Silver Price Outlook: साल 2026 में चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब 23% की कमजोरी और भारत में लगभग ₹65,000 प्रति किलो की गिरावट के बाद निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चांदी में गिरावट अभी जारी रहेगी या यह लंबी अवधि के निवेश का अच्छा मौका बन रहा है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि आगे की दिशा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों, कच्चे तेल की कीमतों, गोल्ड-सिल्वर रेशियो और वैश्विक आर्थिक हालात पर निर्भर करेगी।
इस साल ₹65,000 प्रति किलो सस्ती हुई चांदी
साल की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने वाली चांदी अब निवेशकों को निराश कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत करीब 58 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रही है, जबकि भारत में चांदी का भाव करीब ₹2.20 लाख प्रति किलो है।
इस साल अब तक चांदी में करीब 23% की गिरावट दर्ज की गई है और केवल जून महीने में ही इसमें लगभग 22% की तेज कमजोरी देखने को मिली। इसके चलते भारतीय बाजार में चांदी करीब ₹65,000 प्रति किलो सस्ती हो चुकी है। हालांकि, पिछले एक साल में इस धातु ने निवेशकों को 50% से अधिक का शानदार रिटर्न भी दिया था।
आखिर चांदी पर दबाव क्यों बना हुआ है?
विशेषज्ञों के अनुसार चांदी की कीमतों पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का है।
ईरान संघर्ष के बाद होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई और ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 86 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो संघर्ष शुरू होने से पहले की तुलना में करीब 20% अधिक है।
तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ती है और इसका सीधा असर दुनिया भर के वित्तीय बाजारों पर पड़ता है।
फेड की ब्याज दरें क्यों तय करेंगी चांदी की चाल?
जब महंगाई बढ़ती है तो अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve पर ब्याज दरें ऊंची रखने या बढ़ाने का दबाव बनता है।
उच्च ब्याज दरों के कारण डॉलर मजबूत होता है और निवेशक सोना-चांदी जैसी बिना ब्याज वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर डॉलर आधारित निवेश की ओर रुख करने लगते हैं। यही वजह है कि फेड की नीति चांदी की कीमतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर मानी जा रही है।
चांदी में उतार-चढ़ाव सोने से ज्यादा क्यों?
सोने की तुलना में चांदी की कीमतों में अधिक तेजी और गिरावट देखने को मिलती है क्योंकि यह केवल निवेश का साधन नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण औद्योगिक धातु भी है।
चांदी का इस्तेमाल इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर होता है—
- सोलर पैनल
- इलेक्ट्रॉनिक्स
- इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV)
- डेटा सेंटर
- पावर ग्रिड
- हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग
इसलिए औद्योगिक मांग में थोड़ी सी कमी या बढ़ोतरी भी इसकी कीमतों पर बड़ा असर डालती है।
Gold-Silver Ratio क्या बताता है?
गोल्ड-सिल्वर रेशियो यह बताता है कि 1 औंस सोना खरीदने के लिए कितने औंस चांदी की जरूरत होगी।
इसे सोने की कीमत को चांदी की कीमत से भाग देकर निकाला जाता है।
- 75 या उससे ऊपर का रेशियो बताता है कि चांदी अपेक्षाकृत सस्ती है।
- 50-60 या उससे नीचे का रेशियो बताता है कि सोना अपेक्षाकृत सस्ता माना जा सकता है।
जून 2026 में यह रेशियो लगभग 67 रहा, जबकि मई में यह 55 और जनवरी में करीब 50 तक आ गया था।
क्या मौजूदा स्तर पर चांदी खरीदनी चाहिए?
Bonanza के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निरपेन्द्र यादव का कहना है कि करीब 70 का गोल्ड-सिल्वर रेशियो अपने ऐतिहासिक औसत के आसपास है।
उनके अनुसार चांदी फिलहाल सोने के मुकाबले थोड़ी सस्ती दिखाई देती है, खासकर तब जब औद्योगिक मांग मजबूत बनी रहे। भारत में दिसंबर 2025 से चांदी लगातार ₹2 लाख प्रति किलो से ऊपर बनी हुई है, जिससे इसकी लंबी अवधि की मजबूती भी दिखाई देती है।
आगे सोना या चांदी, किसमें ज्यादा दम?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में Gold-Silver Ratio 65 से 75 के बीच रह सकता है।
अगर ये स्थितियां बनती हैं—
- फेड ब्याज दरों में कटौती करता है
- डॉलर कमजोर पड़ता है
- वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में सुधार आता है
तो चांदी सोने से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है और गोल्ड-सिल्वर रेशियो 60-65 तक आ सकता है।
वहीं यदि—
- भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है
- वैश्विक मंदी की आशंका गहराती है
- सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ती है
तो सोना चांदी से बेहतर प्रदर्शन कर सकता है और गोल्ड-सिल्वर रेशियो 70 से ऊपर बना रह सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है सही रणनीति?
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में केवल सोना या केवल चांदी चुनने के बजाय दोनों में संतुलित निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है।
कम जोखिम लेने वाले निवेशकों के लिए सोना अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प माना जा सकता है। वहीं जिन निवेशकों का नजरिया लंबी अवधि का है और जो थोड़ा अधिक जोखिम उठा सकते हैं, वे चरणबद्ध तरीके से चांदी में निवेश बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। मौजूदा वैल्यूएशन के आधार पर भविष्य में चांदी के बेहतर प्रदर्शन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
चांदी में इस साल आई बड़ी गिरावट ने निवेशकों को जरूर परेशान किया है, लेकिन विशेषज्ञ इसे केवल कमजोरी नहीं बल्कि संभावित अवसर के रूप में भी देख रहे हैं। आने वाले महीनों में फेड की ब्याज दरों, कच्चे तेल की चाल, डॉलर इंडेक्स और औद्योगिक मांग पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो चांदी दोबारा तेजी पकड़ सकती है।
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। इसमें दिए गए विचार संबंधित एक्सपर्ट्स के निजी मत हैं। NewsJagran.in किसी भी निवेश सलाह की जिम्मेदारी नहीं लेता। किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार या प्रमाणित निवेश विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।


