्योंकि वहां संभावित रिटर्न काफी बेहतर है।
2018 में करीब 40% थी अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी
नितिन कौशिक ने ANAROCK के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2018 में भारत के टॉप-7 शहरों में कुल मकानों की बिक्री और नई सप्लाई में अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी लगभग 38 से 40 प्रतिशत के आसपास थी।
इसका मतलब है कि उस समय नए प्रोजेक्ट्स में एक बड़ा हिस्सा ऐसे घरों का होता था, जिन्हें मिडिल क्लास परिवार अपेक्षाकृत आसानी से खरीद सकते थे।
लेकिन इसके बाद स्थिति तेजी से बदली। 2023-24 तक अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी घटकर लगभग 17 से 19 प्रतिशत रह गई। यानी कुछ ही वर्षों में इस सेगमेंट की हिस्सेदारी आधे से भी कम हो गई।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि गिरावट का सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा।
2026 की दूसरी तिमाही तक सिर्फ 6% रह गई नई सप्लाई
नितिन कौशिक के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही तक भारत के प्रमुख सात शहरी बाजारों में नए लॉन्च होने वाले मकानों में अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी करीब 6 प्रतिशत तक सिमट गई।
अगर इस ट्रेंड को लंबे समय के नजरिए से देखें तो तस्वीर काफी स्पष्ट दिखाई देती है। 2018 में जहां अफोर्डेबल घर नई सप्लाई का लगभग 40 प्रतिशत तक हिस्सा थे, वहीं कुछ वर्षों बाद यह हिस्सा एक अंक में पहुंच गया।
इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनका बजट सीमित है और जो महानगरों में अपना घर खरीदना चाहते हैं। ऐसे खरीदारों के सामने अब दो विकल्प बचते हैं—या तो ज्यादा महंगा घर खरीदें या फिर शहर के बाहरी इलाकों की ओर रुख करें।
बिल्डरों को सस्ते घरों में कम मुनाफा क्यों?
अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट में सबसे बड़ी समस्या कम मार्जिन और ज्यादा लागत का समीकरण है।
नितिन कौशिक के अनुसार, सामान्य तौर पर अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट में बिल्डर का मार्जिन करीब 10 से 12 प्रतिशत के आसपास हो सकता है। इसके विपरीत प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स में यह मार्जिन 25 से 35 प्रतिशत या उससे ज्यादा तक पहुंच सकता है।
यहीं से बिल्डर के सामने बड़ा कारोबारी सवाल खड़ा होता है।
मान लीजिए कोई डेवलपर 40 लाख रुपये के आसपास कीमत वाला फ्लैट बनाता है। इस प्रोजेक्ट में जमीन, निर्माण, कर्मचारियों, बैंक फाइनेंस, मार्केटिंग, सरकारी मंजूरी और प्रोजेक्ट में देरी जैसी लागतें शामिल होती हैं। इतने जोखिम के बाद अगर मार्जिन सीमित है, तो डेवलपर के लिए यह निवेश उतना आकर्षक नहीं रहता।
इसके मुकाबले यदि उसी जमीन पर प्रीमियम प्रॉपर्टी विकसित की जाए और उसे करोड़ों रुपये में बेचा जा सके, तो संभावित मुनाफा काफी अधिक हो सकता है।
जमीन की कीमत बनी सबसे बड़ी चुनौती
बड़े शहरों में अफोर्डेबल हाउसिंग की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक जमीन की कीमत है। दिल्ली-NCR, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और अन्य प्रमुख शहरों के विकसित इलाकों में जमीन बेहद महंगी हो चुकी है।
डेवलपर के लिए जमीन खरीदने के बाद उसी प्रोजेक्ट में घर की कीमत को 30-50 लाख रुपये के भीतर रखना मुश्किल हो जाता है। अगर कीमत बहुत बढ़ाई जाती है तो अफोर्डेबल सेगमेंट का ग्राहक उसे खरीद नहीं पाता।
यानी डेवलपर के सामने एक तरह का प्राइस-मार्जिन प्रेशर है। जमीन महंगी है, निर्माण लागत अधिक है और ग्राहक की भुगतान क्षमता सीमित है। ऐसे में प्रीमियम प्रॉपर्टी का विकल्प डेवलपर को ज्यादा आकर्षक दिखाई देता है।
निर्माण लागत और ब्याज का भी असर
सिर्फ जमीन ही नहीं, बल्कि निर्माण से जुड़ी लागत भी डेवलपर्स के लिए महत्वपूर्ण है। सीमेंट, स्टील, मजदूरी, मशीनरी, बिजली और अन्य निर्माण सामग्री की कीमतों का असर प्रोजेक्ट की कुल लागत पर पड़ता है।
इसके अलावा डेवलपर्स को प्रोजेक्ट के लिए फाइनेंसिंग लागत भी उठानी पड़ती है। यदि किसी प्रोजेक्ट की मंजूरी या निर्माण में देरी होती है तो ब्याज और अन्य खर्च बढ़ सकते हैं।
अफोर्डेबल घरों में बिक्री मूल्य सीमित होने के कारण डेवलपर के पास अतिरिक्त लागत को ग्राहक पर डालने की गुंजाइश भी कम होती है। यही वजह है कि कई डेवलपर्स ज्यादा कीमत वाले सेगमेंट को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सिर्फ ज्यादा कीमत वाले घर बनेंगे तो मिडिल क्लास कहां जाएगा?
रियल एस्टेट बाजार में प्रीमियम और लग्जरी घरों की मांग बढ़ना अपने आप में खराब संकेत नहीं है। यह बढ़ती आय और उच्च वर्ग की मजबूत खरीद क्षमता को दिखाता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब बाजार में किफायती घरों की हिस्सेदारी लगातार घटती चली जाए।
मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना पहले से ही एक बड़ा वित्तीय फैसला है। अगर 40-50 लाख रुपये के आसपास की प्रॉपर्टी की सप्लाई कम होती है और नई परियोजनाओं का फोकस लगातार 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक कीमत वाले घरों पर रहता है, तो बड़ी संख्या में खरीदार औपचारिक हाउसिंग मार्केट से बाहर हो सकते हैं।
इसका एक असर किराये के बाजार पर भी पड़ सकता है। जिन परिवारों के लिए खरीदना मुश्किल होगा, वे लंबे समय तक किराये के मकानों पर निर्भर रह सकते हैं।
शहरों के बाहरी इलाकों में मिल सकता है समाधान
अफोर्डेबल हाउसिंग की समस्या का एक संभावित समाधान शहरों के बाहरी इलाकों में बड़े पैमाने पर योजनाबद्ध आवासीय विकास हो सकता है।
शहर के मुख्य हिस्सों की तुलना में बाहरी इलाकों में जमीन की कीमत अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इससे डेवलपर्स के लिए कम कीमत वाले घर बनाना संभव हो सकता है। लेकिन केवल सस्ती जमीन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा।
इन इलाकों में बेहतर सार्वजनिक परिवहन, रोजगार केंद्रों तक आसान पहुंच, स्कूल, अस्पताल, बाजार और अन्य बुनियादी सुविधाएं भी जरूरी होंगी।
अगर घर तो सस्ता हो लेकिन रोजाना नौकरी पर जाने में कई घंटे लगें, तो खरीदार के लिए उस घर की वास्तविक लागत बढ़ जाती है।
मेट्रो और RRTS से बदल सकती है तस्वीर
शहरों के बाहरी इलाकों में अफोर्डेबल हाउसिंग को सफल बनाने के लिए मेट्रो और RRTS जैसे तेज सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ट्रांजिट कॉरिडोर के आसपास योजनाबद्ध तरीके से आवासीय विकास किया जाए तो लोग शहर के महंगे हिस्सों से दूर रहकर भी रोजगार केंद्रों तक आसानी से पहुंच सकते हैं।
इसके साथ ही सरकारी जमीन का बेहतर इस्तेमाल, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और ट्रांजिट स्टेशनों के आसपास अधिक घनत्व वाली आवासीय परियोजनाएं विकसित करने जैसे मॉडल पर भी काम किया जा सकता है।
सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती
अफोर्डेबल हाउसिंग की घटती सप्लाई सिर्फ रियल एस्टेट इंडस्ट्री की समस्या नहीं है। यह शहरी नियोजन और हाउसिंग पॉलिसी से भी जुड़ा मुद्दा है।
अगर सरकार चाहती है कि मिडिल क्लास और निम्न आय वर्ग के लिए बड़े शहरों में घर उपलब्ध रहें, तो डेवलपर्स के लिए ऐसे प्रोजेक्ट आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाना जरूरी होगा।
इसके लिए जमीन की उपलब्धता, तेज मंजूरी प्रक्रिया, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी और उपयुक्त नीतिगत प्रोत्साहन जैसे उपाय मददगार हो सकते हैं।
आने वाले समय में कैसी होगी हाउसिंग की तस्वीर?
भारत में रियल एस्टेट बाजार तेजी से बदल रहा है। एक तरफ लग्जरी घरों की मांग और कीमतें बढ़ रही हैं, तो दूसरी तरफ अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी घट रही है।
अगर यह ट्रेंड लंबे समय तक जारी रहता है, तो देश के बड़े शहरों में घर खरीदने की समस्या केवल महंगाई की नहीं, बल्कि सही कीमत पर सही लोकेशन में घर उपलब्ध होने की समस्या बन सकती है।
डेवलपर्स के लिए प्रीमियम प्रॉपर्टी अधिक मुनाफे वाला विकल्प हो सकती है, लेकिन शहरों के संतुलित विकास के लिए अफोर्डेबल हाउसिंग की पर्याप्त सप्लाई भी जरूरी है। इसलिए आने वाले वर्षों में सरकार और रियल एस्टेट कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि मुनाफे और आम खरीदार की जरूरत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


