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Income Tax ITAT Order: बैंक में जमा किए ₹1.33 करोड़ कैश, ITR भी नहीं भरा, फिर भी जीता इनकम टैक्स केस, जानें कैसे मिली बड़ी राहत

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/07 at 6:59 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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11 Min Read
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Income Tax ITAT Order: बैंक खातों में करीब ₹1.33 करोड़ कैश जमा करने और संबंधित वित्त वर्ष का इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल नहीं करने वाले कर्नाटक के एक रिटायर्ड टीचर को इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) से बड़ी राहत मिली है। आयकर विभाग ने बैंक खातों में हुए बड़े कैश डिपॉजिट की जानकारी मिलने के बाद री-असेसमेंट की कार्रवाई शुरू की थी। विभाग ने बाद में करीब ₹48.85 लाख की आय का आकलन किया।

Contents
बैंक खातों में कहां जमा हुए थे ₹1.33 करोड़?इनकम टैक्स विभाग ने क्यों शुरू की री-असेसमेंट कार्रवाई?CIT (Appeals) से नहीं मिली राहत26 दिन की देरी कैसे बनी पूरा मामला पलटने की वजह?ITAT ने क्या फैसला दिया?क्या ITAT ने ₹1.33 करोड़ कैश जमा करने को सही माना?टैक्सपेयर्स के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?इस केस से क्या सीख मिलती है?निष्कर्ष

मामला पहले आयकर विभाग और फिर CIT (Appeals) के सामने पहुंचा, जहां रिटायर्ड टीचर को राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु स्थित ITAT का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि आयकर विभाग की ओर से जारी किया गया धारा 148 का री-असेसमेंट नोटिस कानूनी समय सीमा खत्म होने के बाद जारी हुआ था।

यही तकनीकी कानूनी खामी रिटायर्ड टीचर के लिए गेमचेंजर साबित हुई। ITAT ने माना कि समय सीमा के बाहर जारी किए गए नोटिस के आधार पर री-असेसमेंट की पूरी कार्रवाई वैध नहीं रह सकती। इसलिए ट्रिब्यूनल ने नोटिस और उसके आधार पर की गई री-असेसमेंट कार्रवाई को रद्द कर दिया।

बैंक खातों में कहां जमा हुए थे ₹1.33 करोड़?

यह मामला Assessment Year (AY) 2015-16 से जुड़ा है। CBDT के रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम के तहत आयकर विभाग को रिटायर्ड टीचर के बैंक खातों में बड़ी रकम जमा होने की जानकारी मिली थी।

विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, उनके अलग-अलग बैंक खातों में इस तरह कैश जमा हुआ था—

  • बैंक ऑफ बड़ौदा के सेविंग अकाउंट में ₹13 लाख कैश जमा किया गया।
  • केनरा बैंक के खाते में करीब ₹60 लाख कैश जमा हुआ।
  • अन्य बैंकिंग लेनदेन के जरिए करीब ₹60 लाख की अतिरिक्त नकद जमा राशि सामने आई।
  • बैंक ऑफ बड़ौदा के खाते से उन्हें ₹12,701 ब्याज भी प्राप्त हुआ।
  • इस तरह विभाग के सामने कुल बैंक डिपॉजिट की राशि करीब ₹1.33 करोड़ रही।

विभाग को यह भी जानकारी मिली कि संबंधित वर्ष में रिटायर्ड टीचर ने इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं किया था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उनकी आय के प्रमुख स्रोतों में खेती से होने वाली आय और सेविंग बैंक खाते पर मिलने वाला ब्याज शामिल था।

इनकम टैक्स विभाग ने क्यों शुरू की री-असेसमेंट कार्रवाई?

बैंक खातों में इतनी बड़ी रकम जमा होने और ITR दाखिल नहीं किए जाने के बाद आयकर विभाग ने लेनदेन की जांच शुरू की। विभाग की ओर से रिटायर्ड टीचर को 26 मार्च 2022 को धारा 148A(b) के तहत नोटिस जारी किया गया।

इस नोटिस का जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद आयकर अधिकारी (AO) ने 26 अप्रैल 2022 को धारा 148A(d) के तहत आदेश पारित किया और उसी दिन धारा 148 के तहत री-असेसमेंट नोटिस जारी कर दिया।

बाद में रिटायर्ड टीचर की ओर से ITR दाखिल किया गया, लेकिन उसका ई-वेरिफिकेशन नहीं होने के कारण उसे वैध रिटर्न नहीं माना गया। इसके बाद विभाग ने मामले में आगे की प्रक्रिया जारी रखी।

आखिरकार 29 फरवरी 2024 को धारा 147 और 144 के तहत री-असेसमेंट ऑर्डर पारित किया गया। इसमें उनकी कुल आकलित आय करीब ₹48.85 लाख निर्धारित की गई।

CIT (Appeals) से नहीं मिली राहत

री-असेसमेंट आदेश के खिलाफ रिटायर्ड टीचर ने अपील की। हालांकि, CIT (Appeals) से उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने मामले को आयकर अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी ITAT के सामने चुनौती दी।

ITAT में उनकी मुख्य दलील यह थी कि आयकर विभाग ने धारा 148 के तहत री-असेसमेंट नोटिस जारी करने की निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं किया था।

मामले में यही कानूनी सवाल सबसे महत्वपूर्ण बन गया।

26 दिन की देरी कैसे बनी पूरा मामला पलटने की वजह?

ITAT ने मामले के रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों को देखने के बाद पाया कि AY 2015-16 के लिए पुराने आयकर कानून के तहत धारा 148 का नोटिस जारी करने की अंतिम तारीख 31 मार्च 2022 थी।

लेकिन आयकर विभाग ने धारा 148 का नोटिस 26 अप्रैल 2022 को जारी किया।

यानी नोटिस निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद जारी हुआ था और इसमें 26 दिन की देरी थी।

यही देरी रिटायर्ड टीचर के पक्ष में निर्णायक साबित हुई।

ट्रिब्यूनल ने माना कि केवल धारा 148A के तहत प्रक्रिया पूरी कर लेने से विभाग को धारा 149 में निर्धारित समय सीमा के बाद धारा 148 का नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

सरल शब्दों में समझें तो विभाग को री-असेसमेंट की प्रक्रिया शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि नोटिस कानूनी समय सीमा के भीतर जारी किया गया हो। अगर मूल नोटिस ही समय सीमा के बाहर जारी हुआ है, तो उसके आधार पर आगे की री-असेसमेंट कार्रवाई भी कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।

ITAT ने क्या फैसला दिया?

ITAT ने रिटायर्ड टीचर की दलील को स्वीकार करते हुए पाया कि धारा 148 का नोटिस निर्धारित समय सीमा के बाद जारी किया गया था।

ट्रिब्यूनल ने इसी आधार पर धारा 148 के तहत जारी नोटिस को रद्द कर दिया। इसके साथ ही उस नोटिस के आधार पर शुरू की गई पूरी री-असेसमेंट कार्रवाई को भी रद्द कर दिया गया।

इस तरह रिटायर्ड टीचर की अपील स्वीकार कर ली गई और उन्हें बड़ी राहत मिल गई।

क्या ITAT ने ₹1.33 करोड़ कैश जमा करने को सही माना?

इस मामले को समझते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान रखना जरूरी है। ITAT से मिली राहत का मतलब यह नहीं है कि ट्रिब्यूनल ने ₹1.33 करोड़ के कैश डिपॉजिट को आय के रूप में सही या गलत घोषित कर दिया।

राहत का मुख्य आधार री-असेसमेंट नोटिस की वैधानिक समय सीमा थी।

यानी विवाद का निर्णायक बिंदु कैश जमा की पूरी राशि का स्रोत नहीं, बल्कि यह था कि आयकर विभाग ने जिस कानूनी प्रक्रिया के तहत री-असेसमेंट शुरू किया, उसमें धारा 148 का नोटिस समय सीमा के भीतर जारी हुआ था या नहीं।

ITAT ने पाया कि नोटिस समय सीमा के बाद जारी किया गया था। इसलिए नोटिस ही टिक नहीं पाया और उसके आधार पर हुई आगे की कार्रवाई भी रद्द हो गई।

टैक्सपेयर्स के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?

यह मामला टैक्सपेयर्स के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनकम टैक्स की किसी कार्रवाई में केवल विभाग की ओर से की गई जांच या सामने आए लेनदेन ही महत्वपूर्ण नहीं होते। कानून में तय प्रक्रिया और समय सीमा का पालन भी उतना ही जरूरी है।

री-असेसमेंट के मामलों में विभाग को संबंधित धाराओं के तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर नोटिस जारी करना होता है। यदि नोटिस वैधानिक समय सीमा के बाहर जारी होता है, तो टैक्सपेयर्स के पास उसे कानूनी आधार पर चुनौती देने का रास्ता हो सकता है।

हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर देरी वाले टैक्स नोटिस में करदाता को अपने-आप राहत मिल जाएगी। प्रत्येक मामले में संबंधित Assessment Year, लागू कानून, नोटिस की तारीख, कारण और परिस्थितियों को अलग-अलग देखा जाता है।

इस केस से क्या सीख मिलती है?

रिटायर्ड टीचर का मामला यह दिखाता है कि इनकम टैक्स विवादों में प्रोसीजर और लिमिटेशन बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यहां विभाग ने बैंक खातों में बड़े कैश डिपॉजिट और ITR दाखिल नहीं किए जाने के आधार पर कार्रवाई शुरू की थी, लेकिन री-असेसमेंट नोटिस की समय सीमा का मुद्दा ट्रिब्यूनल में निर्णायक बन गया।

इस मामले में 31 मार्च 2022 तक जारी किया जाना वाला धारा 148 का नोटिस 26 अप्रैल 2022 को जारी किया गया था। ITAT ने इसी 26 दिन की देरी को कानूनी रूप से महत्वपूर्ण माना और री-असेसमेंट की पूरी कार्रवाई रद्द कर दी।

इसलिए टैक्सपेयर्स के लिए यह समझना जरूरी है कि आयकर विभाग से मिलने वाले किसी भी नोटिस को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नोटिस की धारा, तारीख, Assessment Year और जवाब देने की समय सीमा को ध्यान से देखना चाहिए और जरूरत पड़ने पर टैक्स एक्सपर्ट या योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

₹1.33 करोड़ के कैश डिपॉजिट और ITR दाखिल नहीं करने के बावजूद रिटायर्ड टीचर को ITAT से राहत मिली, लेकिन इसकी वजह कैश जमा को वैध ठहराना नहीं थी। असल वजह आयकर विभाग की ओर से धारा 148 का री-असेसमेंट नोटिस निर्धारित समय सीमा के 26 दिन बाद जारी किया जाना था।

ITAT ने माना कि एक बार वैधानिक समय सीमा समाप्त हो जाने के बाद केवल धारा 148A की प्रक्रिया पूरी करने से समय सीमा के बाहर जारी नोटिस को वैध नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने नोटिस और उसके आधार पर हुई री-असेसमेंट कार्रवाई को रद्द कर दिया।

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TAGGED: income tax case, Income Tax ITAT Order, Income Tax Reassessment, ITAT Order, ITAT Relief, Reassessment Notice, Section 148 Income Tax, Section 148A, Section 149 Income Tax, ₹1.33 करोड़ Cash Deposit
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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