Consumer Court Complaint: भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) से बड़ा झटका लगा है। आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि बीमा प्रस्ताव (Proposal Form) के साथ प्रीमियम राशि जमा हो जाती है, तो उसी दिन से बीमा जोखिम (Risk Cover) लागू माना जाएगा। इसी आधार पर आयोग ने LIC को 60 लाख रुपये का बीमा क्लेम, 9% वार्षिक ब्याज, 1 लाख रुपये मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा और 50 हजार रुपये मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया।
NCDRC ने LIC को क्यों दिया बड़ा झटका?
यह मामला मुंबई निवासी नितिन सुरेश गंभीर की जीवन बीमा पॉलिसियों से जुड़ा है। उन्होंने जून 2010 में LIC के पास कुल पांच जीवन बीमा पॉलिसियों के लिए आवेदन किया था। आवेदन के बाद LIC के अधिकृत डॉक्टर ने उनका मेडिकल परीक्षण किया और उन्हें बीमा के लिए फिट घोषित किया गया।
इसके बाद कंपनी ने पांचों पॉलिसियां जारी कर दीं। इनमें तीन पॉलिसियां 26 अगस्त 2010 को जारी हुईं, जबकि बाकी दो पॉलिसियों के लिए परिवार ने 7 सितंबर 2010 को पहला प्रीमियम जमा किया।
हालांकि, LIC का दावा था कि अंतिम दो पॉलिसियों का प्रीमियम 13 सितंबर 2010 को प्राप्त हुआ, इसलिए जोखिम कवरेज भी उसी दिन से शुरू हुआ।
पैर के घाव से अस्पताल पहुंचे, बाद में सामने आई डायबिटीज
सितंबर 2010 में नितिन के दाहिने पैर में एक घाव था जो लंबे समय तक ठीक नहीं हुआ। इलाज के लिए उन्हें 11 सितंबर 2010 को मुंबई के पी.डी. हिंदुजा नेशनल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
जांच के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें लगभग दो महीने से डायबिटीज थी, जिसके कारण घाव भरने में दिक्कत हो रही थी। इलाज के बाद 13 सितंबर 2010 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
तीन साल बाद हार्ट अटैक से मौत, LIC ने क्लेम किया खारिज
करीब तीन वर्ष बाद 11 जून 2013 को नितिन सुरेश गंभीर की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी मां जयश्री गंभीर ने पांचों जीवन बीमा पॉलिसियों के तहत कुल 60 लाख रुपये के बीमा क्लेम की मांग की।
LIC ने सभी दावों को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि बीमा प्रस्ताव भरते समय बीमाधारक ने अपनी स्वास्थ्य संबंधी पूरी जानकारी नहीं दी थी और डायबिटीज की बीमारी छिपाई थी।
पहले राज्य आयोग और फिर राष्ट्रीय आयोग पहुंचा मामला
LIC के फैसले के खिलाफ जयश्री गंभीर ने महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का रुख किया।
राज्य आयोग ने माना कि पहली तीन पॉलिसियों का प्रीमियम 26 अगस्त 2010 को प्राप्त हो चुका था और उसी दिन से बीमा जोखिम शुरू हो गया था। इसलिए आयोग ने उन तीन पॉलिसियों के तहत 40 लाख रुपये का क्लेम देने का आदेश दिया, जबकि बाकी दो पॉलिसियों का दावा खारिज कर दिया।
इस फैसले से दोनों पक्ष असंतुष्ट रहे। जयश्री गंभीर सभी पांच पॉलिसियों का लाभ चाहती थीं, जबकि LIC किसी भी पॉलिसी का भुगतान नहीं करना चाहती थी। इसके बाद मामला राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) पहुंचा।
NCDRC ने क्या कहा?
राष्ट्रीय आयोग की पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि LIC यह साबित नहीं कर सकी कि बीमा प्रस्ताव भरने से पहले नितिन गंभीर को डायबिटीज होने की जानकारी थी।
आयोग ने यह भी कहा कि:
- पैर के घाव और बाद में हुई हार्ट अटैक से मृत्यु के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध साबित नहीं हुआ।
- बीमा कंपनी के पास ऐसा कोई ठोस दस्तावेज नहीं था जिससे बीमारी छिपाने का आरोप सिद्ध हो सके।
- केवल फर्स्ट प्रीमियम रिसीट जारी होने की तारीख ही जोखिम शुरू होने की तारीख नहीं मानी जा सकती।
7 सितंबर की जमा रसीद बनी सबसे बड़ा सबूत
सुनवाई के दौरान नितिन के परिवार ने 7 सितंबर 2010 की Proposal Deposit Receipt पेश की।
इस दस्तावेज में स्पष्ट था कि LIC ने उसी दिन दोनों पॉलिसियों के लिए ₹40,100 की प्रीमियम राशि प्राप्त कर ली थी।
आयोग ने कहा कि जब कंपनी ने उसी दिन प्रीमियम स्वीकार कर लिया था, तब बीमा जोखिम भी उसी दिन से प्रभावी माना जाएगा। केवल 13 सितंबर को रसीद जारी होने से जोखिम कवरेज की तारीख नहीं बदल सकती।
LIC को कितना भुगतान करना होगा?
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने LIC की अपील खारिज करते हुए जयश्री गंभीर की अपील स्वीकार कर ली।
आयोग ने LIC को आदेश दिया कि वह:
- ₹60 लाख का पूरा बीमा क्लेम अदा करे।
- जुलाई 2014 से भुगतान की तारीख तक 9% वार्षिक ब्याज दे।
- ₹1 लाख मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजा दे।
- ₹50,000 मुकदमे का खर्च भी अदा करे।
इस तरह कुल मूल भुगतान ₹61.50 लाख (ब्याज के अतिरिक्त) बनता है।
बीमा धारकों के लिए इस फैसले का क्या मतलब?
यह फैसला उन सभी बीमा ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो जीवन बीमा खरीदते समय प्रीमियम जमा करने और जोखिम कवरेज की शुरुआत को लेकर असमंजस में रहते हैं।
आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि बीमा कंपनी प्रस्ताव के साथ प्रीमियम स्वीकार कर लेती है, तो केवल रसीद जारी होने में देरी होने से बीमा कवरेज प्रभावित नहीं होगा। साथ ही, बीमारी छिपाने का आरोप लगाने के लिए बीमा कंपनी को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।


