Gobar Dhan Scheme: भारत सरकार की गोबरधन योजना को लेकर भारतीय बायोगैस संघ (IBA) ने बड़ा अनुमान जताया है। संघ का कहना है कि इस योजना के जरिए देश के प्राकृतिक गैस आयात बिल में करीब 5 अरब डॉलर यानी लगभग ₹47,600 करोड़ तक की कमी लाई जा सकती है। योजना के तहत गोबर, कृषि अवशेष और दूसरे जैविक कचरे से कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। इसका फायदा केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण रोजगार, कृषि और पर्यावरण को भी मिल सकता है।
Highlights
- गोबरधन योजना से प्राकृतिक गैस आयात बिल में करीब 5 अरब डॉलर की कमी संभव
- करीब 1,500 CBG संयंत्रों के पूरी क्षमता से संचालन से आयात निर्भरता घटाने में मदद
- उर्वरक आयात और सरकारी सब्सिडी के बोझ में भी कमी की संभावना
- जैविक कचरे से ऊर्जा उत्पादन बढ़ने पर ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं
- योजना से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और चालू खाते के घाटे को भी फायदा मिलने की उम्मीद
₹23,731 करोड़ की गोबरधन योजना से क्या बदलेगा?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। खासतौर पर प्राकृतिक गैस और LNG के आयात पर हर साल बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में घरेलू स्तर पर बायोगैस और CBG का उत्पादन बढ़ाना सरकार की ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है।
भारतीय बायोगैस संघ के अनुसार, करीब ₹23,731 करोड़ की गोबरधन योजना को सिर्फ एक सरकारी खर्च की योजना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैविक कचरे के बेहतर इस्तेमाल से जुड़ा रणनीतिक निवेश भी हो सकता है।
गोबरधन यानी Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan पहल का उद्देश्य जैविक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलना है। इसके तहत पशुओं के गोबर, कृषि अवशेष और अन्य जैविक अपशिष्ट से बायोगैस, CBG और जैविक खाद जैसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
इससे एक तरफ गांवों और कृषि क्षेत्रों में जमा होने वाले जैविक कचरे का समाधान हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ उससे ऊर्जा और खाद का उत्पादन किया जा सकता है।
LNG आयात पर हर साल खर्च होते हैं अरबों डॉलर
भारतीय बायोगैस संघ के मुताबिक भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरत का करीब 50 फीसदी हिस्सा आयात करता है। इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा खर्च और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव होने पर भारत के आयात बिल पर भी असर पड़ता है। इसके अलावा भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट जैसी परिस्थितियां भी गैस की उपलब्धता और कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।
IBA के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में LNG आयात बिल करीब 15.2 अरब डॉलर रहा था। ऐसे में यदि घरेलू स्तर पर CBG का उत्पादन बड़े पैमाने पर बढ़ता है, तो प्राकृतिक गैस के विकल्प के रूप में इसका इस्तेमाल आयात पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।
1,500 CBG प्लांट हुए सफल तो बड़ा फायदा
भारतीय बायोगैस संघ का अनुमान है कि यदि करीब 1,500 कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) संयंत्र पूरी क्षमता के साथ संचालित होते हैं, तो प्राकृतिक गैस आयात से जुड़े व्यापार घाटे में लगभग एक-तिहाई तक कमी लाई जा सकती है।
संघ के अनुमान के मुताबिक इससे करीब 5 अरब डॉलर की बचत संभव है। मौजूदा विनिमय दर के आसपास यह राशि लगभग ₹47,600 करोड़ बैठती है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह बचत हर साल होने वाली संभावित आयात बचत का अनुमान है, न कि सरकार द्वारा पहले से तय की गई निश्चित बचत। वास्तविक बचत CBG उत्पादन, उसकी खपत, गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमत और संयंत्रों की क्षमता के इस्तेमाल जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी।
फिर भी अगर बड़े पैमाने पर CBG उत्पादन और इस्तेमाल सफल होता है, तो इससे भारत के ऊर्जा आयात बिल पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है।
गोबर से सिर्फ गैस नहीं, खाद भी बनेगी
गोबरधन योजना की खासियत यह है कि इसमें जैविक कचरे को केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता। बायोगैस या CBG तैयार करने की प्रक्रिया के बाद बचने वाले पदार्थ का इस्तेमाल जैविक खाद के तौर पर भी किया जा सकता है।
इससे किसानों को एक अतिरिक्त फायदा मिल सकता है। एक ओर खेतों और पशुपालन से निकलने वाले कचरे का इस्तेमाल ऊर्जा बनाने में होगा, वहीं दूसरी ओर उससे तैयार जैविक खाद कृषि में इस्तेमाल की जा सकेगी।
इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की संभावना भी बनती है।
उर्वरक आयात बिल में भी आ सकती है कमी
भारतीय बायोगैस संघ ने उर्वरक आयात को लेकर भी बड़ा अनुमान दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का उर्वरक आयात बिल करीब 18 अरब डॉलर बताया गया है।
IBA का अनुमान है कि करीब 1,500 CBG संयंत्रों के संचालन और बेहतर कृषि पद्धतियों को अपनाने से उर्वरक आयात में कम से कम 5 फीसदी तक कमी लाई जा सकती है।
हालांकि, इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि हर साल पूरे 5 फीसदी आयात बिल की बचत निश्चित रूप से होगी। यह कई चीजों पर निर्भर करेगा, जिसमें जैविक खाद का उत्पादन, किसानों द्वारा उसका इस्तेमाल, फसल पैटर्न और घरेलू उर्वरक उत्पादन की क्षमता शामिल हैं।
फिर भी जैविक कचरे से ऊर्जा और खाद दोनों का उत्पादन होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक तरह का सर्कुलर मॉडल तैयार हो सकता है।
चालू खाते के घाटे को भी मिल सकता है फायदा
भारत के लिए आयात कम करना केवल ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा नहीं है। इससे देश के चालू खाते के घाटे पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
IBA के मुताबिक गोबरधन योजना से चालू खाते के घाटे में करीब 1 अरब डॉलर तक की कमी आने की संभावना है। इसका कारण यह है कि यदि देश प्राकृतिक गैस, उर्वरक और दूसरे आयातित संसाधनों पर खर्च कम करता है, तो विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है।
यह बचत लंबे समय में भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में योगदान दे सकती है।
गांवों में रोजगार के नए अवसर
गोबरधन योजना का एक बड़ा फायदा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिल सकता है। CBG प्लांट स्थापित करने के लिए गोबर, कृषि अवशेष और दूसरे जैविक कचरे की नियमित सप्लाई की जरूरत होगी।
इससे गांवों में कचरा संग्रह, परिवहन, प्लांट संचालन, रखरखाव और जैविक खाद के वितरण जैसे कामों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
कुशल और अर्द्ध-कुशल श्रमिकों की मांग बढ़ने के साथ स्थानीय स्तर पर छोटे कारोबार भी विकसित हो सकते हैं। किसानों और पशुपालकों के लिए भी गोबर और कृषि अवशेष अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकते हैं।
प्रदूषण कम करने में भी मदद
खुले में कृषि अवशेष और जैविक कचरा जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है। दूसरी ओर, पशुओं का गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट अगर सही तरीके से प्रबंधित न हो तो पर्यावरण पर भी असर डाल सकता है।
यदि इसी कचरे को CBG और जैविक खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो कचरे का बेहतर प्रबंधन संभव है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण घटाने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों अहम है CBG?
भारत की ऊर्जा जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल आयात पर निर्भर रहना लंबे समय में महंगा साबित हो सकता है। घरेलू स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों से गैस तैयार करना इस निर्भरता को कुछ हद तक कम करने का विकल्प देता है।
CBG को प्राकृतिक गैस के एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जाता है। इसे वाहनों के ईंधन, औद्योगिक इस्तेमाल और अन्य गैस आधारित जरूरतों में इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते उत्पादन, गुणवत्ता, वितरण और बाजार से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम पर्याप्त रूप से विकसित हो।
यही वजह है कि गोबरधन योजना को केवल ‘गोबर से गैस बनाने’ वाली योजना के बजाय कचरे को ऊर्जा, खाद और रोजगार में बदलने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
आगे की राह क्या होगी?
गोबरधन योजना से अनुमानित फायदे हासिल करने के लिए केवल CBG प्लांट लगाना पर्याप्त नहीं होगा। इन संयंत्रों को लगातार और आर्थिक रूप से व्यवहार्य तरीके से चलाना भी जरूरी होगा।
इसके लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चे माल की उपलब्धता, किसानों और पशुपालकों से जुड़ा सप्लाई नेटवर्क, CBG की खरीद और बिक्री की व्यवस्था, प्लांट की वित्तीय व्यवहार्यता और तकनीकी क्षमता जैसे पहलू महत्वपूर्ण होंगे।
अगर इन चुनौतियों का समाधान किया जाता है और प्रस्तावित CBG संयंत्र पूरी क्षमता के करीब काम करते हैं, तो भारत को ऊर्जा आयात, ग्रामीण रोजगार, जैविक कचरा प्रबंधन और कृषि—चारों मोर्चों पर फायदा मिल सकता है।
निष्कर्ष
गोबरधन योजना भारत के लिए सिर्फ ‘गोबर से गैस’ बनाने की पहल नहीं है। इसके पीछे ऊर्जा आयात कम करने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, जैविक कचरे का बेहतर इस्तेमाल करने और कृषि में जैविक संसाधनों की भूमिका बढ़ाने की बड़ी संभावना है।
भारतीय बायोगैस संघ का करीब 5 अरब डॉलर यानी लगभग ₹47,600 करोड़ की संभावित प्राकृतिक गैस आयात बचत का अनुमान इसी संभावना को रेखांकित करता है। हालांकि यह एक अनुमान है और वास्तविक बचत CBG संयंत्रों के उत्पादन, मांग और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
अगर देश में करीब 1,500 CBG संयंत्र प्रभावी ढंग से काम करने लगते हैं, तो ‘कचरे से कमाई’ का यह मॉडल भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रामीण विकास के लिए एक अहम बदलाव साबित हो सकता है।


