Food Thali Price: देश में सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अब घर में बनने वाली खाने की थाली पर भी दिखाई देने लगा है। जुलाई में शाकाहारी थाली की औसत लागत बढ़ गई, जबकि मांसाहारी थाली की कीमत में गिरावट दर्ज की गई। टमाटर, प्याज और आलू यानी TOP सब्जियों के दाम बढ़ने से वेज थाली महंगी हुई है। दूसरी तरफ ब्रॉयलर चिकन सस्ता होने से नॉन-वेज थाली की लागत कम हुई।
क्रिसिल की ताजा ‘रोटी राइस रेट’ रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में घर पर तैयार होने वाली शाकाहारी थाली की औसत लागत महीने-दर-महीने आधार पर 4 फीसदी बढ़कर ₹28.1 हो गई। जून में यही लागत ₹27.1 थी। वहीं, मांसाहारी थाली की कीमत 2 फीसदी घटकर ₹53.5 पर आ गई, जबकि जून में इसकी औसत लागत ₹54.8 थी।
जुलाई में वेज थाली 4% महंगी
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में शाकाहारी थाली की कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह टमाटर, प्याज और आलू की कीमतों में तेजी रही। इन तीनों सब्जियों को आमतौर पर TOP यानी Tomato, Onion और Potato कहा जाता है।
जून के मुकाबले जुलाई में वेज थाली तैयार करने की औसत लागत ₹27.1 से बढ़कर ₹28.1 हो गई। यानी एक महीने में इसकी कीमत में करीब ₹1 की बढ़ोतरी हुई।
यह आंकड़ा देश के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम हिस्सों में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख खाद्य पदार्थों की कीमतों के आधार पर घर पर एक थाली तैयार करने की अनुमानित लागत को दर्शाता है। इसलिए यह किसी रेस्टोरेंट की थाली की कीमत नहीं है, बल्कि खाद्य महंगाई को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
सालाना आधार पर तस्वीर राहत देने वाली
हालांकि, महीने-दर-महीने बढ़ोतरी के बावजूद सालाना आधार पर तस्वीर अलग है। जुलाई 2025 की तुलना में इस साल जुलाई में शाकाहारी थाली की लागत करीब 14 फीसदी कम रही।
इसका मतलब है कि पिछले साल की तुलना में कई प्रमुख खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अभी भी राहत बनी हुई है। इसलिए जुलाई में आई मासिक तेजी को खाद्य महंगाई में अचानक बड़ी उछाल के तौर पर देखने के बजाय मौसमी सप्लाई और सब्जियों की कीमतों में बदलाव के संदर्भ में समझना ज्यादा उचित होगा।
टमाटर ने बढ़ाया वेज थाली का खर्च
वेज थाली की कीमत बढ़ने में टमाटर की भूमिका सबसे अहम रही। रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में बाजार में टमाटर की आवक में करीब 27 फीसदी की कमी आई। सप्लाई कम होने का सीधा असर इसकी कीमतों पर पड़ा और महीने के दौरान टमाटर के दाम करीब 31 फीसदी बढ़ गए।
मॉनसून के दौरान सब्जियों की सप्लाई प्रभावित होना आम बात है। ज्यादा बारिश, परिवहन में दिक्कत और मंडियों तक फसल पहुंचने में देरी जैसी वजहों से कई बार सब्जियों की कीमतों में अचानक तेजी देखने को मिलती है।
टमाटर के अलावा जुलाई में प्याज की कीमत करीब 5 फीसदी और आलू की कीमत करीब 2 फीसदी बढ़ी। चूंकि ये तीनों ही भारतीय घरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाली प्रमुख सब्जियां हैं, इसलिए इनके दाम में बदलाव का असर सीधे थाली की लागत पर पड़ता है।
नॉन-वेज थाली क्यों हुई सस्ती?
जहां जुलाई में वेज थाली महंगी हुई, वहीं नॉन-वेज थाली की कीमत में गिरावट देखने को मिली। जून में मांसाहारी थाली की औसत लागत ₹54.8 थी, जो जुलाई में घटकर ₹53.5 रह गई।
यानी महीने भर में नॉन-वेज थाली करीब 2 फीसदी सस्ती हुई।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ब्रॉयलर चिकन की कीमत में आई गिरावट है। रिपोर्ट के अनुसार, चिकन मांसाहारी थाली की कुल लागत का करीब आधा हिस्सा होता है। ऐसे में चिकन की कीमत में बदलाव का सीधा असर नॉन-वेज थाली की लागत पर पड़ता है।
चिकन की कीमत 9% गिरी
जुलाई में ब्रॉयलर चिकन की कीमत महीने-दर-महीने आधार पर करीब 9 फीसदी कम हुई। वहीं, सालाना आधार पर भी इसकी कीमत में करीब 12 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
इस गिरावट की प्रमुख वजह मॉनसून और सावन के दौरान चिकन की मांग में कमी को बताया गया है। सावन के महीने में बड़ी संख्या में लोग मांसाहार से परहेज करते हैं। इसके अलावा बारिश के मौसम में भी कई जगह चिकन की मांग प्रभावित होती है।
मांग कमजोर रहने से चिकन की कीमतों पर दबाव आया और इसका फायदा नॉन-वेज थाली की कुल लागत में दिखाई दिया।
सालाना आधार पर नॉन-वेज थाली भी सस्ती
मांसाहारी थाली के मामले में भी सालाना आधार पर राहत देखने को मिली है। जुलाई 2026 में इसकी औसत लागत पिछले साल के जुलाई की तुलना में करीब 13 फीसदी कम रही।
इससे संकेत मिलता है कि भले ही महीने-दर-महीने खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है, लेकिन पिछले साल के ऊंचे आधार की तुलना में थाली की लागत में अभी भी काफी कमी बनी हुई है।
Veg और Non-Veg थाली के दाम एक नजर में
| थाली | जून 2026 | जुलाई 2026 | मासिक बदलाव |
|---|---|---|---|
| वेज थाली | ₹27.1 | ₹28.1 | 4% बढ़ी |
| नॉन-वेज थाली | ₹54.8 | ₹53.5 | 2% घटी |
इस तुलना से साफ है कि जुलाई में वेज थाली की कीमत बढ़ी, जबकि नॉन-वेज थाली सस्ती हुई। दोनों थालियों की कीमतों में यह अंतर मुख्य रूप से इस्तेमाल होने वाली खाद्य सामग्री के दाम में बदलाव की वजह से आया।
बाहर खाने वालों के लिए इसका क्या मतलब?
हालांकि क्रिसिल का यह आंकड़ा घर पर खाना तैयार करने की लागत को दर्शाता है, लेकिन सब्जियों, चिकन और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बदलाव का असर व्यापक खाद्य बाजार पर भी पड़ सकता है।
जब टमाटर, प्याज और आलू जैसी जरूरी चीजें महंगी होती हैं, तो घर का मासिक राशन बजट बढ़ सकता है। वहीं रेस्टोरेंट, ढाबे और छोटे भोजनालय भी कच्चे माल की बढ़ती लागत का असर ग्राहकों पर डाल सकते हैं।
दूसरी तरफ चिकन की कीमतों में गिरावट से नॉन-वेज भोजन तैयार करने की लागत पर कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, किसी रेस्टोरेंट में मिलने वाली थाली की वास्तविक कीमत केवल कच्चे माल पर निर्भर नहीं करती। इसमें किराया, कर्मचारियों की सैलरी, गैस, बिजली, टैक्स और अन्य संचालन लागत भी शामिल होती हैं।
जुलाई के आंकड़े क्या बताते हैं?
जुलाई के आंकड़ों से खाद्य महंगाई की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। एक तरफ रोजमर्रा की सब्जियों की कीमतों में मौसमी तेजी के कारण वेज थाली महंगी हुई, वहीं दूसरी तरफ चिकन की मांग कमजोर होने से नॉन-वेज थाली सस्ती हो गई।
यानी खाद्य महंगाई का असर सभी तरह के भोजन पर एक जैसा नहीं पड़ता। किसी थाली की लागत इस बात पर काफी निर्भर करती है कि उसमें इस्तेमाल होने वाली प्रमुख सामग्री की कीमत उस समय किस दिशा में जा रही है।
फिलहाल जुलाई के आंकड़ों में महीने-दर-महीने वेज थाली पर महंगाई का दबाव दिखाई दिया है, लेकिन सालाना आधार पर दोनों तरह की थालियां पिछले साल की तुलना में सस्ती हैं। आने वाले महीनों में सब्जियों की सप्लाई, मॉनसून की स्थिति और चिकन की मांग में बदलाव यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि थाली की कीमतें आगे किस दिशा में जाती हैं।


