नई दिल्ली। अदाणी ग्रुप की प्रमुख सीमेंट कंपनी अंबुजा सीमेंट्स ने ब्रिटेन की क्लीन-टेक कंपनी लीलाक लिमिटेड (Leilac Limited) के साथ एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है। इस समझौते के तहत गुजरात के कच्छ जिले स्थित सांघीपुरम प्लांट में दुनिया के सबसे बड़े कम-कार्बन (Low Carbon) सीमेंट उत्पादन मॉडल में से एक विकसित किया जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य सीमेंट निर्माण के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को बड़े पैमाने पर कम करना और वर्ष 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करना है।
गुजरात में बनेगा कम-कार्बन सीमेंट का बड़ा हब
अंबुजा सीमेंट्स के अनुसार, सांघीपुरम स्थित 6.6 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) क्षमता वाले प्लांट में लीलाक की अत्याधुनिक कार्बन कैप्चर और हाइब्रिड इलेक्ट्रिक हीटिंग तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इस तकनीक की मदद से उत्पादन प्रक्रिया से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को कैप्चर किया जा सकेगा और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम होगी।
कंपनी का दावा है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो इसकी क्षमता को 7 से 8 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। इससे हर साल 10 लाख टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करने की क्षमता विकसित हो सकती है।
करण अदाणी बोले- भविष्य के लिए जरूरी है नई तकनीक
अंबुजा सीमेंट्स के निदेशक करण अदाणी ने कहा कि सीमेंट उद्योग को कम-कार्बन भविष्य की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए तकनीकी नवाचार और पूरी वैल्यू चेन के सहयोग की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि लीलाक के साथ यह साझेदारी उन नई तकनीकों की खोज का हिस्सा है जो उत्पादन प्रक्रिया से होने वाले उत्सर्जन को कम कर सकती हैं, ऊर्जा दक्षता बढ़ा सकती हैं और दीर्घकालिक टिकाऊ विकास को गति दे सकती हैं।
करण अदाणी के मुताबिक, यह पहल कंपनी की व्यापक डीकार्बोनाइजेशन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है और 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य को मजबूत आधार प्रदान करेगी।
क्या है लीलाक की खास तकनीक?
लीलाक लिमिटेड कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम करने वाली एक अग्रणी कंपनी है। इसकी तकनीक सीमेंट निर्माण प्रक्रिया से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को सीधे अलग करने और उसे कैप्चर करने में सक्षम है।
इस तकनीक की खास बात यह है कि इससे नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाया जा सकता है और कोयले जैसी पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता धीरे-धीरे खत्म की जा सकती है। साथ ही वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।
2050 नेट-जीरो लक्ष्य की ओर बड़ा कदम
दुनियाभर में सीमेंट उद्योग को सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे में अंबुजा सीमेंट्स और लीलाक की यह साझेदारी भारत के औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन प्रयासों के लिए अहम मानी जा रही है।
कंपनी का मानना है कि इस परियोजना से भविष्य में कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाने का रास्ता आसान होगा। इससे कार्बन कैप्चर की लागत भी कम हो सकती है और उद्योग को आर्थिक रूप से अधिक व्यवहारिक समाधान मिल सकता है।
1 गीगावाट हरित ऊर्जा क्षमता का फायदा
अंबुजा सीमेंट्स पहले से ही हरित ऊर्जा पर तेजी से निवेश कर रही है। कंपनी के पास करीब 1 गीगावाट की कैप्टिव ग्रीन एनर्जी क्षमता मौजूद है। इसके जरिए उत्पादन प्रक्रिया में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग लगातार बढ़ाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्बन कैप्चर तकनीक और हरित ऊर्जा का यह मॉडल सफल रहता है तो यह न केवल भारत बल्कि वैश्विक सीमेंट उद्योग के लिए भी एक नया मानक स्थापित कर सकता है।
वैश्विक सीमेंट उद्योग के लिए मॉडल बनेगी परियोजना
लीलाक लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) डेनियल रेनी ने कहा कि अंबुजा सीमेंट्स दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक सीमेंट नेटवर्क में से एक का संचालन करती है। ऐसे में दोनों कंपनियों का सहयोग कम लागत और कम-कार्बन सीमेंट उत्पादन का एक नया मॉडल विकसित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि यह परियोजना वैश्विक सीमेंट उद्योग को एक ऐसा समाधान दे सकती है जिसे दुनिया के अन्य देशों में भी दोहराया जा सके।
भारत के ग्रीन इंडस्ट्रियल मिशन को मिलेगी मजबूती
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का राष्ट्रीय लक्ष्य तय किया है। ऐसे में भारी उद्योगों में कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों का विकास बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। अंबुजा सीमेंट्स और लीलाक की यह साझेदारी भारत के ग्रीन इंडस्ट्रियल ट्रांजिशन और स्वच्छ ऊर्जा मिशन को नई गति दे सकती है।


