Maruti Suzuki Biogas Plant Investment: देश की सबसे बड़ी पैसेंजर व्हीकल निर्माता कंपनियों में शामिल मारुति सुजुकी इंडिया अब सिर्फ कारों के उत्पादन और बिक्री तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा ग्रीन और सस्टेनेबल बनाने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रही है। कंपनी ने अपनी फैक्ट्रियों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बायोगैस को अपनी क्लीन एनर्जी रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है।
मारुति सुजुकी के चेयरमैन आरसी भार्गव ने कंपनी की FY26 वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि बोर्ड ने पहले चरण में ₹561 करोड़ के निवेश से चार बायोगैस प्लांट लगाने की मंजूरी दी है। कंपनी का मानना है कि भारत में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कृषि अवशेष, खाद्य अपशिष्ट और गोबर जैसे संसाधनों से बड़े पैमाने पर बायोगैस तैयार की जा सकती है।
कंपनी की योजना सिर्फ अपनी फैक्ट्रियों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है। मारुति सुजुकी बायोगैस के जरिए आयातित गैस पर निर्भरता कम करने, कृषि अवशेषों के बेहतर इस्तेमाल और किसानों की अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करने की दिशा में भी काम कर रही है।
पहले चरण में 4 बायोगैस प्लांट पर ₹561 करोड़ का निवेश
आरसी भार्गव के मुताबिक, मारुति सुजुकी ने बायोगैस के क्षेत्र में शुरुआती स्तर पर ₹561 करोड़ के निवेश को मंजूरी दी है। इस रकम से चार बायोगैस प्लांट विकसित किए जाएंगे।
कंपनी के लिए यह सिर्फ एक सामान्य एनर्जी प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि लंबे समय की रणनीति का हिस्सा है। शुरुआती प्लांटों से कंपनी बायोगैस के उत्पादन, कच्चे माल की उपलब्धता, प्रोसेसिंग तकनीक और इसे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में इस्तेमाल करने की प्रक्रिया को समझेगी।
मारुति का मानना है कि शुरुआती चरण से अनुभव हासिल करने के बाद भविष्य में इस क्षेत्र में इससे कहीं बड़ा निवेश किया जा सकता है। यानी ₹561 करोड़ का निवेश कंपनी की बायोगैस रणनीति की शुरुआत भर माना जा रहा है।
खरखौदा प्लांट में 10 टन प्रतिदिन बायोगैस की तैयारी
मारुति सुजुकी की हरित ऊर्जा योजना में खरखौदा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। कंपनी पहले चरण में यहां 10 टन प्रति दिन (TPD) क्षमता का बायोगैस प्लांट स्थापित करने जा रही है।
इस प्लांट के FY27 में चालू होने की उम्मीद है। पूरी क्षमता पर संचालन शुरू होने के बाद यह खरखौदा प्लांट की कुल गैस जरूरत का करीब 20 फीसदी हिस्सा पूरा कर सकता है।
इसका मतलब यह है कि मैन्युफैक्चरिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक गैस के एक हिस्से को कंपनी स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाली नवीकरणीय बायोगैस से बदल सकेगी। इससे कंपनी को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के साथ-साथ अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
मानेसर में भी बढ़ाई गई बायोगैस क्षमता
मारुति सुजुकी ने सिर्फ नए प्लांट लगाने की योजना ही नहीं बनाई है, बल्कि मौजूदा बायोगैस क्षमता को भी बढ़ाया है। कंपनी के मानेसर प्लांट में बायोगैस क्षमता को 0.2 TPD से बढ़ाकर 0.7 TPD कर दिया गया है।
कंपनी के मुताबिक, इस क्षमता से सालाना करीब 3.6 लाख स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर बायोगैस उत्पादन की उम्मीद है।
मानेसर प्लांट में बायोगैस बनाने के लिए कई तरह के जैविक संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें फूड वेस्ट, नेपियर घास और धान का पुआल प्रमुख हैं। इसके अलावा गोबर के इस्तेमाल की भी व्यवस्था की जा रही है।
यह मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में कृषि अवशेष और जैविक कचरा बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। यदि इन्हें व्यवस्थित तरीके से ऊर्जा उत्पादन में इस्तेमाल किया जाए, तो एक तरफ कचरे की समस्या कम हो सकती है और दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर स्वच्छ ईंधन तैयार किया जा सकता है।
हंसलपुर प्लांट में प्राकृतिक गैस की जगह बायोगैस का इस्तेमाल
गुजरात स्थित मारुति सुजुकी के हंसलपुर प्लांट में भी कंपनी ने बायोगैस के इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यहां प्राकृतिक गैस की जगह बायोगैस का इस्तेमाल शुरू किया जा चुका है।
कंपनी के अनुसार, फिलहाल बायोगैस से हंसलपुर प्लांट की करीब 10 फीसदी ऊर्जा जरूरत पूरी की जा रही है।
यह कदम बताता है कि मारुति सुजुकी बायोगैस को सिर्फ एक प्रयोग के तौर पर नहीं देख रही है, बल्कि धीरे-धीरे इसे अपने मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशंस का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है।
कंपनी का दीर्घकालिक लक्ष्य FY31 तक प्रतिदिन 20 टन से ज्यादा बायोगैस का इस्तेमाल करने का है। अगर कंपनी इस लक्ष्य को हासिल करती है, तो उसकी फैक्ट्रियों में रिन्यूएबल गैस का इस्तेमाल मौजूदा स्तर के मुकाबले काफी बढ़ जाएगा।
बायोगैस को CNG के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं RC भार्गव
मारुति सुजुकी के चेयरमैन आरसी भार्गव ने बायोगैस को लेकर कंपनी की सोच को व्यापक स्तर पर सामने रखा है। उनका मानना है कि भारत को नेट जीरो लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए किसी एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय कई अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल करना होगा।
इसी कड़ी में बायोगैस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारत में CNG का इस्तेमाल लंबे समय से वाहनों और इंडस्ट्रियल जरूरतों के लिए किया जाता रहा है। लेकिन प्राकृतिक गैस की उपलब्धता और आयात पर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। इसके मुकाबले बायोगैस स्थानीय कृषि और जैविक संसाधनों से तैयार की जा सकती है।
यही वजह है कि मारुति सुजुकी इसे भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक ईंधन के तौर पर देख रही है।
पराली की समस्या का भी हो सकता है समाधान
मारुति की बायोगैस योजना का एक बड़ा फायदा कृषि क्षेत्र से जुड़ा हो सकता है। भारत के कई राज्यों में फसल कटाई के बाद बचने वाले कृषि अवशेषों, खासकर धान के पुआल, के निपटारे की समस्या लंबे समय से बनी हुई है।
कई जगह किसान मजबूरी में फसल अवशेष जला देते हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
यदि इन्हीं कृषि अवशेषों को बायोगैस बनाने के लिए खरीदा और इस्तेमाल किया जाए, तो किसानों के पास पराली जलाने के बजाय उसे बेचने का आर्थिक विकल्प मौजूद होगा।
मारुति सुजुकी की योजना इसी मॉडल को बढ़ावा देने की दिशा में है। कंपनी का मानना है कि कृषि अवशेषों का इस्तेमाल बायोगैस उत्पादन में करने से पर्यावरण को फायदा होगा और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता भी खुल सकता है।
किसानों की आय बढ़ाने की भी कोशिश
बायोगैस प्लांट के लिए सिर्फ कृषि अवशेष ही नहीं, बल्कि गोबर और दूसरे जैविक कचरे की भी जरूरत होती है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक नया अवसर पैदा हो सकता है।
किसान और ग्रामीण परिवार कृषि अवशेष तथा गोबर जैसे संसाधनों को बायोगैस प्लांट तक पहुंचाकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। अगर बड़े स्तर पर ऐसा नेटवर्क विकसित होता है, तो बायोगैस प्लांट ग्रामीण इलाकों में स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे सकते हैं।
मारुति सुजुकी इसी तरह के इकोसिस्टम को विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। कंपनी का मानना है कि इससे कृषि क्षेत्र में यंत्रीकरण को बढ़ावा देने और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
बायोगैस के साथ मिलने वाला उप-उत्पाद भी महत्वपूर्ण
बायोगैस उत्पादन की प्रक्रिया में सिर्फ गैस ही तैयार नहीं होती, बल्कि इसके साथ एक जैविक उप-उत्पाद भी मिलता है। इसका इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में खाद के तौर पर किया जा सकता है।
इससे खेतों में जैविक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। यानी एक ही प्रक्रिया से ऊर्जा उत्पादन, कृषि अवशेषों का निपटारा और कृषि के लिए उपयोगी सामग्री—तीनों फायदे हासिल किए जा सकते हैं।
यही वजह है कि बायोगैस को सिर्फ ऊर्जा उत्पादन की तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल के हिस्से के रूप में भी देखा जा रहा है।
IARI के साथ पिछले दो साल से काम कर रही कंपनी
मारुति सुजुकी इस क्षेत्र में अचानक नहीं उतरी है। कंपनी ने बायोगैस से जुड़े मॉडल और तकनीक को समझने के लिए पिछले करीब दो वर्षों से पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के साथ काम किया है।
इस सहयोग का उद्देश्य कृषि अवशेषों और अन्य जैविक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के जरिए बायोगैस उत्पादन को व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू करने की संभावनाओं को समझना है।
कंपनी के लिए यह सहयोग इसलिए अहम है क्योंकि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बायोगैस के लिए कच्चे माल की उपलब्धता तो काफी है, लेकिन उसे एकत्र करने, परिवहन करने और लगातार प्लांट तक पहुंचाने के लिए मजबूत सप्लाई चेन की जरूरत होगी।
सरकार की GOBARdhan योजना से भी मिलेगा सपोर्ट
मारुति सुजुकी का बायोगैस प्लान ऐसे समय में सामने आया है जब सरकार भी देश में बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस यानी CBG के उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 6 अगस्त को GOBARdhan योजना को मंजूरी दी है। इसके लिए कुल ₹23,731 करोड़ के परिव्यय की योजना बताई गई है। यह कार्यक्रम FY27 से FY36 तक लागू किए जाने का लक्ष्य रखता है।
सरकार की कोशिश है कि भारत के घरेलू बायोगैस उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाया जाए और CBG को देश के भविष्य के ऊर्जा मिश्रण में महत्वपूर्ण स्थान मिले।
ऐसे में मारुति सुजुकी का ₹561 करोड़ का निवेश निजी क्षेत्र की तरफ से बायोगैस को लेकर बढ़ते भरोसे का संकेत माना जा सकता है।
मारुति के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह निवेश?
मारुति सुजुकी के लिए बायोगैस में निवेश के कई रणनीतिक फायदे हो सकते हैं। सबसे पहला फायदा ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना है। कंपनी अपनी फैक्ट्रियों में प्राकृतिक गैस और अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम कर सकती है।
दूसरा फायदा पर्यावरण से जुड़ा है। रिन्यूएबल बायोगैस के इस्तेमाल से कंपनी अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
तीसरा फायदा कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। अगर बायोगैस प्लांटों के लिए कृषि अवशेषों और गोबर की नियमित खरीद का नेटवर्क तैयार होता है, तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त आय के अवसर पैदा हो सकते हैं।
चौथा फायदा कंपनी की लंबी अवधि की ESG और सस्टेनेबिलिटी रणनीति से जुड़ा है। दुनिया भर में ऑटोमोबाइल कंपनियां अपने उत्पादन को ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बनाने पर जोर दे रही हैं और मारुति सुजुकी भी इसी दिशा में अपनी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया को बदलने की कोशिश कर रही है।
आगे और बड़ा निवेश कर सकती है मारुति
₹561 करोड़ का शुरुआती निवेश कंपनी की पूरी बायोगैस रणनीति नहीं है। आरसी भार्गव के बयान से संकेत मिलता है कि शुरुआती चरण में तकनीक और प्रक्रिया का अनुभव हासिल करने के बाद कंपनी इस क्षेत्र में और बड़ा निवेश कर सकती है।
अगर खरखौदा, मानेसर और हंसलपुर जैसे प्लांटों पर बायोगैस मॉडल सफल रहता है और कंपनी को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध होता है, तो भविष्य में इसकी क्षमता को और बढ़ाया जा सकता है।
मारुति के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ प्लांट लगाना नहीं, बल्कि लगातार पर्याप्त मात्रा में कृषि अवशेष, गोबर और अन्य जैविक सामग्री उपलब्ध कराना होगी। इसके लिए किसानों, स्थानीय संस्थाओं और सप्लाई नेटवर्क के साथ मजबूत व्यवस्था बनानी होगी।
कार कंपनी से आगे बढ़कर एनर्जी ट्रांजिशन की तैयारी
मारुति सुजुकी का यह कदम दिखाता है कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में ऊर्जा परिवर्तन सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं है। कंपनी एक तरफ इलेक्ट्रिक और दूसरे वैकल्पिक ईंधनों की दिशा में बदलाव देख रही है, वहीं अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को भी क्लीन एनर्जी से जोड़ रही है।
बायोगैस का मॉडल खास तौर पर भारत के लिए उपयोगी हो सकता है क्योंकि यहां कृषि अवशेष, गोबर और जैविक कचरे जैसे संसाधन बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं।
अगर इन संसाधनों को व्यावसायिक रूप से उपयोगी ऊर्जा में बदला जाता है, तो इससे एक साथ ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण आय, कृषि अवशेष प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई लक्ष्यों को फायदा मिल सकता है।
निष्कर्ष
मारुति सुजुकी का ₹561 करोड़ में चार बायोगैस प्लांट लगाने का फैसला कंपनी की क्लीन एनर्जी रणनीति में एक बड़ा कदम है। खरखौदा में 10 TPD क्षमता वाले प्लांट से शुरुआत, मानेसर में क्षमता विस्तार और हंसलपुर में प्राकृतिक गैस की जगह बायोगैस का इस्तेमाल बताता है कि कंपनी इस तकनीक को धीरे-धीरे अपने मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में शामिल कर रही है।
RC भार्गव की सोच के मुताबिक, बायोगैस सिर्फ फैक्ट्रियों के लिए वैकल्पिक ईंधन नहीं है। यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय, कृषि अवशेषों के बेहतर इस्तेमाल और भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता कम करने का माध्यम भी बन सकती है।
सरकार की GOBARdhan योजना और निजी कंपनियों के बढ़ते निवेश से आने वाले वर्षों में भारत में बायोगैस और CBG का बाजार तेजी से विकसित हो सकता है। ऐसे में मारुति सुजुकी का यह शुरुआती निवेश भविष्य में एक बड़े क्लीन एनर्जी मॉडल की नींव बन सकता है।


