नेपाल में गोरखा पूर्व सैनिकों का प्रदर्शन, भारत की अग्निपथ योजना को लेकर फिर उठे सवाल
भारतीय सेना में नेपाली गोरखा युवाओं की भर्ती का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। भारतीय सेना प्रमुख की काठमांडू यात्रा से ठीक पहले नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि भारत सरकार की अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की भर्ती प्रक्रिया को दोबारा शुरू किया जाए।
इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड नेपाल पोखरा की ओर से आयोजित इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और उनके परिवार शामिल हुए। रैली पोखरा स्टेडियम से शुरू होकर कास्की जिले के प्रशासन कार्यालय तक पहुंची, जहां नेपाल सरकार को दो सूत्रीय ज्ञापन सौंपा गया।
ज्ञापन में अग्निवीर भर्ती को तुरंत बहाल करने और पूर्व सैनिक संगठनों से जुड़े नियमों में बदलाव की मांग की गई।
प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर और पोस्टर लेकर भारत में नेपाली युवाओं की भर्ती दोबारा शुरू करने की अपील की। इनमें लिखा था कि “अग्निपथ के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करो” और “पूर्व सैनिकों की आवाज सुनी जाए।”
200 साल पुरानी गोरखा भर्ती परंपरा खतरे में?
गोरखा ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच गोरखा भर्ती की परंपरा 200 साल से ज्यादा पुरानी है। उनका कहना है कि सुगौली संधि के बाद नेपाली युवाओं के भारतीय सेना में शामिल होने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जो लगातार चलती रही।
लेकिन साल 2022 में भारत सरकार द्वारा अग्निपथ योजना लागू किए जाने के बाद नेपाल सरकार ने भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी।
नेपाल सरकार का तर्क था कि अग्निपथ योजना 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुई त्रिपक्षीय संधि के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और किसी भी बदलाव से पहले नेपाल से बातचीत होनी चाहिए थी।
क्या है भारत-नेपाल-गोरखा भर्ती का इतिहास?
आजादी से पहले और बाद में गोरखा सैनिक भारतीय सेना की ताकत का अहम हिस्सा रहे हैं। 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत गोरखा सैनिकों की भर्ती व्यवस्था तय की गई थी।
इस समझौते के तहत चार गोरखा रेजिमेंट ब्रिटिश सेना को दी गईं, जबकि छह रेजिमेंट भारतीय सेना के पास रहीं। आजादी के बाद भारत ने 11वीं गोरखा राइफल्स नाम से नई रेजिमेंट भी बनाई।
इस समझौते में नेपाली गोरखा सैनिकों की सेवा शर्तें, वेतन, सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन जैसी व्यवस्थाएं तय की गई थीं।
एक समय भारतीय सेना में करीब 32 हजार से 35 हजार नेपाली गोरखा सैनिक सेवा देते थे। इसके अलावा नेपाल में भारतीय सेना के करीब 1.32 लाख पूर्व सैनिकों का बड़ा समुदाय मौजूद है।
अग्निवीर योजना क्या है?
भारत सरकार ने साल 2022 में सेना में भर्ती की प्रक्रिया बदलते हुए अग्निपथ योजना शुरू की थी।
इस योजना के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना में जवानों की भर्ती चार साल के लिए की जाती है। चार साल की सेवा पूरी होने के बाद प्रदर्शन और सेना की जरूरत के आधार पर अधिकतम 25 फीसदी अग्निवीरों को स्थायी सेवा का मौका मिलता है।
बाकी 75 फीसदी अग्निवीरों को सेवा निधि पैकेज देकर मुक्त किया जाता है। हालांकि उन्हें पेंशन की सुविधा नहीं मिलती।
अग्निवीरों को सेवा के दौरान वेतन के साथ कई सुविधाएं मिलती हैं। ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने पर परिवार को आर्थिक सहायता भी दी जाती है।
भारत सरकार का कहना है कि अग्निपथ योजना से सेना युवा, आधुनिक और तकनीकी रूप से मजबूत बनेगी। इसके साथ ही सेना के वेतन और पेंशन खर्च को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
नेपाल के पूर्व सैनिक क्यों कह रहे हैं- अग्निवीर बनना गल्फ जाने से बेहतर?
नेपाल के पूर्व गोरखा सैनिक संगठनों का कहना है कि भारतीय सेना में सेवा करना खाड़ी देशों में कम वेतन वाली नौकरियों की तुलना में बेहतर विकल्प है।
नेपाल की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान वाले गल्फ देशों में मजदूरी करने के बजाय भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप में काम करना युवाओं के लिए ज्यादा सम्मानजनक और सुरक्षित विकल्प है।
उनका दावा है कि अग्निपथ योजना के चार साल के दौरान एक युवा वेतन और सुविधाओं के जरिए करीब 45 से 50 लाख रुपये तक कमा सकता है।
गोरखा भर्ती रुकने से नेपाल को आर्थिक नुकसान
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय सेना में गोरखा भर्ती रुकने का असर नेपाल की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
पहले भारतीय सेना में कार्यरत नेपाली गोरखा सैनिक हर साल बड़ी मात्रा में पैसा नेपाल भेजते थे। यह रकम नेपाल के ग्रामीण इलाकों में परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद करती थी।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, विदेशी सेनाओं में काम करने वाले गोरखा सैनिकों से मिलने वाला पैसा नेपाल के दूरदराज इलाकों में शिक्षा, रोजगार और छोटे कारोबार के विकास का आधार रहा है।
इसके अलावा पूर्व गोरखा सैनिक भारत और नेपाल के बीच मजबूत सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों की कड़ी भी माने जाते हैं।
युवाओं के लिए बढ़े रोजगार संकट की चिंता
भारतीय सेना में भर्ती बंद होने के बाद नेपाल के कई युवाओं के सामने रोजगार के नए विकल्प तलाशने की चुनौती खड़ी हुई है।
रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ नेपाली युवा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी सेना में शामिल होने तक चले गए। नेपाल सरकार के अनुसार, बड़ी संख्या में नेपाली युवाओं ने विदेशों में जोखिम भरे रोजगार विकल्प तलाशे हैं।
पूर्व रक्षा प्रमुख जनरल अनिल चौहान ने भी कहा था कि नेपाली युवाओं की भर्ती को लेकर अंतिम फैसला नेपाल सरकार को करना है। उन्होंने साफ किया था कि भारतीय नागरिकों और नेपाल के नागरिकों के लिए अलग-अलग अग्निपथ नियम नहीं बनाए जा सकते।
आगे क्या होगा?
गोरखा भर्ती भारत और नेपाल के रिश्तों का एक पुराना और संवेदनशील मुद्दा है। जहां भारत अग्निपथ योजना को सेना सुधार का हिस्सा मानता है, वहीं नेपाल में इसे पुरानी भर्ती व्यवस्था और त्रिपक्षीय समझौते से जोड़कर देखा जा रहा है।
अब नजर इस बात पर है कि भारत और नेपाल सरकारों के बीच बातचीत से क्या कोई समाधान निकलता है या गोरखा भर्ती का यह विवाद आगे भी जारी रहता है।


