Trump Tariffs on Pharma: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाने की नई योजना का ऐलान किया है। हालांकि यह टैरिफ तत्काल लागू नहीं होगा और अगस्त 2028 तक जेनेरिक दवाओं को राहत मिलेगी। लेकिन इसके बाद लागू होने वाली भारी शुल्क व्यवस्था भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि टैरिफ से भी बड़ी समस्या भारत की चीन से कच्चे माल (API) पर भारी निर्भरता है।
ट्रंप ने क्या किया ऐलान?
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अपनी नई फार्मास्युटिकल नीति के तहत कहा है कि 1 अगस्त 2028 तक अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगेगा।
इसके बाद चरणबद्ध तरीके से शुल्क बढ़ाया जाएगा।
- 1 अगस्त 2028 से जुलाई 2029 तक: 100% टैरिफ
- 1 अगस्त 2029 से आगे: 200% टैरिफ
- यह टैरिफ तब तक लागू रहेगा जब तक कंपनियां अपना उत्पादन अमेरिका में स्थानांतरित नहीं कर देतीं।
ट्रंप का कहना है कि इस दो साल की अवधि का उद्देश्य वैश्विक दवा कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग स्थापित करने का पर्याप्त समय देना है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
ट्रंप प्रशासन लंबे समय से अमेरिकी विनिर्माण (Manufacturing) को बढ़ावा देने की नीति पर काम कर रहा है। नई योजना का मकसद विदेशों से दवाओं के आयात पर निर्भरता कम करना और दवा निर्माण को अमेरिका वापस लाना है।
इसके तहत पहले ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं पर टैरिफ की योजना बनाई गई थी, लेकिन अब जेनेरिक दवाओं को भी इस दायरे में शामिल कर लिया गया है।
अमेरिका कितना आयात करता है दवाएं?
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार वर्ष 2025 में अमेरिका ने करीब 213 अरब डॉलर के फार्मास्युटिकल उत्पादों का आयात किया।
इनमें शामिल हैं:
- कुल फार्मा आयात: 213 अरब डॉलर
- तैयार दवाओं (Finished Medicines) का आयात: 94.1 अरब डॉलर
- इसी श्रेणी में अधिकांश जेनेरिक दवाएं आती हैं।
भारत को कितना नुकसान हो सकता है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में शामिल है।
GTRI के मुताबिक:
- 2025 में अमेरिका को भारत का फार्मा निर्यात: 9.7 अरब डॉलर
- भारत का कुल वैश्विक फार्मा निर्यात: 25.8 अरब डॉलर
- कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी: 37.7%
यानी अमेरिका भारतीय दवा उद्योग का सबसे बड़ा विदेशी बाजार है।
अमेरिकी बाजार में भारत की कितनी हिस्सेदारी?
रिपोर्ट के अनुसार,
- अमेरिका में बिकने वाली करीब 47% जेनेरिक दवाएं भारतीय कंपनियां सप्लाई करती हैं।
- लेकिन कम कीमत होने के कारण अमेरिकी जेनेरिक आयात के कुल मूल्य में भारत की हिस्सेदारी लगभग 30% मानी जाती है।
यही वजह है कि भारत की दवा कंपनियों के लिए अमेरिका बेहद महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है।
क्या 200% टैरिफ से भारतीय दवाएं महंगी हो जाएंगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर सभी दवाओं पर समान नहीं होगा।
कई भारतीय जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 7 से 10 गुना तक सस्ती होती हैं। ऐसे में 100% टैरिफ लगने के बाद भी वे कई मामलों में अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी रह सकती हैं।
हालांकि सबसे ज्यादा असर इन पर पड़ सकता है:
- महंगी जेनेरिक दवाएं
- ब्रांडेड जेनेरिक दवाएं
- उच्च मार्जिन वाले उत्पाद
भारत की बड़ी फार्मा कंपनियों को मिलेगी कुछ राहत
भारत की कई प्रमुख दवा कंपनियां पहले से ही अमेरिका में उत्पादन कर रही हैं।
इनमें शामिल हैं:
- सन फार्मा
- डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज
- सिप्ला
- ल्यूपिन
- जाइडस लाइफसाइंसेज
- अरबिंदो फार्मा
सिप्ला अमेरिका में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही है, जबकि डॉ. रेड्डीज ने भी आवश्यकता पड़ने पर वहां उत्पादन बढ़ाने के संकेत दिए हैं।
अमेरिका में उत्पादन बढ़ाना इतना आसान क्यों नहीं?
विशेषज्ञों का कहना है कि जेनेरिक दवाओं का कारोबार बेहद कम मुनाफे पर चलता है।
अमेरिका में बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने में कई चुनौतियां हैं:
- भारी निवेश की आवश्यकता
- नई फैक्ट्री स्थापित करने में वर्षों का समय
- FDA मंजूरी की प्रक्रिया
- श्रम लागत अधिक होना
- सप्लाई चेन दोबारा विकसित करना
यही कारण है कि अधिकांश कंपनियों के लिए तुरंत अमेरिका में उत्पादन स्थानांतरित करना आसान नहीं होगा।
ट्रंप के टैरिफ से भी बड़ी चुनौती चीन
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम अमेरिकी टैरिफ नहीं बल्कि चीन पर कच्चे माल की निर्भरता है।
GTRI के मुताबिक,
- भारत द्वारा उपयोग किए जाने वाले करीब 70% केमिकल आधारित API (Active Pharmaceutical Ingredients) चीन से आते हैं।
- वहीं लगभग 90% बायोलॉजिक इनपुट भी चीन से आयात किए जाते हैं।
अगर भविष्य में चीन API के निर्यात पर कोई प्रतिबंध लगाता है या आपूर्ति कम करता है, तो भारतीय दवा उद्योग की सप्लाई चेन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों की क्या सलाह?
GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को अब दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।
उन्होंने सुझाव दिए हैं:
- देश में API का घरेलू उत्पादन तेजी से बढ़ाया जाए।
- चीन पर निर्भरता कम की जाए।
- यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया में नए निर्यात बाजार विकसित किए जाएं।
- अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता घटाई जाए।
आगे क्या होगा?
फिलहाल यह टैरिफ व्यवस्था तुरंत लागू नहीं हो रही है। अगस्त 2028 तक कंपनियों के पास रणनीति बदलने का समय रहेगा। इस दौरान अमेरिकी राजनीतिक परिस्थितियों, कानूनी चुनौतियों या नीति में बदलाव की भी संभावना बनी रहेगी।
हालांकि ट्रंप प्रशासन का संदेश स्पष्ट है कि भविष्य में अमेरिकी बाजार में वही कंपनियां अधिक लाभ में रहेंगी, जिनके पास अमेरिका में विनिर्माण क्षमता होगी।
निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित 200% टैरिफ नीति भारतीय फार्मा उद्योग के लिए चिंता का विषय जरूर है, लेकिन इसका असर तुरंत दिखाई नहीं देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक और दीर्घकालिक चुनौती चीन पर API निर्भरता है। यदि भारत घरेलू कच्चे माल के उत्पादन को मजबूत करता है और नए वैश्विक बाजारों में विस्तार करता है, तो वह इस चुनौती को अवसर में भी बदल सकता है।


