दिल्ली हाई कोर्ट ने गुजरात के सुवाली अपतटीय तेल क्षेत्र को लेकर वेदांता की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए ONGC को संचालन सौंपने के निर्णय पर मुहर लगा दी।
अनिल अग्रवाल की वेदांता को बड़ा झटका! दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार के फैसले पर लगाई मुहर
नई दिल्ली: अरबपति उद्योगपति अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता लिमिटेड (Vedanta Ltd.) को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने गुजरात के सुवाली (Suvali) अपतटीय तेल क्षेत्र (Offshore Oil Field) के उत्पादन साझेदारी अनुबंध (Production Sharing Contract-PSC) की अवधि बढ़ाने से इनकार करने के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। इसके साथ ही इस समुद्री तेल क्षेत्र का संचालन ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) को सौंपने का रास्ता भी साफ हो गया है।
दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद वेदांता की वह याचिका खारिज हो गई जिसमें कंपनी ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद गुजरात के सुवाली अपतटीय तेल क्षेत्र से जुड़ा है। केंद्र सरकार, वेदांता, ONGC और इन्वेनायर पेट्रोडाइन लिमिटेड के बीच वर्ष 1998 में उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) हुआ था।
- अनुबंध की मूल अवधि 30 जून 1998 से 29 जून 2023 तक थी।
- अनुबंध में विशेष परिस्थितियों में सीमित अवधि तक विस्तार का प्रावधान था।
- वेदांता इस परियोजना की नामित ऑपरेटर थी।
- बाद में सरकार ने पांच अंतरिम विस्तार दिए, जिनमें अंतिम विस्तार 29 सितंबर 2024 तक प्रभावी रहा।
इसके बाद वेदांता ने अनुबंध को 29 जून 2033 तक यानी 10 वर्ष बढ़ाने का अनुरोध किया था, जिसे केंद्र सरकार ने 2025 में खारिज कर दिया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की पीठ ने कहा कि सरकार द्वारा अनुबंध विस्तार से इनकार करना उचित था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वेदांता ने सरकार के हिस्से की राशि में एकतरफा कटौती कर अपनी उत्पाद शुल्क (Excise Duty) से जुड़ी देनदारी की भरपाई करने की कोशिश की। यह कदम अनुबंध की भावना के अनुरूप नहीं था।
कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि:
सार्वजनिक संसाधनों का संचालन करने वाली निजी कंपनी पर सरकार के हिस्से की सुरक्षा की विशेष जिम्मेदारी होती है। सरकार को किसी निजी कंपनी की मनमानी या उसकी अपनी व्याख्या के आधार पर नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
अदालत ने माना कि कंपनी का यह व्यवहार अनुबंध विस्तार न देने के लिए पर्याप्त आधार था।
ONGC को मिलेगा संचालन का जिम्मा
वेदांता ने अपनी याचिका में यह भी मांग की थी कि ONGC को संचालन सौंपने के निर्देश को रद्द किया जाए। हालांकि हाई कोर्ट ने इस मांग को भी अस्वीकार कर दिया।
अब गुजरात के इस अपतटीय तेल क्षेत्र का संचालन ONGC के पास जाएगा।
वेदांता ने क्या दलील दी?
वेदांता ने अदालत में कहा कि:
- अनुबंध विस्तार उसका कानूनी अधिकार नहीं था।
- लेकिन सरकार का फैसला विस्तार नीति के अनुरूप नहीं था।
- कंपनी का दावा था कि मंत्रालय ने सभी तथ्यों पर उचित विचार नहीं किया।
हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और सरकार के निर्णय को वैध माना।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि अनुबंध बढ़ाने से इनकार करने का फैसला पूरी तरह जनहित और Public Trust Doctrine (सार्वजनिक न्यास सिद्धांत) के अनुरूप लिया गया है।
सरकार का कहना था कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग सार्वजनिक हित में होना चाहिए और अनुबंध से जुड़े नियमों का सख्ती से पालन आवश्यक है।
वेदांता पर क्या होगा असर?
हालांकि इस फैसले का वेदांता के पूरे कारोबार पर तत्काल बड़ा वित्तीय असर नहीं माना जा रहा, लेकिन गुजरात के इस अपतटीय तेल क्षेत्र पर कंपनी का संचालन समाप्त हो जाएगा। इससे कंपनी के ऑयल एंड गैस पोर्टफोलियो पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, यह फैसला भविष्य में सरकारी ऊर्जा अनुबंधों और उत्पादन साझेदारी समझौतों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दर्शाता है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े सरकारी अनुबंधों में अनुबंध की शर्तों और राजस्व साझेदारी का पालन बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में अदालतें सार्वजनिक हित और सरकारी हिस्सेदारी को प्राथमिकता देती हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र सरकार को बड़ी कानूनी राहत मिली है, जबकि अनिल अग्रवाल की वेदांता को महत्वपूर्ण झटका लगा है। अदालत ने साफ कर दिया कि सार्वजनिक संसाधनों से जुड़े अनुबंधों में निजी कंपनियां सरकार के हिस्से को लेकर एकतरफा निर्णय नहीं ले सकतीं। अब गुजरात के सुवाली अपतटीय तेल क्षेत्र का संचालन ONGC के हाथों में जाएगा।


