मिडिल ईस्ट तनाव के बीच चीन ने कच्चे तेल का आयात घटाया, रिफाइंड फ्यूल निर्यात सीमित किया और अपने विशाल तेल भंडार का इस्तेमाल किया। जानिए चीन की इस रणनीति का भारत और वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर पड़ेगा।
Highlights
- मिडिल ईस्ट संकट के दौरान चीन ने महंगा कच्चा तेल खरीदने से बनाई दूरी।
- चीन ने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का इस्तेमाल किया।
- पेट्रोल-डीजल और जेट फ्यूल के निर्यात पर भी लगाई अस्थायी रोक।
- चीन की नीति से वैश्विक तेल कीमतों और सप्लाई पर पड़ा असर।
- भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए बढ़ सकती हैं नई चुनौतियां।
China Oil Strategy: दुनिया खरीदती रही महंगा तेल, चीन ने अपनाई अलग रणनीति
नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच दुनिया के अधिकांश देश महंगे दामों पर कच्चा तेल खरीदने में जुटे रहे। लेकिन इसी दौरान चीन ने बिल्कुल उलटी रणनीति अपनाई। उसने न केवल कच्चे तेल का आयात कम कर दिया, बल्कि अपने विशाल रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का इस्तेमाल शुरू किया और रिफाइंड ईंधन के निर्यात पर भी रोक लगा दी।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह रणनीति केवल संकट से बचने का कदम नहीं थी, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी ताकत दिखाने की एक बड़ी तैयारी भी थी। इससे यह साफ हो गया कि चीन अब सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार नहीं, बल्कि तेल की कीमतों और आपूर्ति को प्रभावित करने वाला प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है।
मिडिल ईस्ट संकट ने कैसे बदली तेल बाजार की तस्वीर?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई अनिश्चितता ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी। दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है। सप्लाई बाधित होने की आशंका के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला।
जहां अधिकांश देशों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए तेल खरीद बढ़ा दी, वहीं चीन ने इसके विपरीत आयात घटाकर बाजार को चौंका दिया। जून में उसका कच्चे तेल का आयात घटकर लगभग 71.2 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो कई वर्षों का सबसे निचला स्तर माना गया।
इस कदम से वैश्विक मांग पर दबाव कम हुआ और कीमतों में और अधिक उछाल आने से कुछ हद तक राहत मिली।
पहले से थी पूरी तैयारी
चीन का फैसला अचानक लिया गया निर्णय नहीं था। पिछले कई वर्षों से वह ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लगातार रणनीतिक तैयारी कर रहा था।
विशेषज्ञों के अनुसार चीन ने बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का भंडारण किया है। अनुमान है कि उसके पास 130 से 150 करोड़ बैरल तक तेल का स्टॉक मौजूद है, जो उसकी 100 दिनों से अधिक की आयात जरूरत पूरी कर सकता है।
यही वजह रही कि संकट के समय चीन को अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगा तेल खरीदने की मजबूरी नहीं हुई।
रिफाइंड फ्यूल के निर्यात पर भी लगाई रोक
चीन ने केवल कच्चे तेल का आयात कम नहीं किया बल्कि पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल जैसे रिफाइंड उत्पादों के निर्यात को भी सीमित कर दिया।
इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त ईंधन उपलब्ध कराना था, लेकिन इसका असर एशिया के कई देशों पर पड़ा। ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों को वैकल्पिक सप्लाई की तलाश करनी पड़ी।
हालांकि बाद में कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई, लेकिन चीन ने यह संकेत दे दिया कि जरूरत पड़ने पर वह वैश्विक ईंधन सप्लाई को प्रभावित कर सकता है।
तेल बचाने के लिए अपनाई नई रणनीति
चीन ने अपने रणनीतिक भंडार का सीमित उपयोग किया और रिफाइनरियों का उत्पादन कम कर दिया। इससे उसने अपने स्टॉक को भी सुरक्षित रखा और घरेलू मांग को भी संतुलित किया।
रिपोर्टों के मुताबिक अप्रैल से जून के बीच चीन ने प्रतिदिन केवल 5 से 10 लाख बैरल तेल अपने भंडार से निकाला, जबकि रिफाइनिंग क्षमता में उल्लेखनीय कमी की गई।
इसका मतलब यह है कि चीन के पास भविष्य के किसी बड़े ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अभी भी पर्याप्त तेल भंडार सुरक्षित है।
घरेलू उत्पादन और EV ने भी दी मजबूती
चीन लगातार घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रहा है। इसके साथ ही देश में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की तेजी से बढ़ती बिक्री ने पेट्रोल और डीजल की मांग को भी नियंत्रित किया है।
विदेशी तेल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होने से चीन को वैश्विक बाजार में अधिक रणनीतिक फैसले लेने की स्वतंत्रता मिल रही है।
अब सिर्फ खरीदार नहीं, बाजार को प्रभावित करने वाला देश
लंबे समय तक तेल बाजार में कीमतें मुख्य रूप से ओपेक, रूस और अमेरिका जैसे बड़े उत्पादकों के फैसलों से प्रभावित होती थीं।
लेकिन हालिया घटनाक्रम ने दिखाया कि अब चीन भी अपनी खरीद और निर्यात नीति बदलकर वैश्विक तेल बाजार की दिशा प्रभावित कर सकता है। दुनिया की सबसे बड़ी मांग रखने वाला देश यदि अचानक खरीद कम या ज्यादा करता है तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर बदलाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है।
यदि भविष्य में चीन अचानक बड़े पैमाने पर तेल खरीदना शुरू करता है तो वैश्विक कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा और पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है।
वहीं अगर चीन लंबे समय तक कम आयात करता है तो वैश्विक मांग कमजोर रहने से तेल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। इससे भारत को सस्ता कच्चा तेल मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
इसके अलावा यदि चीन एशिया में रिफाइंड ईंधन की सप्लाई सीमित रखता है तो भारत समेत कई देशों को नए सप्लायर तलाशने पड़ सकते हैं, जिससे लागत और लॉजिस्टिक्स दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
आगे भारत को किन बातों पर रखनी होगी नजर?
आने वाले समय में भारत के लिए केवल मिडिल ईस्ट की भू-राजनीतिक स्थिति पर नजर रखना ही पर्याप्त नहीं होगा। चीन की ऊर्जा नीति, उसके रणनीतिक तेल भंडार, आयात-निर्यात के फैसले और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती हिस्सेदारी भी वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करेंगे।
यही कारण है कि अब चीन को केवल दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार का एक ऐसा खिलाड़ी माना जा रहा है, जो अपने फैसलों से कीमतों और सप्लाई के समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।


