Yarsagumba Price: नेपाल, तिब्बत और भारत के कुछ हिमालयी इलाकों में मिलने वाली यारसागुम्बा (कीड़ा जड़ी) दुनिया के सबसे महंगे प्राकृतिक उत्पादों में गिनी जाती है। इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 20 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकती है। यही वजह है कि हर साल हजारों लोग इसकी तलाश में ऊंचे पहाड़ों का रुख करते हैं।
नई दिल्ली। दुनिया में सोना, हीरा और कई कीमती धातुएं महंगी मानी जाती हैं, लेकिन एक ऐसी प्राकृतिक जड़ी भी है जिसकी कीमत सुनकर लोग हैरान रह जाते हैं। इसका नाम यारसागुम्बा (Yarsagumba) है, जिसे आमतौर पर ‘कीड़ा जड़ी’ या ‘हिमालय का सोना’ कहा जाता है। नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में हर गर्मी के मौसम में हजारों लोग अपने घर, खेत और रोजमर्रा के काम छोड़कर इसकी तलाश में निकल पड़ते हैं।
यारसागुम्बा एक दुर्लभ प्राकृतिक संसाधन है, जिसकी मांग चीन समेत कई एशियाई देशों में बेहद ज्यादा है। इसकी कीमत कई बार 20 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। यही कारण है कि इसे हिमालय का सोना कहा जाता है।
क्या है यारसागुम्बा?
यारसागुम्बा प्रकृति का एक बेहद अनोखा जीववैज्ञानिक मिश्रण है। यह एक परजीवी फंगस और कैटरपिलर (कीड़े के लार्वा) के मेल से बनता है। जब एक विशेष प्रकार का फंगस जमीन के अंदर रहने वाले घोस्ट मॉथ के लार्वा को संक्रमित करता है, तब धीरे-धीरे वह कीड़े के पूरे शरीर पर कब्जा कर लेता है।
समय के साथ कीड़ा सूखकर कठोर हो जाता है और उसके शरीर से एक पतली फंगस की डंडी जमीन के ऊपर निकल आती है। यही हिस्सा लोगों को दिखाई देता है और वे इसे सावधानी से निकालते हैं।
इतनी ज्यादा कीमत क्यों मिलती है?
यारसागुम्बा की कीमत के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी दुर्लभता है। यह सिर्फ हिमालय के कुछ चुनिंदा इलाकों में ही उगता है और इसके लिए विशेष मौसम और तापमान की जरूरत होती है।
इसके अलावा चीन और अन्य एशियाई देशों में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसकी काफी मांग है। माना जाता है कि यह शरीर की ऊर्जा बढ़ाने, स्टैमिना सुधारने और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में मदद करता है। हालांकि, इन दावों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन बाजार में इसकी लोकप्रियता लगातार बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार सीमित आपूर्ति और भारी मांग के कारण इसकी कीमत साल-दर-साल ऊंचे स्तर पर बनी रहती है।
पूरे गांव के लोग निकल पड़ते हैं पहाड़ों की ओर
यारसागुम्बा जुटाने का मौसम आमतौर पर मई से जुलाई के बीच होता है। इस दौरान नेपाल के डोल्पा, मुगु, जुमला और दार्चुला जैसे जिलों के हजारों लोग समुद्र तल से 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पहुंच जाते हैं।
कई परिवार अस्थायी कैंप लगाकर हफ्तों तक पहाड़ों में रहते हैं। कुछ परिवारों के लिए यारसागुम्बा से होने वाली कमाई खेती या मजदूरी से पूरे साल मिलने वाली आय से भी अधिक होती है। इसी वजह से इस मौसम में कई गांव लगभग खाली हो जाते हैं।
बेहद कठिन और जोखिमभरा होता है काम
‘हिमालय का सोना’ ढूंढना जितना लाभदायक है, उतना ही जोखिमभरा भी है। इसे खोजने वाले लोगों को बेहद ठंडे मौसम, ऑक्सीजन की कमी और कठिन पहाड़ी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
ऊंचाई पर होने वाली बीमारियां, भूस्खलन, बर्फीले तूफान और खराब मौसम हमेशा खतरा बने रहते हैं। इसके बावजूद आर्थिक लाभ की उम्मीद में हर साल हजारों लोग इस जोखिम को उठाते हैं।
हिमालयी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा
नेपाल और हिमालयी क्षेत्रों के कई समुदायों के लिए यारसागुम्बा सिर्फ एक फंगस नहीं बल्कि आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। इसकी बिक्री से होने वाली कमाई स्थानीय परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाती है।
इसी वजह से यारसागुम्बा को दुनिया के सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों में शामिल किया जाता है। सीमित उपलब्धता, कठिन संग्रह प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय मांग ने इसे वास्तव में ‘हिमालय का सोना’ बना दिया है।


