Oil Prices News: ईरान युद्ध को 100 दिन से ज्यादा हो चुके हैं। दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय से बाधित है, लेकिन इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बनी हुई हैं। आमतौर पर ऐसी स्थिति में तेल कीमतों में तेज उछाल देखने को मिलता है, लेकिन इस बार वैश्विक ऊर्जा बाजार की तस्वीर अलग है। विशेषज्ञों का मानना है कि मांग में कमी, चीन के आयात में गिरावट, रणनीतिक तेल भंडारों से आपूर्ति और वैकल्पिक परिवहन व्यवस्थाओं समेत कई कारणों ने मिलकर बाजार को संतुलित बनाए रखा है।
क्यों नहीं बढ़ रहीं तेल की कीमतें?
युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज स्ट्रेट से प्रतिदिन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते थे। यह वैश्विक मांग का लगभग 20% हिस्सा था। ऐसे में इस मार्ग में व्यवधान के बावजूद कीमतों का नियंत्रित रहना कई निवेशकों और विश्लेषकों के लिए हैरानी की बात है।
ऊर्जा बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण हैं, जिनमें चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
1. चीन ने घटा दिया तेल आयात

मार्केट इंटेलिजेंस फर्म Vortexa के आंकड़ों के मुताबिक चीन का समुद्री मार्ग से कच्चे तेल का आयात पिछले महीने घटकर करीब 67 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह 2025 के औसत स्तर से लगभग 40% कम है।
यानी वैश्विक बाजार में रोजाना करीब 40 लाख बैरल तेल की मांग कम हो गई। यह मात्रा जर्मनी और फ्रांस की संयुक्त दैनिक खपत के बराबर मानी जाती है। यदि चीन पहले की तरह आयात जारी रखता तो तेल की कीमतें काफी ऊपर जा सकती थीं।
2. वैश्विक मांग में आई कमजोरी

रिफाइनरियां पहले की तुलना में कम कच्चा तेल प्रोसेस कर रही हैं। अनुमान है कि वैश्विक स्तर पर ईंधन और पेट्रोकेमिकल उत्पादन के लिए तेल की खपत में प्रतिदिन 30 से 50 लाख बैरल तक की कमी आई है।
ऊंची कीमतों, धीमी आर्थिक गतिविधियों और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के बढ़ते उपयोग ने मांग पर दबाव बनाया है।
3. इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता प्रभाव

विशेष रूप से चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी ने पेट्रोल और डीजल की मांग को प्रभावित किया है। दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो बाजार होने के कारण चीन में ईवी की बढ़ती बिक्री का सीधा असर वैश्विक तेल मांग पर पड़ रहा है।
4. होर्मुज पूरी तरह बंद नहीं हुआ

हालांकि जलमार्ग प्रभावित हुआ है, लेकिन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की पाइपलाइनें अभी भी तेल आपूर्ति बनाए हुए हैं। इन पाइपलाइनों के जरिए प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल तेल बाजार तक पहुंच रहा है।
इसके अलावा जहाजों के माध्यम से वैकल्पिक ट्रांसशिपमेंट सिस्टम भी विकसित किया गया है, जिससे अतिरिक्त आपूर्ति संभव हो सकी है।
5. पहले से मौजूद अतिरिक्त सप्लाई

युद्ध शुरू होने से पहले ही वैश्विक तेल बाजार में जरूरत से अधिक आपूर्ति मौजूद थी। अमेरिकी शेल उत्पादन और OPEC+ देशों के बढ़े उत्पादन के कारण बाजार में प्रतिदिन 30-40 लाख बैरल अतिरिक्त तेल उपलब्ध था।
यही अतिरिक्त स्टॉक संकट के दौरान सुरक्षा कवच साबित हुआ।
6. रणनीतिक तेल भंडार से सप्लाई

मार्च में इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के सदस्य देशों ने संयुक्त रूप से 40 करोड़ बैरल तेल बाजार में जारी करने का फैसला किया था।
इस अतिरिक्त सप्लाई ने बाजार में घबराहट कम की और कीमतों को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभाई।
7. आधुनिक रिफाइनरियों की बढ़ी क्षमता

नई पीढ़ी की रिफाइनरियां पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीली हो चुकी हैं। वे विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकती हैं और जरूरत के अनुसार पेट्रोल, डीजल या जेट फ्यूल का उत्पादन बढ़ा सकती हैं।
इससे सप्लाई चेन पर दबाव कम हुआ है।
8. ट्रंप के बयानों का असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह संकेत देते रहे हैं कि मध्य पूर्व संकट का समाधान निकाला जा सकता है।
तेल बाजार में उम्मीद बनी रहने से सट्टेबाजों ने आक्रामक खरीदारी से दूरी बनाई, जिससे कीमतों पर दबाव सीमित रहा।
9. ऑप्शन मार्केट का बढ़ता इस्तेमाल

पहले निवेशक तेल कीमतों में तेजी से बचाव के लिए सीधे फ्यूचर्स खरीदते थे। अब ऑप्शन मार्केट काफी विकसित हो चुका है।
इससे जोखिम प्रबंधन आसान हुआ है और घबराहट में होने वाली खरीदारी कम हुई है, जो पहले कीमतों को तेजी से ऊपर ले जाती थी।
10. अमेरिका, ब्राजील और गुयाना से रिकॉर्ड उत्पादन

मध्य पूर्व में संकट के बावजूद दुनिया के अन्य हिस्सों में तेल उत्पादन तेजी से बढ़ा है।
अमेरिका, ब्राजील, गुयाना और कनाडा जैसे देशों ने रिकॉर्ड स्तर पर उत्पादन किया है। चीन का घरेलू तेल उत्पादन भी उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इस अतिरिक्त उत्पादन ने वैश्विक आपूर्ति को मजबूत बनाए रखा है।
भारत के लिए क्या है इसका मतलब?
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में यदि ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बना रहता है तो इसका सीधा फायदा भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा।
कम तेल कीमतों से पेट्रोल-डीजल पर दबाव कम रहेगा, महंगाई नियंत्रित रहेगी और सरकार का आयात बिल भी सीमित रहेगा। इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव भी कम हो सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक चीन की मांग कमजोर रहती है और अमेरिका समेत अन्य देशों से अतिरिक्त उत्पादन जारी रहता है, तब तक तेल की कीमतों में बड़ी और स्थायी तेजी आना मुश्किल दिखाई देता है। हालांकि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने या रणनीतिक भंडारों के कम होने की स्थिति में बाजार की दिशा तेजी से बदल सकती है।


