Samudra Manthan Scheme: वैश्विक ऊर्जा संकट और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी ‘समुद्र मंथन’ राष्ट्रीय अपतटीय (ऑफशोर) अन्वेषण योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का उद्देश्य भारत के समुद्री क्षेत्रों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को तेज करना, आयात पर निर्भरता कम करना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना है।
नई दिल्ली
भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कैबिनेट ने 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना (Samudra Manthan Scheme) को मंजूरी दे दी है। यह योजना पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत लागू होगी और वित्त वर्ष 2030-31 तक संचालित की जाएगी।
सरकार का लक्ष्य देश के विशाल अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में मौजूद तेल और गैस संसाधनों की खोज को नई गति देना है, ताकि घरेलू उत्पादन बढ़ाया जा सके और आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो।
600 MMTOE से अधिक नए तेल-गैस भंडार जोड़ने का लक्ष्य
#WATCH दिल्ली | केंद्रीय मंत्रिमंडल की ब्रीफिंग में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, "आज 'समुद्र मंथन' प्रोग्राम को मंज़ूरी दी गई है। इसका मकसद देश में तेल और गैस के उत्पादन के लिए खोज करना है और इसके लिए 84,000 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है… इसके दो मुख्य हिस्से हैं:… pic.twitter.com/8CD8ENWNhA
— ANI_HindiNews (@AHindinews) July 31, 2026 सरकार के अनुसार, इस योजना के जरिए भारत के हाइड्रोकार्बन भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MMTOE) से अधिक की वृद्धि होने का अनुमान है।
योजना के तहत समुद्री क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अन्वेषण अभियान चलाए जाएंगे, जिससे नए तेल और गैस भंडार खोजे जा सकेंगे। इससे भविष्य में घरेलू उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है और भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा देश के भीतर से पूरा किया जा सकेगा।
क्यों जरूरी है ‘समुद्र मंथन’ योजना?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बना रहता है।
इसी चुनौती को देखते हुए सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया है। यदि देश के भीतर अधिक तेल और गैस का उत्पादन होगा तो आयात बिल कम होगा और वैश्विक संकटों का असर भी सीमित रहेगा।
योजना के दो प्रमुख स्तंभ
‘समुद्र मंथन’ योजना को मुख्य रूप से दो हिस्सों में लागू किया जाएगा।
- उच्च गुणवत्ता वाले सीस्मिक (भूकंपीय) डेटा का संग्रह, प्रोसेसिंग और विश्लेषण।
- अपतटीय अन्वेषण के लिए साझा इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का विकास।
इसके अलावा योजना के तहत कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाएंगे, जिनमें शामिल हैं—
- गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में खोजी ड्रिलिंग।
- सीमांत बेसिनों में वैज्ञानिक ड्रिलिंग।
- साझा अपतटीय उत्पादन एवं निकासी अवसंरचना का विकास।
- एकीकृत ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विसेज जोन की स्थापना।
आधुनिक तकनीक और डिजिटल सिस्टम पर रहेगा फोकस
सरकार इस योजना में केवल तेल और गैस की खोज तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर भी विशेष जोर देगी।
योजना के तहत डिजिटल प्रोग्राम मैनेजमेंट, क्षमता निर्माण, नई तकनीकों को अपनाने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने और विभिन्न हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में काम किया जाएगा। इसका उद्देश्य भारत में विश्वस्तरीय ऑफशोर एक्सप्लोरेशन इकोसिस्टम तैयार करना है।
रोजगार और ‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा बढ़ावा
सरकार का मानना है कि ‘समुद्र मंथन’ योजना से देश में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
इसके साथ ही—
- ‘मेक इन India’ अभियान को मजबूती मिलेगी।
- ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन को गति मिलेगी।
- स्वदेशी अपतटीय तकनीक और उपकरण निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
- तेल एवं गैस क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश आकर्षित होगा।
- औद्योगिक विकास और नवाचार को नई रफ्तार मिलेगी।
विदेशी मुद्रा की होगी बचत
सरकार का अनुमान है कि योजना के सफल क्रियान्वयन के बाद देश में हर वर्ष 10 से 15 MMTOE अतिरिक्त तेल एवं गैस उत्पादन संभव होगा, जबकि चरम क्षमता पर यह आंकड़ा 20 MMTOE तक पहुंच सकता है।
इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और भारत का चालू खाता घाटा कम करने में भी मदद मिल सकती है। साथ ही जीडीपी वृद्धि और ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा।
‘समुद्र मंथन’ योजना से देश को क्या मिलेगा?
- 84,084 करोड़ रुपये का बड़ा ऊर्जा निवेश।
- 600 MMTOE से अधिक नए तेल-गैस भंडार जोड़ने का लक्ष्य।
- आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम।
- ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती।
- ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक तकनीक का विकास।
- रोजगार और निवेश में वृद्धि।
- विदेशी मुद्रा की बचत और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक लाभ।


