कमजोर मानसून के बीच E20 लक्ष्य बचाने की तैयारी, चावल आधारित इथेनॉल पर बढ़ा सरकार का फोकस
HighLights
- कमजोर मानसून से E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य पर बढ़ा दबाव।
- गन्ना और मक्का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका।
- चावल आधारित इथेनॉल को मिल सकता है बड़ा रोल।
- खाद्य सुरक्षा और चीनी उत्पादन को लेकर भी बढ़ी चिंता।
नई दिल्ली: भारत सरकार वर्ष 2030 से पहले पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य हासिल करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। लेकिन इस बार मौसम सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर सकता है। मौसम वैज्ञानिकों की ओर से एल नीनो (El Niño) के प्रभाव और कमजोर मानसून की आशंका जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो गन्ना और मक्का जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे इथेनॉल उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा।
इसी संभावित संकट से निपटने के लिए सरकार अब चावल आधारित इथेनॉल उत्पादन पर अधिक जोर देने की तैयारी कर रही है। हालांकि इससे खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर प्रभाव को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है।
क्यों बढ़ी E20 लक्ष्य को लेकर चिंता?
भारत में इथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत गन्ने से बनने वाला शीरा (Molasses) और मक्का है। लेकिन दोनों फसलें मानसून पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं। यदि बारिश सामान्य से कम होती है तो उत्पादन घट सकता है, जिससे इथेनॉल की उपलब्धता प्रभावित होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर मानसून का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ईंधन नीति, चीनी उद्योग और ऊर्जा सुरक्षा पर भी दिखाई देगा। यदि पर्याप्त मात्रा में इथेनॉल उपलब्ध नहीं हुआ तो पेट्रोल में 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय समय पर हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
एल नीनो कैसे बढ़ा सकता है मुश्किलें?
एल नीनो एक वैश्विक मौसमीय घटना है, जिसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ता है। इसके कारण सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है।
कम वर्षा होने पर—
- गन्ने की पैदावार घट सकती है क्योंकि यह अधिक पानी वाली फसल है।
- मक्का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।
- किसानों की बुवाई का रकबा कम हो सकता है।
- इथेनॉल उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता घट सकती है।
यही कारण है कि सरकार पहले से वैकल्पिक कच्चे माल की व्यवस्था पर काम कर रही है।
E20 लक्ष्य भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
E20 केवल पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की योजना नहीं है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित अर्थव्यवस्था की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।
इससे कई फायदे होते हैं—
- कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है।
- विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।
- किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है।
- जैव ईंधन उद्योग को बढ़ावा मिलता है।
सरकार का मानना है कि E20 कार्यक्रम लंबी अवधि में भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा।
अब क्यों बढ़ रहा है चावल आधारित इथेनॉल का महत्व?
गन्ना और मक्का की संभावित कमी को देखते हुए सरकार चावल को एक वैकल्पिक स्रोत के रूप में तेजी से आगे बढ़ा रही है।
भारत में कई बार सरकारी गोदामों में चावल का पर्याप्त अधिशेष स्टॉक मौजूद रहता है। ऐसे चावल का उपयोग इथेनॉल उत्पादन में किया जा सकता है। इससे इथेनॉल उद्योग को अतिरिक्त कच्चा माल मिलेगा और E20 लक्ष्य को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौसम की स्थिति खराब रहती है तो आने वाले महीनों में चावल आधारित इथेनॉल का योगदान पहले की तुलना में काफी बढ़ सकता है।
चीनी उद्योग पर भी पड़ सकता है असर
यदि गन्ने का उत्पादन कमजोर रहता है तो इसका असर केवल इथेनॉल तक सीमित नहीं रहेगा।
संभावित प्रभाव—
- चीनी उत्पादन में गिरावट।
- घरेलू बाजार में सप्लाई पर दबाव।
- निर्यात नीति में बदलाव की संभावना।
- चीनी कीमतों में उतार-चढ़ाव।
ऐसी स्थिति में सरकार को चीनी और इथेनॉल के बीच संतुलन बनाना होगा ताकि दोनों क्षेत्रों की जरूरतें पूरी हो सकें।
खाद्य सुरक्षा को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
चावल से इथेनॉल बनाने की योजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता खाद्य सुरक्षा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का उपयोग ईंधन उत्पादन में होने लगे तो भविष्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि केवल अधिशेष या अनुपयोगी चावल का ही उपयोग इथेनॉल उत्पादन में किया जाए।
आगे क्या हो सकता है?
सरकार फिलहाल मौसम की स्थिति, फसल उत्पादन और खाद्यान्न भंडार पर लगातार नजर बनाए हुए है। यदि मानसून उम्मीद से कमजोर रहता है तो इथेनॉल उत्पादन में चावल की हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ-साथ अन्य वैकल्पिक स्रोतों पर भी जोर दिया जा सकता है।
आने वाले महीनों में मानसून की प्रगति यह तय करेगी कि भारत अपने E20 लक्ष्य की दिशा में कितनी तेजी से आगे बढ़ पाएगा। फिलहाल सरकार की रणनीति यही है कि ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा—तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को गति दी जाए।


