FMCG Price Hikes: FMCG कंपनियां कच्चे माल की बढ़ती लागत और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच प्रोडक्ट्स की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी की तैयारी कर रही हैं। Britannia, HUL, Dabur, Godrej Consumer, Tata Consumer और Nestle India जैसी कंपनियां मार्जिन बचाने के लिए कीमतों में बदलाव के साथ-साथ Shrinkflation का सहारा ले सकती हैं। जानिए किस कंपनी ने क्या संकेत दिए हैं और आने वाले महीनों में ग्राहकों की जेब पर कितना असर पड़ सकता है।
FMCG प्रोडक्ट्स फिर हो सकते हैं महंगे
देश की बड़ी FMCG कंपनियों के प्रोडक्ट्स आने वाली तिमाही में फिर महंगे हो सकते हैं। बिस्किट, साबुन, पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स, चाय-कॉफी, चॉकलेट और अन्य रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। इसकी प्रमुख वजह कच्चे माल की लागत में बढ़ोतरी, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता है।
न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर सक्रिय रूप से रणनीति बना रही हैं। हालांकि, कंपनियों को भारतीय बाजार में मांग को लेकर फिलहाल सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। प्रीमियम प्रोडक्ट्स की मांग मजबूत है और रेवेन्यू ग्रोथ में भी सुधार देखने को मिल रहा है।
इससे पहले जून तिमाही में कई FMCG कंपनियों ने औसतन करीब 2-5 फीसदी तक कीमतों में बढ़ोतरी की थी। अब सितंबर तिमाही में भी कुछ कंपनियां अतिरिक्त प्राइसिंग एक्शन लेने की तैयारी में हैं।
Shrinkflation से भी बढ़ सकता है ग्राहकों का खर्च
कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लागत बढ़ने के बावजूद कीमतों में बहुत ज्यादा वृद्धि करने से ग्राहकों की मांग प्रभावित हो सकती है। ऐसे में कंपनियां केवल कीमत बढ़ाने के बजाय Shrinkflation का विकल्प भी अपना रही हैं।
Shrinkflation में किसी प्रोडक्ट की MRP को समान या मामूली बदलाव के साथ रखते हुए पैकेट में मौजूद सामान की मात्रा कम कर दी जाती है। यानी ग्राहक को पहले की तुलना में कम मात्रा मिलती है, जबकि उसे लगभग उतनी ही कीमत चुकानी पड़ती है।
खास तौर पर छोटे पैक और कम कीमत वाले उत्पादों में यह रणनीति कंपनियों के लिए उपयोगी हो सकती है, क्योंकि ₹5 और ₹10 जैसे पैक की कीमत में सीधे बढ़ोतरी करना ग्राहकों के लिए ज्यादा स्पष्ट होता है।
Britannia: बिस्किट की कीमतों पर दबाव
दिग्गज बेकरी और बिस्किट कंपनी Britannia Industries इस तिमाही में करीब 1.5-2 फीसदी अतिरिक्त प्राइसिंग कर सकती है। कंपनी के लिए चीनी और पाम ऑयल जैसी प्रमुख कमोडिटीज की कीमतें महत्वपूर्ण हैं।
PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी के एमडी और सीईओ रक्षित हरगवे ने संकेत दिया है कि जून तिमाही में प्राइसिंग से जुड़ी ग्रोथ का बड़ा हिस्सा Shrinkflation के जरिए आया था। इसका ओवरऑल प्रभाव करीब 1 फीसदी रहा था।
सितंबर तिमाही में कंपनी को करीब 1.5-2 फीसदी अतिरिक्त प्राइसिंग एक्शन की उम्मीद है। इसका असर खासतौर पर छोटे पैक वाले बिस्किट प्रोडक्ट्स पर दिखाई दे सकता है।
Godrej Consumer: जून में ही बढ़ाए थे करीब 5% दाम
Godrej Consumer Products ने जून तिमाही में औसतन करीब 5 फीसदी कीमतें बढ़ाई थीं। कंपनी ने सितंबर तिमाही में भी जरूरत पड़ने पर कीमतों में और बढ़ोतरी के संकेत दिए हैं।
हालांकि कंपनी फिलहाल कच्चे माल की कीमतों के अगले रुझान को लेकर स्पष्टता का इंतजार कर रही है। कंपनी के सीईओ सुधीर सीतापति के मुताबिक, उसके कई कच्चे माल की कीमतें कच्चे तेल से जुड़ी हुई हैं।
कच्चे तेल की कीमत में बदलाव का असर FMCG कंपनियों की लागत पर कुछ हफ्तों के अंतराल के बाद दिखाई दे सकता है। इसलिए कंपनी का रुख फिलहाल यह है कि जब तक लागत में ज्यादा दबाव नहीं आता, तब तक बहुत बड़ी कीमत वृद्धि की जरूरत नहीं होगी।
Dabur India: महंगाई का बोझ ग्राहकों पर डालने की तैयारी
Dabur India का मानना है कि इनपुट कॉस्ट अभी भी ऊंची रह सकती है। ऐसे में कंपनी मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए सोच-समझकर कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती है।
कंपनी का फोकस केवल प्राइसिंग पर नहीं है। Dabur प्रोडक्टिविटी बढ़ाने और कॉस्ट एफिशिएंसी सुधारने की रणनीति पर भी काम कर रही है।
PTI के मुताबिक, Dabur India के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा ने कहा है कि आने वाले समय में ग्रोथ में रेवेन्यू और कीमतों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। महंगाई ज्यादा रहने की स्थिति में कंपनी को इसका कुछ बोझ ग्राहकों पर डालना पड़ सकता है।
हालांकि, इसका दूसरा असर वॉल्यूम ग्रोथ पर पड़ सकता है। यानी कीमतें बढ़ने पर ग्राहक कम मात्रा में प्रोडक्ट खरीद सकते हैं या सस्ते विकल्पों की ओर जा सकते हैं।
HUL: कई कैटेगरी में बढ़ सकती हैं कीमतें
देश की सबसे बड़ी FMCG कंपनियों में शामिल Hindustan Unilever Limited (HUL) भी सितंबर तिमाही में कई प्रोडक्ट कैटेगरी में कीमतों में बदलाव कर सकती है।
कंपनी को तिमाही आधार पर करीब 2-5 फीसदी तक महंगाई का दबाव दिखाई दे रहा है। कंपनी की सीईओ और एमडी प्रिया नायर के मुताबिक, जून तिमाही में भी कुछ कैटेगरी में 2-5 फीसदी तक कीमतें बढ़ाई गई थीं।
अब कंपनी का लक्ष्य बढ़ती लागत को एडजस्ट करने के साथ-साथ वॉल्यूम ग्रोथ को भी बनाए रखना है। इसलिए HUL की प्राइसिंग रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि इनपुट कॉस्ट और ग्राहकों की मांग किस दिशा में जाती है।
HUL के पोर्टफोलियो में पर्सनल केयर, होम केयर, फूड और अन्य रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले कई प्रोडक्ट शामिल हैं। इसलिए कीमतों में बदलाव का असर बड़ी संख्या में ग्राहकों पर पड़ सकता है।
Tata Consumer: जरूरत पड़ने पर बढ़ाए जाएंगे दाम
Tata Consumer Products ने भी कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया है। कंपनी के एमडी सुनील डिसूजा ने संकेत दिया है कि अगर लागत का दबाव बना रहता है तो जरूरत के अनुसार कीमतों में बदलाव किया जा सकता है।
Tata Consumer के लिए चाय, कॉफी और अन्य FMCG उत्पादों की लागत में बदलाव महत्वपूर्ण है। कंपनी को एक तरफ बढ़ती लागत संभालनी है, वहीं दूसरी तरफ ग्राहकों की मांग को भी बनाए रखना है।
इसलिए कंपनी का अगला कदम कमोडिटी कीमतों और बाजार की मांग पर निर्भर करेगा।
Nestle India: मानसून और El Nino पर नजर
Nestle India के लिए भी आने वाली तिमाही में कमोडिटी लागत और मौसम से जुड़े जोखिम महत्वपूर्ण हैं। कंपनी जियो-पॉलिटिकल तनाव के साथ-साथ मानसून पर El Nino के संभावित प्रभाव पर नजर रख रही है।
मौसम में बदलाव का असर कृषि उत्पादों और उनसे जुड़े कच्चे माल की उपलब्धता तथा कीमतों पर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में खाद्य और पेय पदार्थों की लागत पर दबाव बढ़ने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
ग्राहकों की जेब पर क्या पड़ेगा असर?
अगर FMCG कंपनियां सितंबर तिमाही में कीमतें बढ़ाती हैं तो इसका असर रोजमर्रा की खरीदारी पर पड़ सकता है। हालांकि हर प्रोडक्ट की कीमत समान अनुपात में बढ़े, यह जरूरी नहीं है।
कंपनियां तीन तरीकों से लागत का असर कम करने की कोशिश कर सकती हैं—
- कुछ प्रोडक्ट्स की MRP बढ़ाना
- छोटे पैक में मात्रा कम करना यानी Shrinkflation
- प्रोडक्ट के अलग-अलग पैक और प्रीमियम वेरिएंट की कीमतों में बदलाव
इसका मतलब यह है कि ग्राहक को हर उत्पाद पर सीधे 2-5 फीसदी अधिक कीमत नहीं चुकानी पड़ सकती, लेकिन समान बजट में मिलने वाली मात्रा कम हो सकती है।
आगे किन चीजों पर रहेगी नजर?
FMCG कंपनियों की अगली प्राइसिंग रणनीति कई बाहरी कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें कच्चे तेल की कीमत, पाम ऑयल और चीनी जैसी कमोडिटी की कीमतें, मानसून, El Nino का प्रभाव, जियो-पॉलिटिकल तनाव और ग्रामीण-शहरी मांग प्रमुख हैं।
अगर कच्चे माल की कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं तो कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में प्राइसिंग एक्शन की संभावना भी बढ़ेगी। वहीं अगर कमोडिटी कीमतों में नरमी आती है तो कंपनियों को कीमतें स्थिर रखने और वॉल्यूम ग्रोथ पर ज्यादा ध्यान देने की गुंजाइश मिल सकती है।
फिलहाल Britannia, Dabur, HUL, Godrej Consumer, Tata Consumer और Nestle India के संकेतों से इतना साफ है कि FMCG कंपनियां लागत के दबाव को लेकर सतर्क हैं। आने वाली तिमाही में ग्राहकों को कुछ प्रोडक्ट्स के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है, जबकि कुछ मामलों में कंपनियां पैक का वजन घटाकर लागत का असर कम करने की कोशिश कर सकती हैं।


