नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंक लोन डिफॉल्टरों के लिए बड़ा फैसला लिया है। अब वसूली प्रक्रिया के दौरान बैंक द्वारा जब्त की गई अचल संपत्ति (Immovable Property) को मूल उधारकर्ता (Borrower) या उससे जुड़े संबंधित पक्ष (Related Parties) दोबारा नहीं खरीद सकेंगे। केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि इस तरह की बिक्री पर रोक लगाई जाएगी ताकि ऋण अनुशासन मजबूत रहे और डिफॉल्टरों को अनुचित लाभ न मिले।
आरबीआई के नए निर्देश 1 अक्टूबर 2026 से पूरे देश में लागू होंगे। यह फैसला बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ाने और एनपीए (Non-Performing Assets) की वसूली प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Highlights
- RBI ने डिफॉल्टरों के लिए जारी किए नए नियम।
- बैंक जब्त की गई संपत्ति मूल उधारकर्ता को वापस नहीं बेच सकेंगे।
- संबंधित पक्ष (Related Parties) भी संपत्ति नहीं खरीद पाएंगे।
- जब्त संपत्ति को सार्वजनिक नीलामी के जरिए बेचने पर जोर।
- नए नियम 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे।
RBI ने क्यों लिया यह बड़ा फैसला?
भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में बैंक का काम अचल संपत्ति का मालिक बनना नहीं है। बैंक केवल ऋण देने का कार्य करते हैं। लेकिन जब कोई उधारकर्ता लगातार लोन नहीं चुकाता और उसका खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) बन जाता है, तब बैंक कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरवी रखी गई संपत्ति का कब्जा लेकर उसकी बिक्री के जरिए अपना बकाया वसूलते हैं।
इसी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए आरबीआई ने यह नया नियम लागू किया है।
डिफॉल्टर अपनी ही संपत्ति क्यों नहीं खरीद सकेंगे?
आरबीआई के मुताबिक यदि डिफॉल्टर या उससे जुड़े लोग अपनी जब्त संपत्ति को दोबारा खरीदने लगेंगे तो इससे “Moral Hazard” (नैतिक जोखिम) पैदा होगा।
इसका अर्थ है कि कुछ लोग जानबूझकर लोन चुकाने से बच सकते हैं और बाद में कम कीमत पर अपनी ही संपत्ति वापस खरीदने की कोशिश कर सकते हैं। इससे बैंकिंग व्यवस्था और ऋण अनुशासन दोनों कमजोर होंगे।
इसी वजह से केंद्रीय बैंक ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
सार्वजनिक नीलामी के जरिए होगी बिक्री
आरबीआई ने निर्देश दिया है कि बैंकों को जब्त की गई संपत्तियों को यथाशीघ्र सार्वजनिक नीलामी (Public Auction) के माध्यम से बेचने का प्रयास करना चाहिए।
इससे अधिक पारदर्शिता रहेगी और संपत्ति का उचित बाजार मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी।
कितने समय तक रख सकेंगे संपत्ति?
नए दिशानिर्देशों के अनुसार बैंक इस तरह हासिल की गई गैर-वित्तीय परिसंपत्तियों को अपनी नीति के तहत तय समय सीमा में बेचेंगे।
- अधिकतम 7 वर्ष के भीतर संपत्ति का निपटान करना होगा।
- बैंकों को अनावश्यक रूप से ऐसी संपत्तियां लंबे समय तक अपने पास रखने की अनुमति नहीं होगी।
संपत्ति का मूल्यांकन कैसे होगा?
आरबीआई ने मूल्यांकन के लिए भी स्पष्ट नियम तय किए हैं।
बैंक अधिग्रहण के समय संपत्ति को अपनी बैलेंस शीट में निम्न में से जो कम हो, उस मूल्य पर दर्ज करेंगे—
- समाप्त किए गए ऋण (Written-off Loan) की बही-खाते में दर्ज कीमत, या
- संपत्ति की संभावित त्वरित बिक्री (Quick Sale Value)
इसका उद्देश्य संपत्तियों का यथार्थवादी मूल्यांकन सुनिश्चित करना है।
बैंक खुद इस्तेमाल करेंगे तो क्या होगा?
यदि कोई बैंक किसी अधिग्रहित संपत्ति का स्वयं उपयोग करता है, तो उपयोग शुरू होने की तारीख से उसे गैर-वित्तीय परिसंपत्ति की श्रेणी से हटाकर स्थिर परिसंपत्ति (Fixed Asset) या अन्य उपयुक्त लेखा शीर्ष के अंतर्गत दर्ज किया जाएगा।
मई में जारी हुआ था मसौदा
आरबीआई ने इन नियमों का मसौदा मई 2026 में जारी किया था और सभी हितधारकों से सुझाव मांगे थे।
इस दौरान एक सुझाव यह भी आया था कि डिफॉल्टरों को अपनी जब्त संपत्ति दोबारा खरीदने की अनुमति दी जाए। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कर दिया कि इससे बैंकिंग प्रणाली में अनुशासन कमजोर होगा।
आम लोगों और बैंकिंग सेक्टर पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों से बैंकों की वसूली प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी। साथ ही, जानबूझकर डिफॉल्ट करने वालों पर अंकुश लगेगा। सार्वजनिक नीलामी को बढ़ावा मिलने से संपत्तियों की बिक्री निष्पक्ष तरीके से होगी और बैंकों को बेहतर रिकवरी मिलने की संभावना भी बढ़ेगी।
वहीं, ईमानदारी से लोन चुकाने वाले ग्राहकों के लिए यह संदेश भी जाएगा कि बैंकिंग प्रणाली में जानबूझकर चूक करने वालों को किसी प्रकार की विशेष राहत नहीं मिलेगी।


