Infosys IPO ESOP Story: भारतीय कॉरपोरेट इतिहास में कुछ ऐसी कहानियां हैं, जो सिर्फ बिजनेस की सफलता नहीं बल्कि कर्मचारियों के जीवन में आए बड़े बदलाव के लिए भी याद की जाती हैं। इंफोसिस की कहानी भी ऐसी ही है। साल 1999 में जब कंपनी के हजारों कर्मचारी करोड़पति बने, तो पूरे देश में इसकी चर्चा हुई। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि केवल सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही नहीं, बल्कि कंपनी के ड्राइवर, इलेक्ट्रीशियन और सपोर्ट स्टाफ तक को इस सफलता का लाभ मिला। इसके पीछे था संस्थापक एन. आर. नारायण मूर्ति का एक दूरदर्शी फैसला, जिसने भारत में कर्मचारी भागीदारी (Employee Ownership) की नई मिसाल कायम की।
Highlights
- 1993 में इंफोसिस का IPO ₹95 प्रति शेयर पर आया था।
- शुरुआती दौर में IPO को पर्याप्त सब्सक्रिप्शन नहीं मिला।
- 1994 में इंफोसिस ने भारत का पहला बड़े पैमाने का ESOP शुरू किया।
- 1999 में Nasdaq पर लिस्टिंग के बाद शेयरों में जबरदस्त उछाल आया।
- ड्राइवर, इलेक्ट्रीशियन और सपोर्ट स्टाफ सहित हजारों कर्मचारी करोड़पति बने।
जब IPO को नहीं मिल रहे थे खरीदार
आज इंफोसिस भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में गिनी जाती है, लेकिन 1993 में हालात बिल्कुल अलग थे। कंपनी का IPO ₹95 प्रति शेयर के भाव पर लॉन्च हुआ, लेकिन निवेशकों का उत्साह उम्मीद के मुताबिक नहीं था।
बताया जाता है कि उस समय ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक Morgan Stanley ने आगे आकर कंपनी में करीब 13% हिस्सेदारी खरीदकर IPO को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही निवेश भारतीय शेयर बाजार के सबसे सफल निवेशों में शामिल हो जाएगा।
1994 में लिया गया ऐतिहासिक फैसला
IPO के एक साल बाद, यानी 1994 में इंफोसिस ने Employee Stock Option Plan (ESOP) की शुरुआत की। उस समय भारत में कर्मचारियों को कंपनी के शेयर देने की संस्कृति लगभग नहीं थी।
पूर्व CFO टी.वी. मोहनदास पाई के अनुसार, इस योजना को सिर्फ वरिष्ठ अधिकारियों तक सीमित नहीं रखा गया। कंपनी ने इंजीनियरों, मैनेजरों के साथ-साथ सपोर्ट स्टाफ, ड्राइवर, इलेक्ट्रिशियन और अन्य कर्मचारियों को भी स्टॉक ऑप्शंस दिए।
नारायण मूर्ति का मानना था कि कंपनी की सफलता केवल प्रमोटरों की नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें योगदान देने वाले हर कर्मचारी को उसका हिस्सा मिलना चाहिए।
Nasdaq लिस्टिंग ने बदल दी तस्वीर
मार्च 1999 में इंफोसिस अमेरिका के Nasdaq Stock Market पर लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी। इस उपलब्धि के बाद विदेशी निवेशकों का भरोसा तेजी से बढ़ा और कंपनी के शेयरों में जोरदार तेजी देखने को मिली।
शेयर का सफर
| वर्ष | शेयर कीमत |
|---|---|
| 1993 (IPO) | ₹95 |
| 1999 | करीब ₹8,100 |
सिर्फ छह वर्षों में शेयर की कीमत में आई इस जबरदस्त तेजी ने ESOP पाने वाले कर्मचारियों की संपत्ति कई गुना बढ़ा दी।
जब ड्राइवर और इलेक्ट्रीशियन भी बन गए करोड़पति
1999 के दौर में एक औसत सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मासिक सैलरी करीब ₹8,000 के आसपास थी। वहीं इंफोसिस के लगभग 1,800 कर्मचारियों के पास ESOP के जरिए ऐसे शेयर थे, जिनकी कीमत करोड़ों रुपये तक पहुंच गई।
सबसे प्रेरणादायक पहलू यह था कि करोड़पति बनने वालों में केवल टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स ही नहीं थे। कंपनी के ड्राइवर, इलेक्ट्रिशियन और अन्य सपोर्ट स्टाफ, जिन्हें स्टॉक ऑप्शंस मिले थे, वे भी इस संपत्ति निर्माण का हिस्सा बने।
इस घटना ने भारत में यह सोच बदल दी कि केवल वेतन ही संपत्ति बनाने का जरिया नहीं है। यदि कर्मचारी अच्छी कंपनी के साथ लंबे समय तक जुड़े रहें और शेयर होल्ड करें, तो वे भी बड़ी दौलत बना सकते हैं।
भारत में ESOP संस्कृति की शुरुआत
इंफोसिस के इस मॉडल के बाद कई भारतीय कंपनियों ने भी ESOP को अपनाया। आज स्टार्टअप से लेकर बड़ी टेक कंपनियां तक कर्मचारियों को स्टॉक ऑप्शंस देती हैं, ताकि वे कंपनी की ग्रोथ में हिस्सेदार बन सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंफोसिस ने भारत में Employee Wealth Creation की संस्कृति को मजबूत आधार दिया। इससे कर्मचारी केवल नौकरी करने वाले नहीं रहे, बल्कि कंपनी के सह-मालिक भी बने।
₹10,000 की पूंजी से बना लाखों करोड़ का कारोबार
इंफोसिस की शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ हुई थी। कंपनी ने लगभग ₹10,000 की शुरुआती पूंजी से अपना सफर शुरू किया और आगे चलकर उसका मार्केट कैप कई लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
यह सफर केवल एक सफल आईटी कंपनी बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि सही नेतृत्व, पारदर्शिता और कर्मचारियों को भागीदार बनाने की सोच किसी भी संगठन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।
निवेशकों और कंपनियों के लिए सीख
इंफोसिस की कहानी बताती है कि दीर्घकालिक निवेश और कर्मचारी भागीदारी दोनों मिलकर असाधारण संपत्ति का निर्माण कर सकते हैं। जिन कर्मचारियों ने अपने ESOP को जल्द बेचने के बजाय लंबे समय तक होल्ड किया, उन्हें सबसे अधिक लाभ मिला। यही कारण है कि आज भी इंफोसिस का ESOP मॉडल भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है।


