नई दिल्ली: भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर ली है। देश के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ ने शनिवार को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की उड़ान भरते हुए भारतीय स्पेस सेक्टर में नए युग की शुरुआत कर दी। हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) द्वारा विकसित इस रॉकेट को दोपहर 12 बजे इसरो (ISRO) के श्रीहरिकोटा लॉन्च सेंटर से लॉन्च किया गया। इस मिशन को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया है।
विक्रम-1 की सफलता केवल एक रॉकेट लॉन्च नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि अब भारत में सरकारी एजेंसी ISRO के साथ-साथ निजी कंपनियां भी अंतरिक्ष मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की स्पेस इकोनॉमी, स्टार्टअप इकोसिस्टम, रोजगार और विदेशी निवेश को जबरदस्त गति मिलेगी।
भारत के लिए क्यों ऐतिहासिक है विक्रम-1 की लॉन्चिंग?
LIFT-OFF! 🚀 Vikram-1 has left the pad at Sriharikota. India's first privately developed orbital rocket is flying. History is being made. 🇮🇳 #Vikram1 #JourneyToOrbit #SkyrootAerospace
— Skyroot Aerospace (@SkyrootA) July 18, 2026 अब तक भारत में ऑर्बिटल सैटेलाइट लॉन्चिंग की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ISRO निभाता रहा है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने निजी कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर के दरवाजे खोले थे। विक्रम-1 की सफल उड़ान इस नीति का पहला बड़ा परिणाम मानी जा रही है।
इस लॉन्च के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जहां निजी कंपनियां भी ऑर्बिटल रॉकेट विकसित कर अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता रखती हैं। इससे भारत की वैश्विक स्पेस इंडस्ट्री में स्थिति और मजबूत होगी।
क्या है ‘मिशन आगमन’?
स्काईरूट एयरोस्पेस ने अपने पहले ऑर्बिटल मिशन को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया। इस मिशन के तहत विक्रम-1 अपने साथ तकनीकी प्रयोगों, अनुसंधान उपकरणों और विभिन्न संस्थानों के पेलोड अंतरिक्ष में लेकर गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे मिशन की लागत लगभग 2 से 3 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 19 करोड़ से 28 करोड़ रुपये) रही।
चार साल पहले विक्रम-S से हुई थी शुरुआत
स्काईरूट एयरोस्पेस ने वर्ष 2022 में विक्रम-S नामक सब-ऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था। उसी सफलता के आधार पर कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम किया और अब विक्रम-1 के जरिए नया इतिहास रच दिया।
किसने बनाई स्काईरूट एयरोस्पेस?
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में ISRO के दो पूर्व वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी। दोनों ने सरकारी नौकरी छोड़कर भारत की पहली निजी रॉकेट लॉन्च कंपनी बनाने का सपना देखा।
- पवन कुमार चंदना कंपनी के Co-Founder और CEO हैं।
- नागा भरत डाका Co-Founder और COO की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
दोनों संस्थापकों ने ISRO में रॉकेट और लॉन्च सिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम किया था। पवन कुमार चंदना को Forbes 30 Under 30 Asia में भी जगह मिल चुकी है। उन्होंने IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है।
आज स्काईरूट एयरोस्पेस की अनुमानित वैल्यूएशन लगभग 10,500 करोड़ रुपये बताई जाती है।
भारत के स्पेस सेक्टर को होंगे कई बड़े फायदे
विक्रम-1 की सफलता का असर केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे भारतीय अंतरिक्ष उद्योग को कई बड़े लाभ मिलने की उम्मीद है।
1. सैटेलाइट लॉन्चिंग होगी और सस्ती
निजी कंपनियों के आने से कम लागत पर सैटेलाइट लॉन्च करना संभव होगा। इससे दुनियाभर की कंपनियां अपने छोटे और मध्यम आकार के सैटेलाइट लॉन्च कराने के लिए भारत का रुख कर सकती हैं।
2. ISRO पर कम होगा दबाव
अब हर कमर्शियल लॉन्च के लिए ISRO पर निर्भरता कम होगी। ISRO वैज्ञानिक अनुसंधान, चंद्रयान, गगनयान और गहरे अंतरिक्ष मिशनों जैसे बड़े कार्यक्रमों पर अधिक ध्यान दे सकेगा।
3. स्टार्टअप्स को मिलेगा बड़ा अवसर
स्पेस सेक्टर खुलने से नई तकनीकी कंपनियों, रिसर्च संस्थानों और स्टार्टअप्स को रॉकेट, सैटेलाइट, स्पेस सॉफ्टवेयर और डेटा सेवाओं में नए अवसर मिलेंगे।
4. रोजगार के लाखों अवसर
रॉकेट निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, AI, रोबोटिक्स, एवियोनिक्स, सैटेलाइट डिजाइन और ग्राउंड सिस्टम जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार सृजित होने की संभावना है।
5. विदेशी निवेश बढ़ेगा
भारत सरकार द्वारा स्पेस सेक्टर में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दिए जाने के बाद विदेशी कंपनियां भी भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में निवेश कर सकेंगी।
सरकार की नई स्पेस नीति का दिखा असर
भारत सरकार ने 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति (Indian Space Policy) लागू की थी। इसके बाद निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता आसान हुआ।
इसके अलावा IN-SPACe के गठन से निजी कंपनियों को नियामकीय सहायता और लॉन्च सुविधाएं मिलने लगी हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है।
तेजी से बढ़ रहा है भारतीय स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार—
- पिछले 12 वर्षों में देश में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स शुरू हो चुके हैं।
- 30 सितंबर 2025 तक 376 स्टार्टअप्स ने IN-SPACe के साथ रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया था।
- वर्ष 2015 से 2024 के बीच ISRO ने 393 विदेशी और 3 भारतीय कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च किए।
- इन लॉन्चिंग से भारत को करीब 439 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 4,227 करोड़ रुपये) की आय हुई।
भारत की स्पेस इकोनॉमी कितनी बड़ी होगी?
भारत की वैश्विक स्पेस इंडस्ट्री में हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
- 2021: लगभग 8.4 अरब डॉलर (करीब 2% वैश्विक हिस्सेदारी)
- 2030 का अनुमान: 40–45 अरब डॉलर
- 2040 का लक्ष्य: 100 अरब डॉलर
- स्पेस एक्सपोर्ट का लक्ष्य: लगभग 11 अरब डॉलर
यदि निजी कंपनियों की भागीदारी इसी तरह बढ़ती रही तो भारत आने वाले वर्षों में अमेरिका और यूरोप के बाद दुनिया के प्रमुख स्पेस हब के रूप में उभर सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह उपलब्धि?
विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग यह साबित करती है कि भारत अब केवल सरकारी स्पेस मिशनों तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियां भी अत्याधुनिक रॉकेट विकसित कर वैश्विक लॉन्च मार्केट में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती हैं। इससे भारत को विदेशी मुद्रा, उच्च तकनीक, रोजगार, स्टार्टअप निवेश और वैश्विक स्पेस कारोबार में बड़ी हिस्सेदारी मिलने की संभावना है। आने वाले वर्षों में ISRO और निजी कंपनियों की साझेदारी भारत को अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।


