JNU News: दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जेल में बंद स्कॉलर उमर खालिद की किताब ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ पर आयोजित चर्चा को लेकर सोमवार को कैंपस में विवाद हो गया। कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले प्रशासन की ओर से ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द किए जाने के बाद छात्रों के बीच विरोध और समर्थन में नारेबाजी हुई।
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में सोमवार को उमर खालिद की किताब को लेकर आयोजित एक कार्यक्रम ने कैंपस का माहौल गर्म कर दिया। ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ नाम की किताब पर चर्चा के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया था, लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसके लिए बुक किए गए वेन्यू की अनुमति रद्द कर दी।
वेन्यू रद्द होने के बावजूद कार्यक्रम को लेकर जुटे छात्रों के बीच चर्चा जारी रही। इस दौरान कैंपस में अलग-अलग पक्षों की ओर से नारेबाजी और विरोध देखने को मिला। मौके पर बड़ी संख्या में छात्र मौजूद थे और कुछ रिपोर्टों के मुताबिक करीब 300 से 400 छात्र कार्यक्रम से जुड़े स्थान पर पहुंचे।
इंटरनेशनल डे ऑफ द वर्ल्ड्स इंडिजिनस पीपल्स के मौके पर था कार्यक्रम
यह कार्यक्रम International Day of the World’s Indigenous Peoples के मौके पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) की ओर से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य उमर खालिद की किताब पर चर्चा करना और आदिवासी इतिहास, संसाधनों तथा सत्ता की राजनीति जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श करना था।
कार्यक्रम का आयोजन मूल रूप से दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज-1 (SSS-1) के ऑडिटोरियम में होना था। हालांकि, कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द कर दी गई।
इसके बाद कार्यक्रम को लेकर विवाद और बढ़ गया। विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले के बावजूद छात्र कार्यक्रम से जुड़े स्थान पर पहुंचे और चर्चा तथा विरोध दोनों देखने को मिला।
JNU प्रशासन ने क्यों रद्द की वेन्यू बुकिंग?
जेएनयू प्रशासन के मुताबिक, आयोजकों की ओर से कार्यक्रम से संबंधित पूरी जानकारी विश्वविद्यालय को उपलब्ध नहीं कराई गई थी। इसी आधार पर ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द करने की बात कही गई।
विश्वविद्यालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि जेएनयू एक लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत संस्थान है। प्रशासन के अनुसार कार्यक्रम को अनुमति स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन की ओर से दी गई थी और उसे रद्द करने का फैसला भी संबंधित स्तर पर लिया गया।
यानी विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह संकेत दिया कि कार्यक्रम की अनुमति और उसके बाद उसे रद्द करने की प्रक्रिया स्कूल स्तर पर हुई थी। हालांकि, आयोजकों और कार्यक्रम के समर्थकों की ओर से इस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए।
वेन्यू रद्द होने के बाद भी जुटे सैकड़ों छात्र
ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द किए जाने के बाद भी बड़ी संख्या में छात्र कार्यक्रम से जुड़े स्थान पर पहुंच गए। रिपोर्टों के अनुसार करीब 300 से 400 छात्रों के वहां पहुंचने की बात सामने आई।
एसएसएस-2 ब्लॉक के बाहर उमर खालिद की किताब की प्रतियां भी बेचे जाने की जानकारी सामने आई। उमर खालिद जेएनयू के पूर्व छात्र रहे हैं और उन्होंने इसी विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी।
मौके पर झारखंड ट्राइबल स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े सदस्य भी मौजूद बताए गए। कार्यक्रम के विषय को देखते हुए आदिवासी अधिकारों और झारखंड में छात्रों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
कार्यक्रम में कौन-कौन वक्ता शामिल होने वाले थे?
कार्यक्रम के पोस्टर के अनुसार, चर्चा के लिए कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था। पैनल में इतिहासकार प्रोफेसर प्रभु महापात्रा, प्रोफेसर उमा चक्रवर्ती, शुद्धाब्रत सेनगुप्ता, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और सामाजिक कार्यकर्ता बनोज्योत्स्ना लाहिड़ी के नाम शामिल थे।
बनोज्योत्स्ना लाहिड़ी उमर खालिद की पार्टनर हैं। कार्यक्रम की शुरुआत जेएनयू एआईएसए की अध्यक्ष अदिति के शुरुआती संबोधन से हुई।
अपने संबोधन में उन्होंने झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के प्रति समर्थन जताया। उन्होंने कार्यक्रम के लिए बुक किए गए स्थान को आखिरी समय पर रद्द किए जाने के फैसले पर भी सवाल उठाया।
उनका तर्क था कि उमर खालिद जेएनयू के पूर्व छात्र हैं और उनकी किताब पर चर्चा को विश्वविद्यालय में जगह क्यों नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने उमर खालिद की जेल में रहने की स्थिति का भी उल्लेख करते हुए प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाए।
AISA की ओर से प्रशासन के फैसले पर सवाल
कार्यक्रम के समर्थकों की ओर से विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई को लेकर कई सवाल उठाए गए। AISA की अध्यक्ष अदिति ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम की जगह को रद्द करने का फैसला उचित प्रक्रिया के तहत नहीं लिया गया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि उमर खालिद की राजनीतिक और सामाजिक पहचान को लेकर प्रशासन का रवैया पक्षपातपूर्ण है। हालांकि, ये कार्यक्रम समर्थकों की ओर से लगाए गए आरोप हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन ने वेन्यू रद्द करने के लिए आयोजकों की ओर से पूरी जानकारी नहीं दिए जाने की बात कही है।
ऐसे में विवाद का एक प्रमुख मुद्दा यही बना हुआ है कि कार्यक्रम की अनुमति किन शर्तों के आधार पर दी गई थी और बाद में उसे रद्द करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
ABVP ने प्रशासन के फैसले का किया समर्थन
दूसरी ओर, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने कार्यक्रम की जगह की बुकिंग रद्द करने के विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले का समर्थन किया।
ABVP की ओर से उमर खालिद को लेकर कड़ी राजनीतिक टिप्पणी की गई और कार्यक्रम को लेकर आपत्ति जताई गई। CNN-News18 को दिए बयान में ABVP सदस्यों ने कहा कि वे SSS-1 में होने वाली चर्चा को जबरन रोकने की कोशिश नहीं करेंगे।
हालांकि, संगठन के सदस्यों ने यह भी कहा कि अगर JNUSU की ओर से कैंपस में हंगामा करने की कोशिश की जाती है, तो वे स्थिति संभालने में विश्वविद्यालय प्रशासन की मदद करेंगे।
इस तरह कार्यक्रम को लेकर कैंपस में दो अलग-अलग रुख साफ दिखाई दिए। एक तरफ कार्यक्रम के आयोजक और समर्थक इसे अकादमिक चर्चा और आदिवासी मुद्दों पर संवाद का मंच बता रहे थे, जबकि दूसरी तरफ ABVP ने कार्यक्रम और उमर खालिद से जुड़े विवादों को लेकर आपत्ति जताई।
प्रोफेसर प्रभु महापात्रा के भाषण के दौरान हुआ विरोध
कार्यक्रम में प्रोफेसर प्रभु महापात्रा के भाषण के दौरान स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। महापात्रा ने किताब के अकादमिक पहलुओं और उसके शोध की दिशा पर चर्चा की।
उन्होंने बताया कि वह झारखंड के उसी क्षेत्र में पले-बढ़े हैं, जिसका संबंध उमर खालिद से बताया जाता है। अपने भाषण में उन्होंने किताब में अलग-अलग सामाजिक वर्गों और समुदायों के बीच मौजूद विरोधाभासों को समझने की कोशिश का उल्लेख किया।
उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल, संसाधनों पर नियंत्रण और आदिवासी आबादी के भविष्य के बीच संबंधों पर भी बात की। उनका फोकस किताब के सामाजिक और ऐतिहासिक पहलुओं पर था।
हालांकि, उनके भाषण के दौरान कुछ छात्रों ने विरोध शुरू कर दिया, जिसके बाद कार्यक्रम में नारेबाजी देखने को मिली।
विरोध प्रदर्शन में लगे राजनीतिक नारे
कार्यक्रम के दौरान ABVP समर्थक छात्रों की ओर से पोस्टर दिखाकर विरोध किए जाने की जानकारी सामने आई। कुछ पोस्टरों में उमर खालिद और उनके परिवार से जुड़े सवाल उठाए गए।
प्रदर्शनकारियों ने उमर खालिद की कथित राजनीतिक विचारधारा और पुराने विवादों को लेकर भी सवाल उठाए। कुछ छात्रों की ओर से पाकिस्तान और कश्मीर से जुड़े राजनीतिक नारे लगाए जाने की बात सामने आई।
विरोध कर रहे छात्रों ने कार्यक्रम में शामिल पैनल पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि सामाजिक और आदिवासी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए चुने गए पैनल की संरचना को भी देखा जाना चाहिए।
इस दौरान SSS-2 के आसपास नारेबाजी जारी रही और कैंपस का माहौल तनावपूर्ण बना रहा।
किताब और विवाद क्या है?
उमर खालिद की किताब ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ आदिवासी इतिहास, समुदायों के भीतर मौजूद विभाजन और सत्ता तथा संसाधनों की राजनीति जैसे विषयों पर केंद्रित है।
किताब को लेकर आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य इसके अकादमिक और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा करना था। लेकिन उमर खालिद की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामले के कारण कार्यक्रम का विषय कैंपस की राजनीति से भी जुड़ गया।
यही वजह रही कि एक अकादमिक चर्चा के रूप में शुरू होने वाला कार्यक्रम विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले, छात्र संगठनों के विरोध और नारेबाजी के कारण विवाद का विषय बन गया।
JNU में अकादमिक चर्चा बनाम कैंपस राजनीति का मुद्दा
जेएनयू में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है। विश्वविद्यालय लंबे समय से विभिन्न विचारधाराओं के बीच बहस और विरोध का प्रमुख केंद्र रहा है।
इस मामले में भी एक तरफ कार्यक्रम के आयोजकों का कहना है कि किसी किताब पर अकादमिक चर्चा को रोका नहीं जाना चाहिए। दूसरी तरफ विरोध करने वाले छात्र उमर खालिद से जुड़े राजनीतिक और कानूनी विवादों को आधार बनाकर कार्यक्रम पर सवाल उठा रहे हैं।
फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कार्यक्रम की जगह की बुकिंग रद्द किया जाना और उसके बाद कैंपस में हुई नारेबाजी है। दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के बीच यह मामला जेएनयू में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अकादमिक बहस और कैंपस राजनीति के बीच संतुलन को लेकर भी चर्चा में आ गया है।
निष्कर्ष
JNU में उमर खालिद की किताब पर आयोजित चर्चा को लेकर हुआ विवाद सिर्फ एक कार्यक्रम के वेन्यू रद्द किए जाने तक सीमित नहीं रहा। इसके बाद छात्रों की मौजूदगी, विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी और अलग-अलग छात्र संगठनों की प्रतिक्रियाओं ने मामले को राजनीतिक रंग दे दिया।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने आयोजकों की ओर से पूरी जानकारी नहीं दिए जाने को वेन्यू रद्द करने की वजह बताया है, जबकि कार्यक्रम समर्थकों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। वहीं ABVP ने प्रशासन की कार्रवाई का समर्थन किया है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर JNU में अकादमिक स्वतंत्रता और छात्र राजनीति के बीच होने वाली बहस को सामने ला दिया है।


