नई दिल्ली: भारत को वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचाने की दिशा में केंद्र सरकार एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार अब स्टील उद्योग में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए करीब ₹5,000 करोड़ की नई योजना लाने की तैयारी कर रही है। इस योजना का उद्देश्य स्टील उत्पादन में स्वच्छ तकनीक (Clean Technology) को बढ़ावा देना और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना है।
सरकार की प्रस्तावित योजना ‘नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर सस्टेनेबल सेकेंडरी स्टील’ के तहत लागू की जाएगी। उम्मीद है कि इसे अगले तीन महीनों के भीतर शुरू किया जा सकता है। इसके लिए जल्द ही केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी भी ली जाएगी।
अगले तीन महीने में लॉन्च हो सकती है योजना
स्टील मंत्रालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस योजना का मसौदा लगभग तैयार है। इसे जल्द ही कैबिनेट के समक्ष मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। योजना लागू होने के बाद देशभर के स्टील उत्पादकों को आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाने के लिए वित्तीय सहायता मिलेगी।
सरकार का मानना है कि यदि स्टील उद्योग में कार्बन उत्सर्जन कम किया जाता है, तो भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को तेजी से हासिल कर सकेगा।
सेकेंडरी स्टील उत्पादकों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा
इस योजना का लाभ पूरे स्टील उद्योग को मिलेगा, लेकिन सरकार का विशेष फोकस सेकेंडरी स्टील प्रोड्यूसर्स पर रहेगा। इन कंपनियों को नई तकनीक अपनाने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और कम प्रदूषण वाली उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी।
योजना के तहत मिलने वाले फंड का बड़ा हिस्सा इन्हीं इकाइयों के लिए निर्धारित किया जाएगा, ताकि छोटे और मध्यम स्तर के स्टील निर्माता भी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर सकें।
क्लीन टेक्नोलॉजी और वैकल्पिक सामग्री को मिलेगा बढ़ावा
सरकार की इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य स्टील निर्माण में ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देना है, जिनसे कार्बन उत्सर्जन कम हो। इसके तहत निम्न क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा—
- ऊर्जा दक्ष मशीनों का उपयोग
- कम कार्बन उत्सर्जन वाली उत्पादन तकनीक
- स्क्रैप आधारित स्टील उत्पादन को बढ़ावा
- वैकल्पिक ईंधन और कच्चे माल का इस्तेमाल
- ग्रीन स्टील तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन
इन उपायों से उत्पादन लागत में भी सुधार आने की संभावना जताई जा रही है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह पहल?
स्टील उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन यह सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले क्षेत्रों में भी शामिल है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार—
- भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में स्टील सेक्टर की हिस्सेदारी 10 से 12 प्रतिशत है।
- देश में प्रति टन कच्चे स्टील के उत्पादन पर लगभग 2.55 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।
- जबकि वैश्विक औसत करीब 1.9 टन CO₂ प्रति टन स्टील है।
यानी भारत में स्टील उत्पादन का कार्बन फुटप्रिंट अभी भी वैश्विक औसत से अधिक है। नई योजना इस अंतर को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
ग्रीन स्टील मिशन को मिलेगी रफ्तार
विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना भारत के ग्रीन स्टील मिशन को नई गति दे सकती है। यदि उद्योग स्वच्छ तकनीकों को तेजी से अपनाता है तो कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी। साथ ही भारतीय स्टील कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगी, क्योंकि दुनिया भर में कम कार्बन वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।
उद्योग और पर्यावरण दोनों को होगा फायदा
सरकार की यह पहल केवल प्रदूषण कम करने तक सीमित नहीं है। इससे स्टील उद्योग की ऊर्जा दक्षता बढ़ेगी, उत्पादन प्रक्रियाएं आधुनिक होंगी और भविष्य में निर्यात के नए अवसर भी खुल सकते हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय कार्बन नियमों और ग्रीन ट्रेड नीतियों का पालन करना भी भारतीय कंपनियों के लिए आसान होगा।
निष्कर्ष
₹5,000 करोड़ की प्रस्तावित ‘नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर सस्टेनेबल सेकेंडरी स्टील’ योजना भारत के स्टील उद्योग को अधिक स्वच्छ, आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि योजना समय पर लागू होती है, तो इससे कार्बन उत्सर्जन घटाने के साथ-साथ देश के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी बड़ी मदद मिलेगी।
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