नई दिल्ली: भारत में जल्द ही करेंसी का नया दौर शुरू हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अगले साल से ₹10 और ₹20 के पॉलीमर (प्लास्टिक) नोट लाने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए आरबीआई ने वैश्विक कंपनियों को पायलट प्रोजेक्ट में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भारत में पहली बार बड़े स्तर पर प्लास्टिक नोटों का इस्तेमाल शुरू हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि पिछले 16 वर्षों में यह तीसरी बार है, जब भारत प्लास्टिक नोटों को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे पहले 2010 और 2017 में भी ऐसे प्रयास किए गए थे, लेकिन तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियों के कारण दोनों योजनाएं सफल नहीं हो सकीं।
Highlights
- अगले साल से ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है।
- आरबीआई ने वैश्विक कंपनियों से टेंडर आमंत्रित किए।
- भारत में फिलहाल पॉलीमर शीट बनाने वाली कोई कंपनी नहीं है।
- 16 साल में यह प्लास्टिक नोट लाने की तीसरी कोशिश होगी।
- सफल ट्रायल के बाद बड़े मूल्यवर्ग के नोट भी पॉलीमर में आ सकते हैं।
- पॉलीमर नोट अधिक टिकाऊ होते हैं और छपाई की लागत लंबे समय में कम कर सकते हैं।
RBI ने शुरू की तैयारी
भारतीय रिजर्व बैंक की मुद्रा छापने वाली इकाई भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने एक अंतरराष्ट्रीय टेंडर जारी किया है। इसके तहत दुनिया भर की कंपनियों को सुरक्षा फीचर्स से लैस ओपसीफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट शीट उपलब्ध कराने के लिए आमंत्रित किया गया है।
भारत में फिलहाल ऐसी पॉलीमर शीट का उत्पादन नहीं होता, इसलिए शुरुआती चरण में विदेशी कंपनियों की मदद ली जा रही है। हालांकि इस बार योजना केवल शीट आयात करने तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनियों को भारत में उत्पादन की संभावनाएं भी तलाशने के लिए आमंत्रित किया गया है।
16 साल में तीसरी कोशिश
भारत ने पहली बार 2010 में पॉलीमर नोटों पर काम शुरू किया था। वर्ष 2013-14 तक कई स्तरों पर परीक्षण भी हुए, लेकिन परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके बाद मार्च 2017 में केंद्र सरकार ने ₹10 के पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी थी। पॉलीमर शीट खरीदने की अनुमति भी दी गई, लेकिन यह योजना भी लागू नहीं हो सकी।
अब तीसरी बार आरबीआई इस परियोजना को नए तरीके से आगे बढ़ा रहा है, जिससे इसके सफल होने की संभावना पहले से अधिक मानी जा रही है।
पिछली बार क्यों असफल रही योजना?
पॉलीमर नोटों की सबसे बड़ी चुनौती भारत की मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था थी। देशभर में बैंक, एटीएम और करेंसी सॉर्टिंग मशीनें कागज के नोटों के अनुसार तैयार की गई थीं।
पॉलीमर नोटों के लिए इन मशीनों में बड़े स्तर पर बदलाव करने पड़ते, जिसकी लागत काफी अधिक थी। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और तकनीकी मानकों से जुड़ी कई समस्याओं के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
इस बार सफलता की उम्मीद क्यों?
इस बार आरबीआई केवल नोटों की खरीद नहीं कर रहा, बल्कि पूरी उत्पादन प्रक्रिया को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है। यदि विदेशी कंपनियां भारत में उत्पादन स्थापित करती हैं, तो भविष्य में पॉलीमर नोटों का बड़े पैमाने पर निर्माण आसान हो जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक में सुधार और आधुनिक मशीनों की उपलब्धता के कारण इस बार परियोजना के सफल होने की संभावना पहले की तुलना में अधिक है।
18 अगस्त तक जमा होंगी बोलियां
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरबीआई द्वारा जारी टेंडर के लिए 18 अगस्त तक बोलियां जमा की जा सकती हैं।
टेंडर दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि फिलहाल यह खरीद फील्ड ट्रायल के लिए की जा रही है। यदि परीक्षण सफल रहता है, तो भविष्य में अधिक मूल्यवर्ग के नोटों के लिए भी बड़े ऑर्डर जारी किए जा सकते हैं।
हालांकि आरबीआई ने अभी तक आधिकारिक तौर पर यह नहीं बताया है कि पायलट प्रोजेक्ट में कौन-कौन से मूल्यवर्ग शामिल होंगे।
RBI गवर्नर ने क्या कहा?
जून में आयोजित मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि पॉलीमर बैंक नोटों के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि केंद्रीय बैंक किसी भी अंतिम निर्णय से पहले इसकी व्यवहार्यता, लागत और दीर्घकालिक लाभ का विस्तृत अध्ययन कर रहा है।
आखिर क्यों चुने गए ₹10 और ₹20 के नोट?
भारत में ₹10 और ₹20 के नोट सबसे अधिक उपयोग में आते हैं। रोजमर्रा के लेनदेन में इनका इस्तेमाल ज्यादा होने के कारण ये जल्दी फट जाते हैं और खराब हो जाते हैं।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 6,372.8 करोड़ रुपये नोटों की छपाई पर खर्च किए, जबकि 23.8 अरब खराब नोटों को नष्ट करना पड़ा।
ऐसे में यदि छोटे मूल्यवर्ग के नोट पॉलीमर से बनाए जाते हैं तो उनकी उम्र कई गुना बढ़ सकती है, जिससे बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम होगी और सरकार की लागत में भी बचत होगी।
पॉलीमर नोटों के फायदे
- कागज के नोटों की तुलना में कई गुना अधिक टिकाऊ।
- पानी, नमी और गंदगी से कम प्रभावित होते हैं।
- फटने और जल्दी खराब होने की संभावना कम।
- नकली नोट बनाना अधिक कठिन।
- लंबे समय में छपाई और रिप्लेसमेंट की लागत घट सकती है।
- सुरक्षा फीचर्स को बेहतर तरीके से शामिल किया जा सकता है।
दुनिया के कई देशों में पहले से चल रहे हैं प्लास्टिक नोट
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, रोमानिया और वियतनाम समेत कई देशों में पॉलीमर बैंक नोट सफलतापूर्वक प्रचलन में हैं। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि प्लास्टिक नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक समय तक चलते हैं और नकली नोटों पर भी प्रभावी नियंत्रण रखते हैं।
निष्कर्ष
यदि आरबीआई का पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो भारत की करेंसी प्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। शुरुआत ₹10 और ₹20 के नोटों से होगी, लेकिन भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोट भी पॉलीमर में जारी किए जा सकते हैं। इससे न केवल नोटों की गुणवत्ता और सुरक्षा बेहतर होगी, बल्कि लंबे समय में सरकार की छपाई लागत में भी उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।


